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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 668 में से

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पृष्ठ 405

२९४ नाट्यशास्त्रम्
खगैश्च सर्वैर्य्युधिसञ्चिताश्रिता-१
श्रिताधिरूढ़ा २निहतास्तलैस्तलैः ॥ ७३ ॥
जैसे ये पर्वत शत्रुओं के बाणों और उनके पीछे आने वाले शिकारी
पक्षियों से आहत होकर मर गए वैसी ही यह युद्ध भूमि भी ऐसे 'खों वाले'
पक्षियों की तरह बाणों से आच्छादित हो गई है और चिता पर रखे हुए शव
इन पक्षियों की चोंचों से और नखों से क्षतविक्षत हो गए हैं ॥ ७३ ॥
सन्दष्ट-यमक—
आदौ द्वे यत्र पादे तु भवेतामक्षरे समे ।
३सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं ४नामतो यथा ॥ ७४ ॥
यदि पाद के प्रारंभ में दो समान शब्दों की आवृत्ति हो तो 'सन्दष्ट-
यमक' होता है ॥ ७४ ॥
यथा—
पश्य५ पश्य रमणस्य मे गुणान्६ येन येन वशगां करोति माम् ।
येन येन हि ममैति दर्शनं७ तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७५ ॥
देखो देखो, मेरे प्रिय की विशेषताएं; जिनसे वह मुझे आकृष्ट कर रहा है,
यह जब भी मेरी दृष्टि में आता है तभी मुझे अपनी ओर झुका लेता है ॥७५॥
पादादियमक—
आदौ पादे ८तु यत्र स्यात् समावेशसमाक्षरः९ ।
पादादियमकं नाम विज्ञेयं१० नामतो यथा ॥ ७६ ॥
यदि प्रत्येक पाद के प्रारंभ में आनेवाले शब्द की आगे के सभी पादों में
आवृत्ति हो तो 'पादादियमक' होता है ॥ ७६ ॥
यथा—विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः संहरते प्रजाः ।
विष्णुः ११प्रसूते त्रैलोक्यं १२विष्णुर्लोकाधिदैवतम् १३ ॥७७॥
१. सञ्चिताञ्चिता—ग० ।
२. निहताः फलैः फलैः—ख; हि हता हता नराः—ग० ।
३. सन्दंशं—क० । ४. तद् बुधैः—ख०; ग० ।
५. यस्य यस्य—ग० । ६. गुणाः—क०; ग० ।
७. दिनमेति—ख०; हि समैति—ग० । ८. पादस्य—ख०; ग० ।
९. समावेशः समाक्षरः—ख०; ग० ।
१०. तद्विज्ञेयं बुधैर्यंथा—ख०; ग० । ११. विष्णुप्रसूतं—क० ।
१२. यच्च—क० । १३. लोकादिदैवतम्—ख० ।