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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

२८० नाट्यशास्त्रम्
गुणातिपात
गुणाभिधानैर्विविधैर्विपरीतार्थयोजितैः ।
गुणातिपातो १मधुरैर्निष्ठुरार्थैर्भवेद्यथा२ ॥ १९ ॥
जब किसी के गुण मधुर पदावली में वर्णन करने पर कठोर अर्थ को
लाते हुए (प्रकट करते हुए) विपरीत आशय में (या योजना में) लग
जाए तो उसे 'गुणातिपात' समझना चाहिए१ ॥ १९ ॥
अतिशय
बहून् गुणान् कीर्तयित्वा सामान्यजनसम्भवान् ।
विशेषः कीर्त्यते यस्तु ज्ञेयः सोऽतिशयो बुधैः ॥ २० ॥
जब सामान्य मनुष्यों में दिखने वाले अनेक गुणों का बखान करने के
बाद कुछ गुणगत विशेषताओं को (भी) बतलाया जाए तो उसे 'अतिशय'२
समझना चाहिए ॥ २० ॥
तुल्यतर्क
रूपकैरुपमाभिर्वा३ तुल्यार्थाभिः प्रयोजितः४ ।
५अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शस्तुल्यतर्कः६ प्रकीर्तितः७ ॥ २१ ॥
किसी परोक्ष अर्थ को उपमा या रूपक के द्वारा अर्थगत समानता
बतलाते हुए प्रत्यक्षतः अभिहित किया जाए तो उसे 'तुल्यतर्क'३ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ २१ ॥
पदोच्चय—
बहूनान्तु८ प्रयुक्तानां पदानां९ बहुभिः पदैः ।
उच्चयः सदृशार्थो यः स विज्ञेयः पदोच्चयः ॥ २२ ॥
जब अनेक शब्दों का प्रयोग उन्हीं के समान दूसरे शब्दों को मिलाते
१. अन्य पाठ में 'गुणानुवाद' इसी का अभिधान किया गया है। लक्षण भी
भिन्न है।
२. 'अतिशय' का लक्षण दोनों पाठों में भिन्न है।
३. 'तुल्यतर्क' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आक्रन्द' है।

१. निष्ठुरार्थों—क० । २. भवेदथ—ख०; ग० ।
३. रुपमानैर्वा—ख०; ग० । ४. प्रयोक्तृभिः—ख०; ग० ।
५. अप्रत्ययार्थ—ख०; ग० । ६. संस्पृष्टः—क० ।
७. इति स्मृतः—क० । ८. सम्प्रयुक्तानां—क० ।
९. पादानां—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८१
हुए—उसी अर्थ को बतलाने के लिए ( या उसी कार्य को बनाने के लिए )
किया जाए तो उसे 'पदोच्चय' समझना चाहिए¹ ॥ २२ ॥
दिष्ट ( दृष्ट )—
यथादेशं यथाकालं १यथारूपञ्च वर्ण्यते ।
यत् प्रत्यक्षं परोक्षं वा दिष्टं² तद्वर्णतोऽपि³ वा ॥ २३ ॥
जब किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विषय का देश, काल तथा स्वरूप के
अनुसार ठीक वैसा ही वर्णन कर दिया जाए तो उसे 'दिष्ट'² समझना
चाहिए ॥ २३ ॥
उपदिष्ट—
परिगृह्य तु शास्त्रार्थं यद्वाक्यमभिधीयते ।
४विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते ॥ २४ ॥
जब किसी ( इष्ट ) विषय को शास्त्र का आधार लेकर कहा जाए
तथा जिससे विद्वान् सन्तुष्ट हों जाए तो उसे 'उपदिष्ट'३ समझना
चाहिए ॥ २४ ॥
विचार—
५पूर्वाशयसमानार्थैरप्रत्यक्षार्थसाधनैः ।
६अनेकोपाधिसंयुक्तो विचारः परिकीर्तितः ॥ २५ ॥
जिसमें पिछली कही गई बातों के समान आशय वाले परोक्षार्थ के
साधक अनेक प्रकार के उपायों को दोष-पूर्ण ( या त्रुटिपूर्ण ) रूप से प्रकट
किया जाए उसे 'विचार'४ समझना चाहिए ॥ २५ ॥
१. 'पदोच्चय' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं ।
२. 'दिष्ट' के स्थान पर अन्यत्र 'दृष्ट' पाठ मिलता है । इसके स्थान पर अन्य
पाठ में 'सारूप्य' रखा गया है ।
३. 'उपदिष्ट' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपपत्ति' प्राप्त होता है ।
४. 'विचार' का के स्थान पर अन्य पाठ में पश्चात्ताप है ।
१. पात्रञ्च—क० । २. दृष्टं—क० ।
३. वर्णकोऽपि—क० । ४. विदुर्मनोहरं—क० ।
५. पूर्वं शेष—क०; पूर्वंदेश—ख०; ग० ।
६. तिरस्कृताथंविषयो—क०; अनेकोपोहसंयुक्तो—ख०; ग० ।

२८२ : नाट्यशास्त्रम्
विपर्यय—
विचारस्यान्यथाभावस्तथादृष्टोपदिष्टयोः । १
सन्देहाज्जायते२ यत्र स विज्ञेयो विपर्ययः ॥ २६ ॥
जब किसी (बात) को देखकर या कहकर फिर उसी विचार का
सन्देह के कारण (परित्याग या) विपरीत स्वरूप हो जाए तो उसे
'विपर्यय' समझना चाहिए ॥ २६ ॥
भ्रंश—
वाच्यमर्थं परित्यज्य दृप्तादिभिरनेकधा ।
अन्यस्मिन्नेव पतनादाशु३ भ्रंशः स दूष्यते ॥ २७ ॥
जब अहंकार (घबराहट या शीघ्रता) आदि के कारण किसी व्यक्ति
द्वारा वाच्यार्थ को छोड़कर कुछ दूसरी ही बात मुंह से निकाली जाए तो
उसे 'भ्रंश' समझना चाहिए२ ॥ २७ ॥
अनुनय—
उभयोः प्रीतिजननो विरुद्धाभिनिवेशयोः ४ ।
५अर्थस्य साधकश्चैव विज्ञेयोऽनुनयो बुधैः ॥ २८ ॥
जो शब्दावली दो प्रतिपक्षी (विरुद्ध) व्यक्तियों की प्रीति सम्पादन
करते हुए अपनी इष्टसिद्धि को प्राप्त करे (तो) उसे 'अनुनय'३ समझना
चाहिए ॥ २८ ॥
माला—
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं६ कीर्त्यन्ते यत्र सूरिभिः ।
