नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः २८३
आवश्यकताओं की पूर्ति का सुझाव दिया जाए तो उसे 'माला'¹ समझना
चाहिए ॥ २९ ॥
दाक्षिण्य—
हृष्टैः प्रसन्नवदनैर्यत् परस्यानुवर्तनम्¹ ।
क्रियते ²वाक्यचेष्टाभिस्तद्दाक्षिण्यमुदाहृतम्³ ॥ ३० ॥
जब सुखपूर्वक प्रसन्न मुंह, मीठे वचनों और अनुकूल चेष्टाओं के द्वारा
एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ अनुकूल भाव में चलना हो तो इसे
'दाक्षिण्य'² समझना चाहिए ॥ ३० ॥
गर्हण—
यत्र सङ्कीर्तयन् दोषं⁴ गुणमर्थेन दर्शयेत् ।
⁵गुणातिपाताद्दोषाद् वा गर्हणं नाम तद्भवेत् ॥ ३१ ॥
जब दोषों को बतलाकर उन्हें गुण के रूप में वर्णित किया जाए या
गुणों को बतलाकर उन्हें दोष सिद्ध कर दिया जाए तो 'गर्हण'³ समझना
चाहिए ॥ ३१ ॥
अर्थापत्ति—
⁶अर्थान्तरस्य कथने यत्रान्योऽर्थः प्रतीयते⁷ ।
⁸वाक्यमाधुर्यसम्पन्ना सार्थापत्तिरुदाहृता ॥ ३२ ॥
जब किसी मधुर शब्दावली के कहने पर उसी से दूसरे अर्थ की भी
उसके साथ ही प्रतीति हो जाए तो 'अर्थापत्ति'⁴ समझना चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'माला' का केवल उदाहरण ही अभिनवगुप्ताचार्य ने दिया है।
साहित्यदर्पण में इसका भिन्न लक्षण मिलता है।
२. 'दाक्षिण्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'याच्ञा' प्राप्त होता है।
३. 'गर्हण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'कपटसंघात' या 'कपट' प्राप्त
होता है।
४. अर्थापत्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'कार्य' प्राप्त होता है।
१. वर्णनम्—क० । २. वान्यचेष्टाभि—ख०; ग० ।
३. मिति स्मृतम्—ख०; ग० । ४. दोषान्—क० ।
५. गुणाभिवादाद्दोषाद्वा—क० । ६. अन्यमर्थ समालोच्य—क० ।
७. प्रकाश्यते—क० । ८. वाक्यं माधुर्यसंयुक्तं—क० ।