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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 668 में से

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पृष्ठ 402

सप्तदशोऽध्यायः २९१
यमक—
शब्दाभ्यासस्तु¹ यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।
विशेषदर्शनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ६० ॥
शब्दों की आवृत्ति 'यमक' कहलाती है । जो कि पादों से प्रारंभ होकर
अनेक विधाओं को धारण करती हैं । अब इनके विशेष स्वरूप को बतलाता
हूँ । आप ध्यान पूर्वक सुनें ॥ ६० ॥
यमकों के दस प्रकार—
²पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च ।
³समुद्गयमकञ्चैव विक्रान्तयमकन्तथा ॥ ६१ ॥
यमकं चक्रवालञ्च संदष्टयमकं तथा ।
पादादियमकञ्चैव ⁴तथाम्रेडितमेव च ॥ ६२ ॥
चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।
एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ॥ ६३ ॥
दृश्य काव्य (नाटक) में होनेवाले यमक के दस प्रकार होते हैं।
यथा—(१) पादान्तयमक, (२) काञ्ची-यमक, (३) समुद्ग-यमक,
(४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवाल-यमक, (६) संदष्ट-यमक,
(७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक, (९) चतुर्व्यवसित-यमक
तथा (१०) माला-यमक ॥ ६१–६३ ॥
पादान्तयमक—
चतुर्णां यत्र पादानान्ते स्यात् सममक्षरम्⁵ ।
तद्धि पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६४ ॥
(लक्षण) यदि चारों पादों के अन्त में समान पद (अक्षर) हो तो
उसे 'पादान्तयमक' समझना चाहिये ॥ ६४ ॥
यथा—दिनक्षयात् संहतरश्मिमण्डलं
दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् ।
१. 'यमक' के भरतमुनि ने १० प्रभेद किये हैं । आचार्य भामह ने इसके
५ भेद माने हैं तथा भरतमुनि के १० प्रभेदों का अपने भेदों में अन्तर्भाव
भी निर्दिष्ट किया है । (द्र० भाम० काव्या० २।९०)
१. शब्दाभ्यासं—कं० । २. पदान्त—क० ।
३. सामुद्ग—क० । ४. आम्रेडितमथापि च—क० ।
५. स्याद् यमकाक्षरम्—क० ।