प्रयोजनान्यनेकानि सा मालेत्यभिसंज्ञिता ॥ २९ ॥
जब अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए विद्वानों के द्वारा अनेक
१. 'विपर्यय' के स्थान पर अन्यपाठ में 'मिथ्याध्यवसाय' रखा गया है ।
२. भ्रंश के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रियवचन' या 'प्रियोक्ति' प्राप्त होता है ।
३. 'अनुनय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुवृत्ति' है ।
१. दिष्टोपदिष्टयोः—क०; दृष्टोपयोगतः—ख०; ग० ।
२. कल्प्यते यस्तु—ख०; कल्प्यते वस्तु—ग० ।
३. दिह् भ्रंशः स इष्यते—ख० ग० । ४. भिनिविष्टयोः—ख०; ग० ।
५. द्वयर्थस्य—क० ।
६. अनीप्सितार्थं—क०; ईप्सितार्थप्रसिद्धयर्थं—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८३
आवश्यकताओं की पूर्ति का सुझाव दिया जाए तो उसे 'माला'¹ समझना
चाहिए ॥ २९ ॥
दाक्षिण्य—
हृष्टैः प्रसन्नवदनैर्यत् परस्यानुवर्तनम्¹ ।
क्रियते ²वाक्यचेष्टाभिस्तद्दाक्षिण्यमुदाहृतम्³ ॥ ३० ॥
जब सुखपूर्वक प्रसन्न मुंह, मीठे वचनों और अनुकूल चेष्टाओं के द्वारा
एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ अनुकूल भाव में चलना हो तो इसे
'दाक्षिण्य'² समझना चाहिए ॥ ३० ॥
गर्हण—
यत्र सङ्कीर्तयन् दोषं⁴ गुणमर्थेन दर्शयेत् ।
⁵गुणातिपाताद्दोषाद् वा गर्हणं नाम तद्भवेत् ॥ ३१ ॥
जब दोषों को बतलाकर उन्हें गुण के रूप में वर्णित किया जाए या
गुणों को बतलाकर उन्हें दोष सिद्ध कर दिया जाए तो 'गर्हण'³ समझना
चाहिए ॥ ३१ ॥
अर्थापत्ति—
⁶अर्थान्तरस्य कथने यत्रान्योऽर्थः प्रतीयते⁷ ।
⁸वाक्यमाधुर्यसम्पन्ना सार्थापत्तिरुदाहृता ॥ ३२ ॥
जब किसी मधुर शब्दावली के कहने पर उसी से दूसरे अर्थ की भी
उसके साथ ही प्रतीति हो जाए तो 'अर्थापत्ति'⁴ समझना चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'माला' का केवल उदाहरण ही अभिनवगुप्ताचार्य ने दिया है।
साहित्यदर्पण में इसका भिन्न लक्षण मिलता है।
२. 'दाक्षिण्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'याच्ञा' प्राप्त होता है।
३. 'गर्हण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'कपटसंघात' या 'कपट' प्राप्त
होता है।
४. अर्थापत्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'कार्य' प्राप्त होता है।
१. वर्णनम्—क० । २. वान्यचेष्टाभि—ख०; ग० ।
३. मिति स्मृतम्—ख०; ग० । ४. दोषान्—क० ।
५. गुणाभिवादाद्दोषाद्वा—क० । ६. अन्यमर्थ समालोच्य—क० ।
७. प्रकाश्यते—क० । ८. वाक्यं माधुर्यसंयुक्तं—क० ।

२८४ नाट्यशास्त्रम्
प्रसिद्धि—
वाक्यैः सातिशयैरुक्ता १वाक्यार्थस्य प्रसाधकैः ।
लोकप्रसिद्धैर्बहुभिः २ प्रसिद्धिरिति कीर्तिता ॥ ३३ ॥
जब अतिशय उत्तम शब्दों वाले वाक्यों के द्वारा—जो अनेक लोक
प्रसिद्ध तथा अपने ( अर्थ के ) साधक अर्थों को वाक्यों में लिए हुए हो—
कथन हो तो उसे 'प्रसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ३३ ॥
पृच्छा—
३यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ ३४ ॥
स्वयं को या दूसरे को सम्बोधन करते हुए जब कल्पित व्यक्ति या
परोक्ष व्यक्ति द्वारा स्वयं को कुछ कहा या पूछा जाए तो उसे 'पृच्छा'
समझना चाहिए ॥ ३४ ॥
सारूप्य
५दृष्टश्रुतानुभूतार्थकथनादि - समुद्भवम्६ ।
७सादृश्यं क्षोभजननं सारूप्यमिति संज्ञितम् ॥ ३५ ॥
जब किसी वस्तु को देखते, सुनते या अनुभव करते हुए उसकी
( सन्दिग्ध ) समानता के कारण बुद्धि में भ्रम उत्पन्न हो जाए तो उसे
'सारूप्य' समझना चाहिए ॥ ३५ ॥
मनोरथ—
८हृदयस्थस्य वाक्यस्य गूढार्थस्य९ विभावकम् ।
अन्यापदेशैः१० कथनं मनोरथ इति स्मृतः ॥ ३६ ॥
१. 'प्रसिद्धि' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनीति' प्राप्त होता है ।
२. पृच्छा का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
३. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिमान' प्राप्त होता है ।
१. स्ववाक्यार्थप्रकाशकैः—क० । २. बह्वर्थैः—क० ।
३. यत्राकरो—ख०; ग० । ४. पृच्छेत् प्रज्ञापयन्नर्थं—क० ।
५. श्रुतादि—क० । ६. कथनाभिः—ख०; ग० ।
७. सादृश्यमक्षजनितं—ख० । ८. हृदयार्थस्य—ख०; ग० ।
९. गूढस्यार्थप्रकाशकम्—सुश्लिष्टार्थप्रकाशकम्—क० ।
१०. पदेशकथनं—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८५
जब हृदय में विद्यमान गुप्त अभिलाषाओं को अन्यापदेश (दूसरे की
अवस्थाओं के वर्णन) के द्वारा निदर्शित किया जाए तो इसे 'मनोरथ'१
समझना चाहिए ॥ ३६ ॥
लेश—
यद्वाक्यं १वाक्यकुशलैरुपायेनाभिधीयते ।
२सदृशार्थाभिनिष्पत्या स लेश इति कीर्तितः ॥ ३७ ॥
