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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 668 में से

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पृष्ठ 398

सप्तदशोऽध्यायः २८७
नाटक आदि में सम्प्राप्त तथा प्रयोग किये जाने वाले अलंकार चार हैं ।
वे हैं—उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक ॥ ४३ ॥
उपमा—
यत्किञ्चित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते ।
उपमा नाम सा¹ ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया ॥ ४४ ॥
काव्यरचना में जब दो पदार्थों की गुण या प्रकृति पर आश्रित होकर
सादृश्य द्वारा तुलना की जाए तो उसे 'उपमा' समझना चाहिए ॥ ४४ ॥
एकस्यैकेन सा कार्या² ह्यनेकेनाथवा पुनः ।
अनेकस्य तथैकेन बहूनां बहुभिस्तथा ॥ ४५ ॥
यह तुलना एक पदार्थ की एक से या अनेक से, या अनेकों की एक से,
या अनेकों की अनेकों से की जाती है ॥ ४५ ॥
तुल्यन्ते शशिनः वक्त्रमित्येकेनेकसंश्रया³ ।
⁴शशाङ्कवत्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति भवेत्तु⁵ या ॥ ४६ ॥
⁶एकस्यानेकविषया सोपमा परिकीर्तिता ।
श्येनबर्हिणभासानां⁷ तुल्यार्थं⁸ इति या भवेत् ॥ ४७ ॥
एकस्य बहुभिः सा स्यादुपमा नाटकाश्रया⁹ ।
¹⁰बहूनां बहुभिर्ज्ञेया घना इव गजा इति ॥ ४८ ॥
(इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं ) 'तेरा मुख चन्द्र के समान है'
में एक की उपमा एक से दी गई है । 'नक्षत्र चन्द्रमा की तरह प्रकाशित हैं',
में अनेकों की उपमा एक से है । 'बाज, मयूर ( तथा गिद्ध ) के समान नेत्र'
१. यहाँ 'उपमीयते' पद से उपमेय का, सादृश्य पद से साधारण धर्म का
गुणाकृति के द्वारा इवादि वाचक का तथा समाश्रय शब्द से उसी का
आश्रय ग्रहण निदर्शित किया गया है ।
१. विज्ञेया—क० ।
२. कार्यानेकेनाप्यथवा पुनः—ख०; ग० ।
३. इति ह्येककृता भवेत्—क०, ख० ।
४. चन्द्रवत्सम्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति द्विजोत्तमाः—क० ।
५. भवेद्धि या—क० । ६. एकेन सा त्वनेकेषामुपमा—क० ।
७. गृध्राणां—क० । ८. तुल्याक्ष—क० ।
९. नाटकाश्रये—क० ।
१०. घना इव गजा यत्र बहूनां बहुभिस्तथा—क० ।