नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ नाट्यशास्त्रम्
अनुक्तसिद्धि—
प्रस्तावेनैव शेषोऽर्थः कृत्स्नो यत्र प्रतीयते¹।
वचनेन विनानुक्तसिद्धिः² सा परिकीर्तिता ॥ ४० ॥
जहां बिना अभिहित किये ही प्रस्ताव मात्र से किसी विषय के शेष भाग
की प्रतीति हो जाए उसे 'अनुक्तसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ४० ॥
प्रियोक्ति—
यत् प्रसन्नेन मनसा पूज्यं पूजयितुं वचः ।
हर्षप्रकाशनार्थन्तु सा प्रियोक्तिरुदाहृता ॥ ४१ ॥
जब प्रसन्न चित्त हो पूज्यजन के सम्मान और अपने हर्ष को प्रकट करने
के लिए उपयुक्त शब्दों को उच्चारित किया जाए तो उसे 'प्रियोक्ति' समझना
चाहिए ॥ ४१ ॥
एतानि ³काव्यस्य च लक्षणानि षट्त्रिंशदुद्देशनिदर्शकानि⁴ ।
⁵प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि ⁶यथारसानि ॥ ४२ ॥
नाट्यरचना में प्रयुक्त किये जाने वाले ये ही वे छत्तीस लक्षण हैं जिन्हें
नाट्यरचना के अवसर पर दृष्टि में रखा जाए और नाट्यरचना के शोभा
धायक इन लक्षणों को उपयुक्त रसों के अनुकूल रखते हुए सदा प्रयुक्त करना
चाहिए ॥ ४२ ॥
अलंकार ( तथा उनके लक्षण )—
उपमा ⁷रूपकञ्चैव दीपकं यमकं तथा ।
⁸काव्यस्यैते ह्यलङ्काराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥ ४३ ॥
१. अनुक्तसिद्धि के स्थान पर ही अभिनवगुप्त ने अन्य पाठ में 'परिदेवन'
भी माना है तथा इसके स्थान पर 'क्षोभ' को भी संकेतित किया है ।
२. प्रियोक्ति का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है । अभिनवगुप्तपाद ने इसे 'अंश'
के स्थान पर भी उल्लिखित किया है ।
१. प्रदीयते—क० ।
२. जातु सिद्धिः—क०; विजानाति सिद्धिः—ख; विजानातु सिद्धिः—ग० ।
३. एतानि काव्यस्य विभूषणानि—क०; एतानि वा काव्यविभूषणानि—ख० ।
४. दुद्देश्यनिदर्शनानि ख०; ग० । ५. काव्येषु सोदाहरणानि—ख; ग० ।
६. रसानुरूपम्—क०; बलानुरूपम् ख० ।
७. दीपकञ्चैव रूपकं—ख०; ग० ।
८. अलङ्कारास्तु विज्ञेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः—क० ।