जब चतुर जन द्वारा किसी बात को विषय की समानता बतलाने वाली
पदावली को प्रयुक्त करते हुए बड़ी खूबी से प्रस्तुत किया जाए तो उसे
'लेश'२ समझना चाहिए ॥ ३७ ॥
क्षोभ—
परदोषैर्विचित्रार्थैर्यत्रात्मा ३परिकीर्त्यन्ते ।
४अदृष्टोऽन्योऽपि वा कश्चित् स तु क्षोभ इति स्मृतः ॥ ३८ ॥
यदि किसी दोष रहित या न देखी हुई वस्तु को भी विचित्र अर्थों के
अभिधान द्वारा दोष से युक्त स्वरूप वाली बतला दे उसे 'क्षोभ'३ समझना
चाहिए । ३९ ॥
गुणकीर्तन—
लोके गुणातिरिक्तानां ५गुणानां यत्र नामभिः ।
एको६ हि शब्द्यते तत्तु विज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ३९ ॥
जब संसार में उपलब्ध होने वाली सारी गुणों की संख्या और स्थिति
से अधिक गुण एक व्यक्ति में बतलाए जाए तो उसे 'गुणकीर्तन'४ समझना
चाहिए ॥ ३९ ॥
१. मनोरथ का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
२. 'लेश' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रतिषेध' प्राप्त होता है ।
३. 'क्षोभ' के स्थान पर संक्षोम तथा संक्षेप पाठ भी मिलता है। इसके
स्थान पर अन्य पाठ में 'परिदेवन' प्राप्त होता है जिसके पाठ परिवाद,
परिवादन तथा परिवेदन भी प्राप्त होते हैं ।
४. गुणकीर्तन का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है ।
१. वादकुशलै—ख० ।
२. सादृश्यार्था—क०; सदृशार्थाविनिष्पन्नः—ख०; ग० ।
३. चाभिधीयते—क० । ४. अदृष्टो—क० ।
५. बहूनां—क० । ६. एकोऽपि—ख०; ग० ।

२८६ नाट्यशास्त्रम्
अनुक्तसिद्धि—
प्रस्तावेनैव शेषोऽर्थः कृत्स्नो यत्र प्रतीयते¹।
वचनेन विनानुक्तसिद्धिः² सा परिकीर्तिता ॥ ४० ॥
जहां बिना अभिहित किये ही प्रस्ताव मात्र से किसी विषय के शेष भाग
की प्रतीति हो जाए उसे 'अनुक्तसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ४० ॥
प्रियोक्ति—
यत् प्रसन्नेन मनसा पूज्यं पूजयितुं वचः ।
हर्षप्रकाशनार्थन्तु सा प्रियोक्तिरुदाहृता ॥ ४१ ॥
जब प्रसन्न चित्त हो पूज्यजन के सम्मान और अपने हर्ष को प्रकट करने
के लिए उपयुक्त शब्दों को उच्चारित किया जाए तो उसे 'प्रियोक्ति' समझना
चाहिए ॥ ४१ ॥
एतानि ³काव्यस्य च लक्षणानि षट्त्रिंशदुद्देशनिदर्शकानि⁴ ।
⁵प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि ⁶यथारसानि ॥ ४२ ॥
नाट्यरचना में प्रयुक्त किये जाने वाले ये ही वे छत्तीस लक्षण हैं जिन्हें
नाट्यरचना के अवसर पर दृष्टि में रखा जाए और नाट्यरचना के शोभा
धायक इन लक्षणों को उपयुक्त रसों के अनुकूल रखते हुए सदा प्रयुक्त करना
चाहिए ॥ ४२ ॥
अलंकार ( तथा उनके लक्षण )—
उपमा ⁷रूपकञ्चैव दीपकं यमकं तथा ।
⁸काव्यस्यैते ह्यलङ्काराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥ ४३ ॥
१. अनुक्तसिद्धि के स्थान पर ही अभिनवगुप्त ने अन्य पाठ में 'परिदेवन'
भी माना है तथा इसके स्थान पर 'क्षोभ' को भी संकेतित किया है ।
२. प्रियोक्ति का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है । अभिनवगुप्तपाद ने इसे 'अंश'
के स्थान पर भी उल्लिखित किया है ।
१. प्रदीयते—क० ।
२. जातु सिद्धिः—क०; विजानाति सिद्धिः—ख; विजानातु सिद्धिः—ग० ।
३. एतानि काव्यस्य विभूषणानि—क०; एतानि वा काव्यविभूषणानि—ख० ।
४. दुद्देश्यनिदर्शनानि ख०; ग० । ५. काव्येषु सोदाहरणानि—ख; ग० ।
६. रसानुरूपम्—क०; बलानुरूपम् ख० ।
७. दीपकञ्चैव रूपकं—ख०; ग० ।
८. अलङ्कारास्तु विज्ञेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८७
नाटक आदि में सम्प्राप्त तथा प्रयोग किये जाने वाले अलंकार चार हैं ।
वे हैं—उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक ॥ ४३ ॥
उपमा—
यत्किञ्चित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते ।
उपमा नाम सा¹ ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया ॥ ४४ ॥
काव्यरचना में जब दो पदार्थों की गुण या प्रकृति पर आश्रित होकर
सादृश्य द्वारा तुलना की जाए तो उसे 'उपमा' समझना चाहिए ॥ ४४ ॥
एकस्यैकेन सा कार्या² ह्यनेकेनाथवा पुनः ।
अनेकस्य तथैकेन बहूनां बहुभिस्तथा ॥ ४५ ॥
यह तुलना एक पदार्थ की एक से या अनेक से, या अनेकों की एक से,
या अनेकों की अनेकों से की जाती है ॥ ४५ ॥
तुल्यन्ते शशिनः वक्त्रमित्येकेनेकसंश्रया³ ।
⁴शशाङ्कवत्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति भवेत्तु⁵ या ॥ ४६ ॥
⁶एकस्यानेकविषया सोपमा परिकीर्तिता ।
श्येनबर्हिणभासानां⁷ तुल्यार्थं⁸ इति या भवेत् ॥ ४७ ॥
एकस्य बहुभिः सा स्यादुपमा नाटकाश्रया⁹ ।
¹⁰बहूनां बहुभिर्ज्ञेया घना इव गजा इति ॥ ४८ ॥
(इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं ) 'तेरा मुख चन्द्र के समान है'
में एक की उपमा एक से दी गई है । 'नक्षत्र चन्द्रमा की तरह प्रकाशित हैं',
में अनेकों की उपमा एक से है । 'बाज, मयूर ( तथा गिद्ध ) के समान नेत्र'
१. यहाँ 'उपमीयते' पद से उपमेय का, सादृश्य पद से साधारण धर्म का
गुणाकृति के द्वारा इवादि वाचक का तथा समाश्रय शब्द से उसी का
आश्रय ग्रहण निदर्शित किया गया है ।
१. विज्ञेया—क० ।
२. कार्यानेकेनाप्यथवा पुनः—ख०; ग० ।
३. इति ह्येककृता भवेत्—क०, ख० ।
४. चन्द्रवत्सम्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति द्विजोत्तमाः—क० ।
५. भवेद्धि या—क० । ६. एकेन सा त्वनेकेषामुपमा—क० ।
७. गृध्राणां—क० । ८. तुल्याक्ष—क० ।
९. नाटकाश्रये—क० ।
१०. घना इव गजा यत्र बहूनां बहुभिस्तथा—क० ।

२८८ :नाट्यशास्त्रम्:
में एक की (नेत्र की) अनेकों से उपमा है तथा 'हाथी बादलों की तरह है'
में अनेकों की अनेकों से उपमा है ॥ ४६-४८ ॥
उपमा के पांच प्रकार (विभेद)
प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशी तथा ।
किञ्चिच्च सदृशी ज्ञेया ह्युपमा पञ्चधा पुनः ॥ ४९ ॥
उपमा के पांच प्रकार हैं। जो (१) प्रशंसा, (२) निन्दा, (३)
कल्पिता, (४) सदृशी तथा (५) किञ्चित् सदृशी ॥ ४९ ॥
प्रशंसा¹ यथा—
दृष्ट्वा² तु तां विशालाक्षीं तुतोष मनुजाधिपः ।
मुनिभिः साधितां कृच्छ्रात्³ सिद्धिं मूर्त्तिमतीमिव ॥ ५० ॥
प्रशंसा का उदाहरण—मुनिजन द्वारा कष्ट से अर्जित सिद्धि के समान
उस विशालाक्षी रमणी को देखकर वह राजा प्रसन्न हुआ ॥ ५० ॥
निन्दा यथा—
सा तं सर्वगुणैर्हीनं ⁴सस्वजे कर्कशच्छविम् ।
वने कण्टकिनं वल्ली ⁵दावदग्धमिव द्रुमम् ॥ ५१ ॥
निन्दा का उदाहरण—उस रमणी ने सब गुणों से हीन बेढंगी शक्ल
वाले (कर्कशच्छवि) उस पुरुष का—दावाग्नि से दग्ध कांटे वाले वृक्ष का
लता के समान आलिंगन किया ॥ ५१ ॥
कल्पिता यथा—
क्षरन्तो⁶ दानसलिलं लीलामन्थरगामिनः ।
मतङ्गजा विराजन्ते जङ्गमा इव पर्वताः ॥ ५२ ॥
कल्पिता का उदाहरण—मदजल के वर्षण करने वाले, लीला से मन्द-
मन्द गति शाली ये गजराज जंगम पर्वतों के समान दिखाई देते हैं ॥ ५२ ॥
सदृशी यथा—
यत्त्वयाद्य कृतं कर्म परचित्तानुरोधिना ।
सदृशं तत्तवैव स्यादिति मानुषकर्मणः⁷ ॥ ५३ ॥
सदृशी का उदाहरण—दूसरों के (मन के) अनुरोध से आपने जो


१. प्रशंसया यथा—ख०। २. आलप्य तां—क०।
३. कृत्वा—क०। ४. संश्रिता पुरुषाधमम्—क०।
५. वह्निदग्ध—क०; दवदाघमिव—ख०।
६. मदवारिनिषिक्ताङ्गा—क०। ७. कर्मणा—क०।

सप्तदशोऽध्यायः २८९
कार्य किया वह अतिमानुषकर्मा (मनुष्यों से भी बढ़कर कार्य कर लेने वाला)
पुरुष आपके ही समान है ॥ ५३ ॥
किञ्चित्सदृशी यथा—
सम्पूर्णचन्द्रवदना नीलोत्पलदलेक्षणा¹।
²मत्तमातङ्गगमना सम्प्राप्तेयं ³सखी मम ॥ ५४ ॥
किञ्चित् सदृशी का उदाहरण—यह मेरी सखी आ गई, जो पूर्णचन्द्र के
समान मुखवाली, नीलकमल के सदृश नेत्रों वाली तथा मदमत्त हाथी के
समान चालवाली है ॥ ५४ ॥
उपमायाः बुधैरेते ज्ञेया भेदाः समासतः ।
⁴ये शेषा लक्षणैर्नोक्तास्ते ग्राह्या लोककाव्यतः ॥ ५५ ॥
उपमा अलङ्कार के संक्षेप में ये ही भेद होते हैं। इसके जिन अन्य
प्रकारों को यहां लक्षणों द्वारा नहीं कहा गया उन्हें लोक प्रचलित काव्यों के
द्वारा समझा जाए ॥ ५५ ॥
दीपक—
⁵नानाधिकरणार्थानां शब्दानां सम्प्रदीपकम्⁶ ।
एकवाक्येन संयुक्तं⁷ तद्दीपकमिहोच्यते ॥ ५६ ॥
भिन्न विषयों वाले शब्दों का एक वाक्य में दीपक के समान संयोग होने
पर दीपक¹ ( अलंकार ) होता है ॥ ५६ ॥
१. एक अवान्तर वाक्य से बिना संयुक्त हुए ही 'दीपक' की तरह वाक्य का
प्रकाशक होने के कारण इसे 'दीपक' समझा जाए यही कारिका का आशय है।
'दीपक' का आशय आचार्य अभिनवगुप्त ने 'आकांक्षापूरक' माना है जो क्रिया,
गुण तथा जात्यादि से होते हों ।
१. निभेक्षणा—क० । २. मत्तनागेन्द्र—क० । ३. प्रिया—क० ।
४. शेषा ये लक्षणे नोक्ताः संसाध्यास्तेऽपि लोकतः—क०, ये शेषा लक्षणे
नोक्ताः—ख०; ग० ।
५. नानाविकरण—क०; नानाधिकरणस्थानां—क०; ग० ।
६. सम्प्रदीपनः—क०; सम्प्रकीर्तितम्—ख०; सम्प्रदीपतः—ग० ।
७. संयोगो यस्तु—क०; संयोगो यस्तद्दीपकमुच्यते—क०; ग० ।
८. अस्मादनन्तरमेकमधिकं प्रक्षिप्तञ्च पद्यं क—पुस्तके । तद्यथा—
प्रसृतं मधुरं वापि गुणैः सर्वैरलङ्कृतम् ।
काव्ये यन्नाटके विप्रास्तद्दीपकमिति स्मृतम् ॥ इति ।
१६ ना० शा० द्वि०

२४० नाट्यशास्त्रम्
यथा—
सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि ।
गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते ॥ ५७ ॥
उदाहरण :—वहां हंसी से सरोवर, पुष्पों से वृक्ष, मत्त भंवरों से कमल
