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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२८० नाट्यशास्त्रम्
गुणातिपात
गुणाभिधानैर्विविधैर्विपरीतार्थयोजितैः ।
गुणातिपातो १मधुरैर्निष्ठुरार्थैर्भवेद्यथा२ ॥ १९ ॥
जब किसी के गुण मधुर पदावली में वर्णन करने पर कठोर अर्थ को
लाते हुए (प्रकट करते हुए) विपरीत आशय में (या योजना में) लग
जाए तो उसे 'गुणातिपात' समझना चाहिए१ ॥ १९ ॥
अतिशय
बहून् गुणान् कीर्तयित्वा सामान्यजनसम्भवान् ।
विशेषः कीर्त्यते यस्तु ज्ञेयः सोऽतिशयो बुधैः ॥ २० ॥
जब सामान्य मनुष्यों में दिखने वाले अनेक गुणों का बखान करने के
बाद कुछ गुणगत विशेषताओं को (भी) बतलाया जाए तो उसे 'अतिशय'२
समझना चाहिए ॥ २० ॥
तुल्यतर्क
रूपकैरुपमाभिर्वा३ तुल्यार्थाभिः प्रयोजितः४ ।
५अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शस्तुल्यतर्कः६ प्रकीर्तितः७ ॥ २१ ॥
किसी परोक्ष अर्थ को उपमा या रूपक के द्वारा अर्थगत समानता
बतलाते हुए प्रत्यक्षतः अभिहित किया जाए तो उसे 'तुल्यतर्क'३ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ २१ ॥
पदोच्चय—
बहूनान्तु८ प्रयुक्तानां पदानां९ बहुभिः पदैः ।
उच्चयः सदृशार्थो यः स विज्ञेयः पदोच्चयः ॥ २२ ॥
जब अनेक शब्दों का प्रयोग उन्हीं के समान दूसरे शब्दों को मिलाते
१. अन्य पाठ में 'गुणानुवाद' इसी का अभिधान किया गया है। लक्षण भी
भिन्न है।
२. 'अतिशय' का लक्षण दोनों पाठों में भिन्न है।
३. 'तुल्यतर्क' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आक्रन्द' है।

१. निष्ठुरार्थों—क० । २. भवेदथ—ख०; ग० ।
३. रुपमानैर्वा—ख०; ग० । ४. प्रयोक्तृभिः—ख०; ग० ।
५. अप्रत्ययार्थ—ख०; ग० । ६. संस्पृष्टः—क० ।
७. इति स्मृतः—क० । ८. सम्प्रयुक्तानां—क० ।
९. पादानां—ख०; ग० ।