नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ :नाट्यशास्त्रम्:
में एक की (नेत्र की) अनेकों से उपमा है तथा 'हाथी बादलों की तरह है'
में अनेकों की अनेकों से उपमा है ॥ ४६-४८ ॥
उपमा के पांच प्रकार (विभेद)
प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशी तथा ।
किञ्चिच्च सदृशी ज्ञेया ह्युपमा पञ्चधा पुनः ॥ ४९ ॥
उपमा के पांच प्रकार हैं। जो (१) प्रशंसा, (२) निन्दा, (३)
कल्पिता, (४) सदृशी तथा (५) किञ्चित् सदृशी ॥ ४९ ॥
प्रशंसा¹ यथा—
दृष्ट्वा² तु तां विशालाक्षीं तुतोष मनुजाधिपः ।
मुनिभिः साधितां कृच्छ्रात्³ सिद्धिं मूर्त्तिमतीमिव ॥ ५० ॥
प्रशंसा का उदाहरण—मुनिजन द्वारा कष्ट से अर्जित सिद्धि के समान
उस विशालाक्षी रमणी को देखकर वह राजा प्रसन्न हुआ ॥ ५० ॥
निन्दा यथा—
सा तं सर्वगुणैर्हीनं ⁴सस्वजे कर्कशच्छविम् ।
वने कण्टकिनं वल्ली ⁵दावदग्धमिव द्रुमम् ॥ ५१ ॥
निन्दा का उदाहरण—उस रमणी ने सब गुणों से हीन बेढंगी शक्ल
वाले (कर्कशच्छवि) उस पुरुष का—दावाग्नि से दग्ध कांटे वाले वृक्ष का
लता के समान आलिंगन किया ॥ ५१ ॥
कल्पिता यथा—
क्षरन्तो⁶ दानसलिलं लीलामन्थरगामिनः ।
मतङ्गजा विराजन्ते जङ्गमा इव पर्वताः ॥ ५२ ॥
कल्पिता का उदाहरण—मदजल के वर्षण करने वाले, लीला से मन्द-
मन्द गति शाली ये गजराज जंगम पर्वतों के समान दिखाई देते हैं ॥ ५२ ॥
सदृशी यथा—
यत्त्वयाद्य कृतं कर्म परचित्तानुरोधिना ।
सदृशं तत्तवैव स्यादिति मानुषकर्मणः⁷ ॥ ५३ ॥
सदृशी का उदाहरण—दूसरों के (मन के) अनुरोध से आपने जो
१. प्रशंसया यथा—ख०। २. आलप्य तां—क०।
३. कृत्वा—क०। ४. संश्रिता पुरुषाधमम्—क०।
५. वह्निदग्ध—क०; दवदाघमिव—ख०।
६. मदवारिनिषिक्ताङ्गा—क०। ७. कर्मणा—क०।