तथा गोष्ठियों से उपवन ( सदा ) ( शोभा ) युक्त रहते हैं ॥ ५७ ॥
रूपक—
स्वविकल्पेन¹ रचितं तुल्यावयवलक्षणम् ।
किञ्चित्सा दृश्यसम्पन्नं यद् रूपं रूपकन्तु तत् ॥ ५८ ॥
जो अपने विकल्प से निर्मित 'तुल्य अवयवों वाला तथा थोड़ा सादृश्य
गुण युक्त ( अभिन्न ) रूप हो वह 'रूपक' कहलाता है ॥ ५८ ॥
[ ²नानाद्रव्यानुरागाद्यैर्यदौपम्यगुणाश्रयम् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक द्रव्यों के सम्बन्ध से उपमा के गुणों का आश्रय लेकर
जिसके स्वरूप का सम्यक्

सप्तदशोऽध्यायः २९१
यमक—
शब्दाभ्यासस्तु¹ यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।
विशेषदर्शनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ६० ॥
शब्दों की आवृत्ति 'यमक' कहलाती है । जो कि पादों से प्रारंभ होकर
अनेक विधाओं को धारण करती हैं । अब इनके विशेष स्वरूप को बतलाता
हूँ । आप ध्यान पूर्वक सुनें ॥ ६० ॥
यमकों के दस प्रकार—
²पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च ।
³समुद्गयमकञ्चैव विक्रान्तयमकन्तथा ॥ ६१ ॥
यमकं चक्रवालञ्च संदष्टयमकं तथा ।
पादादियमकञ्चैव ⁴तथाम्रेडितमेव च ॥ ६२ ॥
चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।
एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ॥ ६३ ॥
दृश्य काव्य (नाटक) में होनेवाले यमक के दस प्रकार होते हैं।
यथा—(१) पादान्तयमक, (२) काञ्ची-यमक, (३) समुद्ग-यमक,
(४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवाल-यमक, (६) संदष्ट-यमक,
(७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक, (९) चतुर्व्यवसित-यमक
तथा (१०) माला-यमक ॥ ६१–६३ ॥
पादान्तयमक—
चतुर्णां यत्र पादानान्ते स्यात् सममक्षरम्⁵ ।
तद्धि पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६४ ॥
(लक्षण) यदि चारों पादों के अन्त में समान पद (अक्षर) हो तो
उसे 'पादान्तयमक' समझना चाहिये ॥ ६४ ॥
यथा—दिनक्षयात् संहतरश्मिमण्डलं
दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् ।
१. 'यमक' के भरतमुनि ने १० प्रभेद किये हैं । आचार्य भामह ने इसके
५ भेद माने हैं तथा भरतमुनि के १० प्रभेदों का अपने भेदों में अन्तर्भाव
भी निर्दिष्ट किया है । (द्र० भाम० काव्या० २।९०)
१. शब्दाभ्यासं—कं० । २. पदान्त—क० ।
३. सामुद्ग—क० । ४. आम्रेडितमथापि च—क० ।
५. स्याद् यमकाक्षरम्—क० ।

२९२ नाट्यशास्त्रम्
विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं
यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम्¹ ॥ ६५ ॥
दिन की समाप्ति पर (सायंकाल) सूर्य का रक्ताभ मण्डल अपने
रश्मिमण्डल को समेटते हुए, आकाश में स्वर्णिमवृत्त जैसा चमकते हुए
तरुणियों के उरोजमण्डलों जैसा प्रतीत हो रहा है ॥ ६५ ॥
काञ्चीयमक—
पादस्यादौ तथान्ते² च यत्र³ स्यातां पदे समे ।
तत् काञ्चीयमकं नाम⁴ विज्ञेयं सूरिभिर्यथा ॥ ६६ ॥
यदि पाद के आदि तथा अन्त में समान पद हों तो उसे 'काञ्ची-
यमक' जानें ॥ ६६ ॥
यथा—⁵यामं यामं चन्द्रवतीनां द्रवतीनां
व्यक्ताव्यक्ता सा⁶ रजनीनां रजनीनाम् ।
फुल्ले फुल्ले सभ्रमरे वा भ्रमरे वा
रामा रामा विस्मयते च स्मयते च ॥ ६७ ॥
चन्द्र से पूर्ण रात्रियों के लम्बे प्रहर (याम) का—जो सुन्दरियों के
सान्निध्य में बीत रहे हैं—ज्ञान कभी रहता है और कभी बिखर जाता है
तथा पुष्प भ्रमरों से युक्त तथा विहीन हो रहे हैं तथा अनिन्द्य ललना गण
कहीं उसके कारण मुस्करा रही हैं और विस्मित हो रही हैं ॥ ६७ ॥
समुद्ग यमक—
⁷अर्धेनैकेन यद्वृत्तं सर्वमेव⁸ समाप्यते ।
⁹समुद्गयमकं तत्तु¹⁰ विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६८ ॥
लक्षण वृत्त के अर्ध भाग की आवृत्ति द्वारा सम्पूर्ण वृत्त की पूर्ति 'समुद्ग
यमक' कहलाती है ॥ ६८ ॥
१. क० पुस्तके तु—
लोकानां प्रभविष्णुर्दैत्येन्द्रगदानिपातनसहिष्णुः ।
जयति सुरदैत्यजिष्णुर्भगवानसुरवरमथनकारि विष्णुः ॥
इति पद्यम् अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
२. तथा चादौ—क०, ग० तथा चान्ते—ख० ।
३. स्यातां यत्र—ख०; स्यातां तत्र—ग० । ४. चैव—ग० ।
५. माया माया—ख०; ग० । ६. सारजनी सा रजनी सा—क० ।
७. सार्धेनैकेन—क० । ८. सर्वमेवं—क० ।
९. सामुद्ग—क० । १०. नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २९३
यथा—केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः१ शोभते प्रवरकाननहस्ती ।
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः२ शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥ ६९ ॥
