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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२४० नाट्यशास्त्रम्
यथा—
सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि ।
गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते ॥ ५७ ॥
उदाहरण :—वहां हंसी से सरोवर, पुष्पों से वृक्ष, मत्त भंवरों से कमल
तथा गोष्ठियों से उपवन ( सदा ) ( शोभा ) युक्त रहते हैं ॥ ५७ ॥
रूपक—
स्वविकल्पेन¹ रचितं तुल्यावयवलक्षणम् ।
किञ्चित्सा दृश्यसम्पन्नं यद् रूपं रूपकन्तु तत् ॥ ५८ ॥
जो अपने विकल्प से निर्मित 'तुल्य अवयवों वाला तथा थोड़ा सादृश्य
गुण युक्त ( अभिन्न ) रूप हो वह 'रूपक' कहलाता है ॥ ५८ ॥
[ ²नानाद्रव्यानुरागाद्यैर्यदौपम्यगुणाश्रयम् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक द्रव्यों के सम्बन्ध से उपमा के गुणों का आश्रय लेकर
जिसके स्वरूप का सम्यक्