नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः २८९
कार्य किया वह अतिमानुषकर्मा (मनुष्यों से भी बढ़कर कार्य कर लेने वाला)
पुरुष आपके ही समान है ॥ ५३ ॥
किञ्चित्सदृशी यथा—
सम्पूर्णचन्द्रवदना नीलोत्पलदलेक्षणा¹।
²मत्तमातङ्गगमना सम्प्राप्तेयं ³सखी मम ॥ ५४ ॥
किञ्चित् सदृशी का उदाहरण—यह मेरी सखी आ गई, जो पूर्णचन्द्र के
समान मुखवाली, नीलकमल के सदृश नेत्रों वाली तथा मदमत्त हाथी के
समान चालवाली है ॥ ५४ ॥
उपमायाः बुधैरेते ज्ञेया भेदाः समासतः ।
⁴ये शेषा लक्षणैर्नोक्तास्ते ग्राह्या लोककाव्यतः ॥ ५५ ॥
उपमा अलङ्कार के संक्षेप में ये ही भेद होते हैं। इसके जिन अन्य
प्रकारों को यहां लक्षणों द्वारा नहीं कहा गया उन्हें लोक प्रचलित काव्यों के
द्वारा समझा जाए ॥ ५५ ॥
दीपक—
⁵नानाधिकरणार्थानां शब्दानां सम्प्रदीपकम्⁶ ।
एकवाक्येन संयुक्तं⁷ तद्दीपकमिहोच्यते ॥ ५६ ॥
भिन्न विषयों वाले शब्दों का एक वाक्य में दीपक के समान संयोग होने
पर दीपक¹ ( अलंकार ) होता है ॥ ५६ ॥
१. एक अवान्तर वाक्य से बिना संयुक्त हुए ही 'दीपक' की तरह वाक्य का
प्रकाशक होने के कारण इसे 'दीपक' समझा जाए यही कारिका का आशय है।
'दीपक' का आशय आचार्य अभिनवगुप्त ने 'आकांक्षापूरक' माना है जो क्रिया,
गुण तथा जात्यादि से होते हों ।
१. निभेक्षणा—क० । २. मत्तनागेन्द्र—क० । ३. प्रिया—क० ।
४. शेषा ये लक्षणे नोक्ताः संसाध्यास्तेऽपि लोकतः—क०, ये शेषा लक्षणे
नोक्ताः—ख०; ग० ।
५. नानाविकरण—क०; नानाधिकरणस्थानां—क०; ग० ।
६. सम्प्रदीपनः—क०; सम्प्रकीर्तितम्—ख०; सम्प्रदीपतः—ग० ।
७. संयोगो यस्तु—क०; संयोगो यस्तद्दीपकमुच्यते—क०; ग० ।
८. अस्मादनन्तरमेकमधिकं प्रक्षिप्तञ्च पद्यं क—पुस्तके । तद्यथा—
प्रसृतं मधुरं वापि गुणैः सर्वैरलङ्कृतम् ।
काव्ये यन्नाटके विप्रास्तद्दीपकमिति स्मृतम् ॥ इति ।
१६ ना० शा० द्वि०