इस विशाल वन-गज के दांत केतकी के पुष्पों जैसे श्वेत पीत दिखाई
दे रहे हैं। तथा हाथी-रूपी विशालवन अपने केतकी के पुष्पों के पीले नीले
रंग के दांतों से और अधिक सुन्दर दिखलाई पड़ता है ॥ ६९ ॥
विक्रान्त यमक—
एकैकं पादमुत्क्रम्य३ द्वौ पादौ सदृशौ यदा४।
विक्रान्तयमकं नाम ५विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७० ॥
यदि एक पाद को छोड़कर दूसरा पाद समान हो (अर्थात् द्वितीय और
चतुर्थ पाद की रचना समान हो) तो उसे 'विक्रान्त यमक' जानें ॥ ७० ॥
यथा—स६ पूर्वं वारणो भूत्वा द्विशृङ्ग इव पर्वतः।
अभवद्दन्तवैकल्याद्विशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ७१ ॥
यह हाथी पहिले अपने दो अंगों (दांत, चोटी) वाले पर्वत से तुलनीय
रहता था अब इसके दोनों दांत टूट जाने से यही शृङ्गहीन पर्वत जैसा हो
रहा है ॥ ७१ ॥
चक्रवाल यमक—
पूर्वस्यान्तेन पादस्य ७परस्यादिर्यदा समः।
चक्रवच्चक्रवालं तद् विज्ञेयं नामतो यथा८ ॥ ७२ ॥
यदि पादान्त शब्द की दूसरे पाद के प्रारंभ में आवृत्ति की जाए तो उसे
'चक्रवाल यमक' कहते हैं ॥ ७२ ॥
यथा—शैलास्तथा९ शत्रुभिराहताहता
हताश्च १०भूयस्त्वनुपुङ्गगैः खगैः।
१. मुकुल—ख०; ग० । २. मुकुल—ख०; ग० ।
३. मुत्क्षिप्य—ख० । ४. यदि—ग० । ५. तद्विज्ञेयमिदं—क० ।
६. सम्पूर्णवारणो—ख०; स पूर्वं वानरो—ग० ।
७. पादस्या—क० ।
८. चक्रवालयमकस्य लक्षणान्तरं क—पुस्तके तु —
तुल्यात् पादद्वयादन्त्यादेकेनादिर्यदा समः ।
सर्वत्र चक्रवालं तद्विज्ञेयं नामतो यथा ॥ इति अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
९. तलैस्तथा—क०; शैला यथा—ख० ग० ।
१०. भूयोऽप्यनु—ख०; बाणैरनुपुङ्गगै—ग० ।

२९४ नाट्यशास्त्रम्
खगैश्च सर्वैर्य्युधिसञ्चिताश्रिता-१
श्रिताधिरूढ़ा २निहतास्तलैस्तलैः ॥ ७३ ॥
जैसे ये पर्वत शत्रुओं के बाणों और उनके पीछे आने वाले शिकारी
पक्षियों से आहत होकर मर गए वैसी ही यह युद्ध भूमि भी ऐसे 'खों वाले'
पक्षियों की तरह बाणों से आच्छादित हो गई है और चिता पर रखे हुए शव
इन पक्षियों की चोंचों से और नखों से क्षतविक्षत हो गए हैं ॥ ७३ ॥
सन्दष्ट-यमक—
आदौ द्वे यत्र पादे तु भवेतामक्षरे समे ।
३सन्दष्टयमकं नाम विज्ञेयं ४नामतो यथा ॥ ७४ ॥
यदि पाद के प्रारंभ में दो समान शब्दों की आवृत्ति हो तो 'सन्दष्ट-
यमक' होता है ॥ ७४ ॥
यथा—
पश्य५ पश्य रमणस्य मे गुणान्६ येन येन वशगां करोति माम् ।
येन येन हि ममैति दर्शनं७ तेन तेन वशगां करोति माम् ॥ ७५ ॥
देखो देखो, मेरे प्रिय की विशेषताएं; जिनसे वह मुझे आकृष्ट कर रहा है,
यह जब भी मेरी दृष्टि में आता है तभी मुझे अपनी ओर झुका लेता है ॥७५॥
पादादियमक—
आदौ पादे ८तु यत्र स्यात् समावेशसमाक्षरः९ ।
पादादियमकं नाम विज्ञेयं१० नामतो यथा ॥ ७६ ॥
यदि प्रत्येक पाद के प्रारंभ में आनेवाले शब्द की आगे के सभी पादों में
आवृत्ति हो तो 'पादादियमक' होता है ॥ ७६ ॥
यथा—विष्णुः सृजति भूतानि विष्णुः संहरते प्रजाः ।
विष्णुः ११प्रसूते त्रैलोक्यं १२विष्णुर्लोकाधिदैवतम् १३ ॥७७॥
१. सञ्चिताञ्चिता—ग० ।
२. निहताः फलैः फलैः—ख; हि हता हता नराः—ग० ।
३. सन्दंशं—क० । ४. तद् बुधैः—ख०; ग० ।
५. यस्य यस्य—ग० । ६. गुणाः—क०; ग० ।
७. दिनमेति—ख०; हि समैति—ग० । ८. पादस्य—ख०; ग० ।
९. समावेशः समाक्षरः—ख०; ग० ।
१०. तद्विज्ञेयं बुधैर्यंथा—ख०; ग० । ११. विष्णुप्रसूतं—क० ।
१२. यच्च—क० । १३. लोकादिदैवतम्—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३९५
विष्णु समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं, वे ही संहार करते हैं तथा वे
ही त्रिलोकी का निर्माण भी करते हैं। ये श्री विष्णु भगवान् सभी लोकों के
स्वामी हैं ॥ ७७ ॥
आम्रेडित यमक—
पादस्यान्त्यं पदं १यत्र द्विर्द्विरेकमिहोच्यते ।
२ज्ञेयमाम्रेडितं नाम यमकं तत्तु सूरिभिः ॥ ७८ ॥
यदि पाद का अन्तिम पद दो बार आवृत्त हो तो उसे आम्रेडित यमक
जानो ॥ ७८ ॥
यथा—
विजृम्भितं निःश्वसितं मुहुर्मुहुः ३कथं विधेय स्मरणं पदे पदे ।
यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुनः ४ध्रुवं गता ते रजनी विना विना ॥७९॥
लम्बी उसासें लेते हुए जैसे ही तुमने उसका नाम लिया उसका मुझे
तुरन्त स्मरण हो आया और फिर निश्चल हो उसी के ध्यान में ( मेरी )
उदास होते हुए मेरी सारी रात बीत गई ॥ ७९ ॥
चतुर्व्यवसित यमक—
सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः ।
चतुर्व्यवसितं नाम तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥ ८० ॥
यदि चारों पाद समान अक्षर वाले हों तो 'चतुर्व्यवसित यमक'
होता है ॥ ८० ॥
