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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 668 में से

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पृष्ठ 413

३०२ नाट्यशास्त्रम्
[ १विचारगहनं यत् स्यात् स्फुटश्चैव स्वभावतः ।
स्वतः सुप्रतिबद्धश्च श्लिष्टं तत् परिकीर्तितम्² ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना (वृत्ति) तर्क से विचार करने के उपरान्त ग्रहण
की जाय, जो स्वभाव से स्फुट तथा स्वयं एक दूसरे से अच्छी प्रकार संग्रथित
अर्थ वाली हो तो उसे भी 'श्लेष' गुण कहते हैं । ]
प्रसाद—
अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र शब्दोऽर्थो वा प्रतीयते ।
सुखशब्दार्थसंयोगात्³ प्रसादः स तु कीर्त्यते ॥ ९७ ॥
सरल शब्दों तथा अर्थों के प्रयोग द्वारा बिना (स्पष्टता बोधक)
व्याख्यान के ही जहां अर्थावबोध सरलता से होता हो तो उसे 'प्रसाद'
गुण जानो ॥ ९७ ॥
समता—
नातिचूर्णपदैर्युक्ता न च व्यर्थाभिधायिभिः ।
⁴दुर्बोधैर्नैश्च न कृता समत्वात् समता मता ॥ ९८ ॥
अपने हाथों से बन्द कर अपनी गर्दन टेढ़ी करके प्रेम से रोमाञ्चित एवं मुस्कराने
वाली दूसरी प्रिया का चुम्बन करने लगा ।)
उक्त उदाहरण में एक साथ तथा एक ही समय दोनों नायिका के हृदय
ग्रहण करने के उद्योग को इतनी सम्बद्ध पदावली में उपपादित किया गया है कि
जिससे किसी भी नायिका की असंभावना के लिये थोड़ा भी अवकाश नहीं रहता
और नायक का कुटिलतापूर्ण आरम्भ भी हृदय में पैठकर माधुर्य की ही सृष्टि
करता है ।
१. अनुपयुक्त पदावली के अभाव के कारण बिना क्लिष्ट कल्पना के जब
अर्थ स्वयं (निर्मलता के कारण) प्रतीत होने लगे तो 'प्रसाद' गुण होता है ।
जैसे : —'सवर्णा कन्यका रूपयौवनारम्भशालिनी ।' (रूप एवं यौवन की प्राप्ति
के आरम्भ से सुशोभित यह कन्या सजातीय अथवा इष्ट है) ।
इस उदाहरण में अर्थ की निर्मलता धूल से असम्पृक्त जल सदृश अतिस्पष्ट
दिखलाई देती है तथा इस पद्य के उच्चारण मात्र से कन्या का विवाह के योग्य
होना, सुन्दरतापूर्ण होने से हृदयाकर्षक रहना तथा गृहस्थ धर्म के उपयुक्त होना
आदि अर्थ स्वतः व्यक्त हो जाने के कारण 'प्रसाद' गुण है ।
१. विचार्य ग्रहणं वृत्या—ग० । २. परिकीर्त्यते—ग० ।
३. सम्बोधात्—ग० । ४. न दुर्बोधा तैश्च कृता—ख०; ग० ।