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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 668 में से

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पृष्ठ 393

२८२ : नाट्यशास्त्रम्
विपर्यय—
विचारस्यान्यथाभावस्तथादृष्टोपदिष्टयोः । १
सन्देहाज्जायते२ यत्र स विज्ञेयो विपर्ययः ॥ २६ ॥
जब किसी (बात) को देखकर या कहकर फिर उसी विचार का
सन्देह के कारण (परित्याग या) विपरीत स्वरूप हो जाए तो उसे
'विपर्यय' समझना चाहिए ॥ २६ ॥
भ्रंश—
वाच्यमर्थं परित्यज्य दृप्तादिभिरनेकधा ।
अन्यस्मिन्नेव पतनादाशु३ भ्रंशः स दूष्यते ॥ २७ ॥
जब अहंकार (घबराहट या शीघ्रता) आदि के कारण किसी व्यक्ति
द्वारा वाच्यार्थ को छोड़कर कुछ दूसरी ही बात मुंह से निकाली जाए तो
उसे 'भ्रंश' समझना चाहिए२ ॥ २७ ॥
अनुनय—
उभयोः प्रीतिजननो विरुद्धाभिनिवेशयोः ४ ।
५अर्थस्य साधकश्चैव विज्ञेयोऽनुनयो बुधैः ॥ २८ ॥
जो शब्दावली दो प्रतिपक्षी (विरुद्ध) व्यक्तियों की प्रीति सम्पादन
करते हुए अपनी इष्टसिद्धि को प्राप्त करे (तो) उसे 'अनुनय'३ समझना
चाहिए ॥ २८ ॥
माला—
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं६ कीर्त्यन्ते यत्र सूरिभिः ।
प्रयोजनान्यनेकानि सा मालेत्यभिसंज्ञिता ॥ २९ ॥
जब अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए विद्वानों के द्वारा अनेक
१. 'विपर्यय' के स्थान पर अन्यपाठ में 'मिथ्याध्यवसाय' रखा गया है ।
२. भ्रंश के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रियवचन' या 'प्रियोक्ति' प्राप्त होता है ।
३. 'अनुनय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुवृत्ति' है ।
१. दिष्टोपदिष्टयोः—क०; दृष्टोपयोगतः—ख०; ग० ।
२. कल्प्यते यस्तु—ख०; कल्प्यते वस्तु—ग० ।
३. दिह् भ्रंशः स इष्यते—ख० ग० । ४. भिनिविष्टयोः—ख०; ग० ।
५. द्वयर्थस्य—क० ।
६. अनीप्सितार्थं—क०; ईप्सितार्थप्रसिद्धयर्थं—ख०; ग० ।