यथा— ५वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ।
वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ॥ ८१ ॥
यह समय पुष्पों ( वारण ) ( की बहार ) का है, यही वह ऋतु है जब
हाथी ( वारण ) व्याधिरहित होता है । यह शत्रुओं के ( आक्रमण हेतु )
आने का समय और उनके प्रतीकारार्थ वीरों के युद्धभूमि में कूदने का भी
यही समय है ॥ ८१ ॥
१. यच्च—ग० ।
२. पादान्ताम्रेडितं नाम विज्ञेयं निपुणैर्यथा—ख०; ग० ।
३. यथाभिधानं—क०; ग०; कथाभिधानं—ख० ।
४. तथागता ते—ख०; ग० ।
५. सावारणानामिति सर्वत्र पाठः । ख० पुस्तके; ग० पुस्तके तु 'सावारणा-
नामसमेव' इति पाठः समुपलभ्यते ।

२९६ नाट्यशास्त्रम्
मालायमक—
नानारूपैः स्वरैर्युक्तं१ यत्रैकं व्यञ्जनं भवेत् ।
तन्मालायमकं नाम विज्ञेयं काव्यकोविदैः२ ॥ ८२ ॥
जब अनेक व्यञ्जनों से युक्त एक ही स्वर विभिन्न शब्दों में आता हो तो
उसे मालायमक कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—हली बली हली३ माली खेली४ माली सली जली ।
५खलो बलो बलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु६ ॥ ८३ ॥
जो वीर, मालाओं से विभूषित, हाथ में अनाज की बाली रखे हुए,
खिलाड़ी, लड़खड़ा कर चलने वाले, भावों से ओतप्रोत, शक्तिशाली, चंचल
नेत्रों वाले और हाथ में गदा धरने वाले हैं वे भगवान् बलराम तुम्हारी
रक्षा करें ॥ ८३ ॥
असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया७ रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम्८ ।
रतेन रात्रौ९ रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥८४॥
प्रणय द्वन्द्व में रुचि लेने वाली यह सुन्दरी रमणी रात में अपने
प्रगाढ़ आलिंगन से अपने प्रियतम को बिना लज्जा किये हुए तब तक
रिझाती रहेगी जब तक उसका शत्रु सूर्य सम्मुखवर्ती पूर्व दिशा में उदय
नहीं हो जाता ॥ ८४ ॥
स पुष्कराक्षः क्षतजोक्षिताक्षः१० क्षरत्क्षतेभ्यः क्षतजं दुरीक्ष्यम्११ ।
क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताङ्गः१२ साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥८५॥
यह वीर जो कमल के समान नेत्र वाला है, जिसके नेत्र क्रोध से भरे
होने से रक्त से नहाए हुए से लगते हैं, जिसके घावों से रक्त बह रहा है और
जिसके शरीर के घाव वातायन के समान मोटे और खुले हुए हैं, अतएव
यह सम्प्रति सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र जैसा लग रहा है ॥ ८५ ॥
१. यत्र—ग० । २. पाठकैर्यथा—ख०; पण्डितैर्यथा—ग० ।
३. लली—ख०; ग० । ४. शूली जाली लली जली—ख०; ग० ।
५. बलो बलोच्चलोलाक्षो—ख०; ग० ।
६. त्वाभिरक्षतु—ग० । ७. विग्रहः—ख० ।
८. मनोद्गतम्—क०; रहोगतम्—ख०; ग० ।
९. रात्रि—ख०; ग० । १०. क्षतजीक्षिताक्षः—ख०; ग० ।
११. दुरीक्ष्यः—ख० । १२. संवृताक्षः—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २१७
एभिरर्थक्रियायुक्तैः¹ काव्यं कुर्यात्तु² लक्षणैः।
अतः परं³ प्रवक्ष्यामि काव्यदोषान् गुणाँस्तथा⁴ ॥ ८६ ॥
नाटकों की रचना (उनके) विषय तथा कार्य (अवस्था) आदि का
विचार करते हुए इन अलङ्कारों की योजना काव्य में करनी चाहिए। अब मैं
काव्य रचनाओं में होने वाले दोषों को बतलाता हूँ ॥ ८६ ॥
काव्यदोष—
⁵गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्।
न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं⁶ वै दश काव्यदोषाः ॥८७॥
काव्यगत दोष दस (प्रकार के) हैं। यथा—(१) गूढार्थ,
(२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ,
(६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायादपेत, (८) विषम, (९) विसन्धि
तथा (१०) शब्दच्युत ॥ ८७ ॥
⁷पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमिति⁸ संज्ञितम्।
गूढार्थः—जहां पर्यायवाचक (अप्रसिद्ध) शब्दों द्वारा वर्ण्य या विषय
को कह दिया जाय तो उसे 'गूढार्थ' समझना चाहिए।¹
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र⁹ तदर्थान्तरमिष्यते ॥ ८८ ॥
अर्थान्तर—जहाँ अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे अर्थान्तर²
दोष कहा जाता है ॥ ८८ ॥
१. 'गूढार्थ' में क्लिष्ट शब्द का प्रयोग करने से अर्थ-ज्ञान में कठिनाई आ
जाती है। जैसे—दशरथ के लिये 'एकाधिकनवविमान' पद का प्रयोग।
परवर्ति आचार्योंके 'निहतार्थत्व' दोष से इसकी तुलना की जा सकती है।
२. वर्णनीय अर्थ के साथ किसी अनभीष्ट या अवर्णनीय अर्थ की भी जब साथ-
साथ प्रतीति हो तो 'अर्थान्तर' होता है। जैसे—'चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग
