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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

२९२ नाट्यशास्त्रम्
विभाति ताम्रं दिवि सूर्यमण्डलं
यथा तरुण्याः स्तनभारमण्डलम्¹ ॥ ६५ ॥
दिन की समाप्ति पर (सायंकाल) सूर्य का रक्ताभ मण्डल अपने
रश्मिमण्डल को समेटते हुए, आकाश में स्वर्णिमवृत्त जैसा चमकते हुए
तरुणियों के उरोजमण्डलों जैसा प्रतीत हो रहा है ॥ ६५ ॥
काञ्चीयमक—
पादस्यादौ तथान्ते² च यत्र³ स्यातां पदे समे ।
तत् काञ्चीयमकं नाम⁴ विज्ञेयं सूरिभिर्यथा ॥ ६६ ॥
यदि पाद के आदि तथा अन्त में समान पद हों तो उसे 'काञ्ची-
यमक' जानें ॥ ६६ ॥
यथा—⁵यामं यामं चन्द्रवतीनां द्रवतीनां
व्यक्ताव्यक्ता सा⁶ रजनीनां रजनीनाम् ।
फुल्ले फुल्ले सभ्रमरे वा भ्रमरे वा
रामा रामा विस्मयते च स्मयते च ॥ ६७ ॥
चन्द्र से पूर्ण रात्रियों के लम्बे प्रहर (याम) का—जो सुन्दरियों के
सान्निध्य में बीत रहे हैं—ज्ञान कभी रहता है और कभी बिखर जाता है
तथा पुष्प भ्रमरों से युक्त तथा विहीन हो रहे हैं तथा अनिन्द्य ललना गण
कहीं उसके कारण मुस्करा रही हैं और विस्मित हो रही हैं ॥ ६७ ॥
समुद्ग यमक—
⁷अर्धेनैकेन यद्वृत्तं सर्वमेव⁸ समाप्यते ।
⁹समुद्गयमकं तत्तु¹⁰ विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६८ ॥
लक्षण वृत्त के अर्ध भाग की आवृत्ति द्वारा सम्पूर्ण वृत्त की पूर्ति 'समुद्ग
यमक' कहलाती है ॥ ६८ ॥
१. क० पुस्तके तु—
लोकानां प्रभविष्णुर्दैत्येन्द्रगदानिपातनसहिष्णुः ।
जयति सुरदैत्यजिष्णुर्भगवानसुरवरमथनकारि विष्णुः ॥
इति पद्यम् अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
२. तथा चादौ—क०, ग० तथा चान्ते—ख० ।
३. स्यातां यत्र—ख०; स्यातां तत्र—ग० । ४. चैव—ग० ।
५. माया माया—ख०; ग० । ६. सारजनी सा रजनी सा—क० ।
७. सार्धेनैकेन—क० । ८. सर्वमेवं—क० ।
९. सामुद्ग—क० । १०. नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा—ख०; ग० ।