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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 668 में से

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पृष्ठ 392

सप्तदशोऽध्यायः २८१
हुए—उसी अर्थ को बतलाने के लिए ( या उसी कार्य को बनाने के लिए )
किया जाए तो उसे 'पदोच्चय' समझना चाहिए¹ ॥ २२ ॥
दिष्ट ( दृष्ट )—
यथादेशं यथाकालं १यथारूपञ्च वर्ण्यते ।
यत् प्रत्यक्षं परोक्षं वा दिष्टं² तद्वर्णतोऽपि³ वा ॥ २३ ॥
जब किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विषय का देश, काल तथा स्वरूप के
अनुसार ठीक वैसा ही वर्णन कर दिया जाए तो उसे 'दिष्ट'² समझना
चाहिए ॥ २३ ॥
उपदिष्ट—
परिगृह्य तु शास्त्रार्थं यद्वाक्यमभिधीयते ।
४विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते ॥ २४ ॥
जब किसी ( इष्ट ) विषय को शास्त्र का आधार लेकर कहा जाए
तथा जिससे विद्वान् सन्तुष्ट हों जाए तो उसे 'उपदिष्ट'३ समझना
चाहिए ॥ २४ ॥
विचार—
५पूर्वाशयसमानार्थैरप्रत्यक्षार्थसाधनैः ।
६अनेकोपाधिसंयुक्तो विचारः परिकीर्तितः ॥ २५ ॥
जिसमें पिछली कही गई बातों के समान आशय वाले परोक्षार्थ के
साधक अनेक प्रकार के उपायों को दोष-पूर्ण ( या त्रुटिपूर्ण ) रूप से प्रकट
किया जाए उसे 'विचार'४ समझना चाहिए ॥ २५ ॥
१. 'पदोच्चय' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं ।
२. 'दिष्ट' के स्थान पर अन्यत्र 'दृष्ट' पाठ मिलता है । इसके स्थान पर अन्य
पाठ में 'सारूप्य' रखा गया है ।
३. 'उपदिष्ट' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपपत्ति' प्राप्त होता है ।
४. 'विचार' का के स्थान पर अन्य पाठ में पश्चात्ताप है ।
१. पात्रञ्च—क० । २. दृष्टं—क० ।
३. वर्णकोऽपि—क० । ४. विदुर्मनोहरं—क० ।
५. पूर्वं शेष—क०; पूर्वंदेश—ख०; ग० ।
६. तिरस्कृताथंविषयो—क०; अनेकोपोहसंयुक्तो—ख०; ग० ।