तनुते विप्रेक्षितं सुभ्रुवः' यहाँ काम का बतलाना इष्ट है पर इसी के साथ
बुद्धि में चिन्ता और मोह की भी बिना वर्णन के प्राप्ति हो जाती है।
इसे मम्मटादि सम्मत 'अमतपरार्थता' दोष मानना चाहिए।
१. क्रियापेक्षं—ख०; क्रियापेक्षैः—ग०।
२. कार्यं तु—ख०। ३. ऊर्ध्वं तु वक्ष्यामि—ग०।
४. समासतः—ख०; दोषाँस्तथाविधान्—ग०।
५. अगूढ—ग०। ६. च्युतञ्च शब्दात्—शब्दात् च्युतं—क०।
७. इतः आरभ्य सार्धश्लोकपञ्चकं केषुचिदादर्श पुस्तकेषु नास्ति।
८. मभिसंज्ञितम्—क०; ग०। ९. यत्तु—क०।

२९८ :नाट्यशास्त्रम्
अर्थहीनं त्वसम्बद्धं ¹सावशेषार्थमेव च ।
अर्थहीन—जो असम्बद्ध अर्थ हो या जो अर्थ असमाप्त ( अधूरा ) हो
तो उसे 'अर्थहीन' दोष कहा जाता है ।
भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्य² ग्राम्यमेव च ॥ ८९ ॥
भिन्नार्थ—असभ्य या ग्राम्य अर्थ के सूचक अर्थ को भिन्नार्थ² दोष
जानो ॥ ८९ ॥
विवक्षितोऽन्य³ एवार्थो ⁴यत्रान्यार्थेन विद्यते ।
भिन्नार्थं तदपि⁵ प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः⁶ ॥ ९० ॥
अथवा जहाँ विविक्षित अर्थ के स्थान पर अविवक्षित अर्थ का कथन
किया जाय तो उसे भी विद्वान् 'भिन्नार्थ' दोष कहते हैं ॥ ९० ॥
⁷अविशेषाभिधानं यत्तदेकार्थमिति स्मृतम् ।
१. पूर्व कथन से उत्तर कथन के विरोध होने पर अर्थ के असम्बद्ध हो जाने
से यह दोष हो जाता है । जैसे—'अद्यापि स्मरति रसालसं मनो मे
मुग्धायाः स्मरचतुराणि' इत्यादि । ( मेरा रस या आनन्द से मन्थर मन
अभी भी उस स्मरचतुरा मुग्धा ( भोली ) का स्मरण करता है ) यहाँ
मुग्धा कहकर स्मरचतुरा बतलाना पूर्वकथन से उत्तरकथन का विरोध
है । इसी प्रकार असमाप्त या अधूरे कथन के रहने पर यह उदाहरण—
'स महात्माभाग्यवशान्महापदमुपागतः ।' ( वह महामना भाग्यवश महान्
पद या महती आपत्ति को प्राप्त कर गया । ) प्रस्तुत उदाहरण में
प्रकरण के अनुसार अन्य सम्बद्ध शब्द की न्यूनता या वक्तव्य शेष होने से
'अर्थहीन' दोष हो गया है ।
२. भिन्नार्थ दोष की तीन अवस्था में उपलब्धि होगी । ( १ ) जहाँ व्यवधान
के कारण अर्थ का अन्वय करने में कठिनाई आए, ( २ ) जहाँ असभ्य
या ग्राम्य अर्थ का अभिधान हो तथा ( ३ ) विवक्षित या उद्दिष्ट अर्थ के
विपरीत कथन या उद्दिष्टार्थ का अन्यथाकरण हो ।
१. सा त्वशेषार्थमेव च—ख०; ग० ।
२. मपि—क० । ३. विवक्षितान्य—क० ।
४. यत्वन्यार्थेन भिद्यते—क०; ग० । ५. तत्तु ते—क० ।
६. काव्यविदो जनाः—क०; काव्यविचक्षणाः—ख०; ग० ।
७. एकार्थस्याभिधानं यत्—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २९९
एकार्थ—जहां अनेक शब्दों का एक ही अर्थ के लिए प्रयोग किया जाय
तो 'एकार्थ' नामक दोष होता है।
१अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥ ९१ ॥
अभिप्लुतार्थ—जिसके प्रत्येक पाद में संक्षेप में वाक्यार्थ (पूर्णरूप से)
स्थापित किया जाय उसे 'अभिप्लुतार्थ'२ नामक दोष जानो ॥ ९१ ॥
न्यायादपेतं विज्ञेयं २प्रमाणपरिवर्जितम् ।
न्यायादपेत—प्रमाण रहित विषय का कथन 'न्यायादपेत'३ नामक
काव्य दोष कहलाता है।
वृत्तभेदो३ भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९२ ॥
विषम—छन्दों भंग होने पर 'विषम'४ नामक काव्य-दोष हो जाता है।
४अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् ।
१. एकार्थ दोष का उदाहरण है :—'कुन्देन्दुहारहरहाससितम्' यहाँ वर्ण्य की
शुभ्रता के लिये कुन्द, चन्द्र, पुष्पमाला, शिवजी का हास आदि अनेक
उपमाएँ दी जाने से यह कथन एक ही अर्थ की पूर्ति करता है।
२. प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाने के कारण एकवाक्यता न आने से
अभिप्लुतार्थ दोष हो जाता है। जैसे :—
स राजा नीतिकुशलः सरः कुमुदशोभितम् ।
सर्वाप्रिया वसन्तश्री ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥
यहाँ प्रत्येक पाद का अर्थ दूसरे किसी पाद के विषय से सम्बद्ध नहीं है।
३. प्रमाणरहित विषय का आशय है कि देश तथा काल के या कला एवं
शास्त्रादि के विपरीत अभिधान करना न्यायादपेत दोष है।
जैसे—सुबीरेष्वस्ति नगरी मथुरा नाम विश्रुता ।
अक्षोटनारिकेलाढ्या यस्याः पर्यन्तभूमयः ॥ इति ।
४. यति भंग के या छन्द के लक्षण का व्यवस्थित अनुगमन न करने के
कारण 'विषम' नामक काव्यदोष होगा। इसे ही उत्तरवर्ती आचार्यों ने
'हतवृत्तता' दोष कहा है।
१. अविप्लुतार्थ—क० ।
२. नोपपन्नं भवेत्तु यत्—क०; प्रमाणपरिवर्तितम्—ग०।
३. वृत्तभेदे—क०; वृत्तदोषो—ख०; ग०।
४. अनुपारूढ़शब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः—क०; अनुप्रतिष्ठाशब्दं यत्
तद्विसन्धीति काशितम्—ख०; ग० ।