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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 668 में से

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पृष्ठ 396

सप्तदशोऽध्यायः २८५
जब हृदय में विद्यमान गुप्त अभिलाषाओं को अन्यापदेश (दूसरे की
अवस्थाओं के वर्णन) के द्वारा निदर्शित किया जाए तो इसे 'मनोरथ'१
समझना चाहिए ॥ ३६ ॥
लेश—
यद्वाक्यं १वाक्यकुशलैरुपायेनाभिधीयते ।
२सदृशार्थाभिनिष्पत्या स लेश इति कीर्तितः ॥ ३७ ॥
जब चतुर जन द्वारा किसी बात को विषय की समानता बतलाने वाली
पदावली को प्रयुक्त करते हुए बड़ी खूबी से प्रस्तुत किया जाए तो उसे
'लेश'२ समझना चाहिए ॥ ३७ ॥
क्षोभ—
परदोषैर्विचित्रार्थैर्यत्रात्मा ३परिकीर्त्यन्ते ।
४अदृष्टोऽन्योऽपि वा कश्चित् स तु क्षोभ इति स्मृतः ॥ ३८ ॥
यदि किसी दोष रहित या न देखी हुई वस्तु को भी विचित्र अर्थों के
अभिधान द्वारा दोष से युक्त स्वरूप वाली बतला दे उसे 'क्षोभ'३ समझना
चाहिए । ३९ ॥
गुणकीर्तन—
लोके गुणातिरिक्तानां ५गुणानां यत्र नामभिः ।
एको६ हि शब्द्यते तत्तु विज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ३९ ॥
जब संसार में उपलब्ध होने वाली सारी गुणों की संख्या और स्थिति
से अधिक गुण एक व्यक्ति में बतलाए जाए तो उसे 'गुणकीर्तन'४ समझना
चाहिए ॥ ३९ ॥
१. मनोरथ का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
२. 'लेश' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रतिषेध' प्राप्त होता है ।
३. 'क्षोभ' के स्थान पर संक्षोम तथा संक्षेप पाठ भी मिलता है। इसके
स्थान पर अन्य पाठ में 'परिदेवन' प्राप्त होता है जिसके पाठ परिवाद,
परिवादन तथा परिवेदन भी प्राप्त होते हैं ।
४. गुणकीर्तन का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है ।
१. वादकुशलै—ख० ।
२. सादृश्यार्था—क०; सदृशार्थाविनिष्पन्नः—ख०; ग० ।
३. चाभिधीयते—क० । ४. अदृष्टो—क० ।
५. बहूनां—क० । ६. एकोऽपि—ख०; ग० ।