नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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प्रसिद्धि—
वाक्यैः सातिशयैरुक्ता १वाक्यार्थस्य प्रसाधकैः ।
लोकप्रसिद्धैर्बहुभिः २ प्रसिद्धिरिति कीर्तिता ॥ ३३ ॥
जब अतिशय उत्तम शब्दों वाले वाक्यों के द्वारा—जो अनेक लोक
प्रसिद्ध तथा अपने ( अर्थ के ) साधक अर्थों को वाक्यों में लिए हुए हो—
कथन हो तो उसे 'प्रसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ३३ ॥
पृच्छा—
३यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ ३४ ॥
स्वयं को या दूसरे को सम्बोधन करते हुए जब कल्पित व्यक्ति या
परोक्ष व्यक्ति द्वारा स्वयं को कुछ कहा या पूछा जाए तो उसे 'पृच्छा'
समझना चाहिए ॥ ३४ ॥
सारूप्य
५दृष्टश्रुतानुभूतार्थकथनादि - समुद्भवम्६ ।
७सादृश्यं क्षोभजननं सारूप्यमिति संज्ञितम् ॥ ३५ ॥
जब किसी वस्तु को देखते, सुनते या अनुभव करते हुए उसकी
( सन्दिग्ध ) समानता के कारण बुद्धि में भ्रम उत्पन्न हो जाए तो उसे
'सारूप्य' समझना चाहिए ॥ ३५ ॥
मनोरथ—
८हृदयस्थस्य वाक्यस्य गूढार्थस्य९ विभावकम् ।
अन्यापदेशैः१० कथनं मनोरथ इति स्मृतः ॥ ३६ ॥
१. 'प्रसिद्धि' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनीति' प्राप्त होता है ।
२. पृच्छा का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
३. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिमान' प्राप्त होता है ।
१. स्ववाक्यार्थप्रकाशकैः—क० । २. बह्वर्थैः—क० ।
३. यत्राकरो—ख०; ग० । ४. पृच्छेत् प्रज्ञापयन्नर्थं—क० ।
५. श्रुतादि—क० । ६. कथनाभिः—ख०; ग० ।
७. सादृश्यमक्षजनितं—ख० । ८. हृदयार्थस्य—ख०; ग० ।
९. गूढस्यार्थप्रकाशकम्—सुश्लिष्टार्थप्रकाशकम्—क० ।
१०. पदेशकथनं—क० ।