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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

२७२ नाट्यशास्त्रम्
तथा नयन बड़े हों, हाथ और पैरों के तले लाल हों तथा नाक, कपोल,
ललाट तथा कान ऊँचे उठे हुए हों ॥ १६५ ॥
चपला आर्या—
द्वितीयश्च चतुर्थश्च गुरुमध्यगतो भवेत् ।
उभयोरर्धयोर्यत्र विज्ञेया चपला यथा ॥ १६६ ॥
चपला में द्वितीय और चतुर्थ गण ( 'ज' या ) मध्य गुरु के रहते हैं
जो दोनों के अर्धभाग में होता है ॥ १६६ ॥
यथा—उद्भटगामिनी परुषभाषिणी कामचिह्नकृतवेषा ।
जानाति मांस-युक्ता सुरा-प्रिया सर्वतश्चपला ॥ १६७ ॥
वह स्त्री जो अपने पति के प्रतिकूल उद्धत आचरण करे और उसे
कठोर वचन कहे, जिसके वेष (वस्त्रादि) में उपभोग के चिह्न दिखाई दे
रहे हों, जिसके शरीर पर अधिक मांस हो, सुरा पीने की आदत हो,
वह चंचला स्त्री किसी को कभी भी प्राप्त हो सकती है ॥ १६७ ॥
मुखचपला तथा जघनचपला—आर्या
पूर्वार्धे लक्षणं ह्येतदस्याः१ सा च मुखेन तु ।
पश्चिमार्धे२ तु चपला यस्याः सा जघनेन तु ॥ १६८ ॥
जब चपला का लक्षण पूर्वार्द्ध में उपलब्ध हो तो मुख चपला तथा
उत्तरार्ध में लक्षण दिखे तो जघनचपला होती है ॥ १६८ ॥
मुखचपला यथा—
आर्यामुखे तु चपला तथापि चार्या न मे यतः सा तु ।
दक्षा गृहकृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्त्ता ॥ १६९ ॥
मेरी स्त्री वाचाल है पर उसका व्यवहार बुरा नहीं है। वह गृहकार्य में
चतुर है और मेरे दुःखी होने पर वह भी दुःखी हो जाती है ॥ १६९ ॥
जघनजपला यथा—
वरमृगनयने चपलासि वरोरु शशाङ्कदर्पणनिभास्ये ।
कामस्य सारभूते पूर्वमदचारुजघनेन ॥ १७० ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी चंचल आँखें श्रेष्ठ हरिण के समान हैं और तुम्हारा
मुख चाँद या दर्पण के समान (स्वच्छ या आह्लादक) है, तुम्हारी सुन्दर
१. यस्याः सा चपलामुखे—क० ।
२. पश्चिमार्धं भवेद्यत्र जघने चपला तु सा—क० ।

षोडशोऽध्यायः २७३
जंघाए काम की सार एवं पूर्णतः मादक है परन्तु तुम चपला (चंचल स्वभाव)
होने से विश्वास के योग्य नहीं हो ॥ १७१ ॥
उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तु सा ॥ १७२ ॥
यदि पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्ध में 'चपला' का लक्षण समान उपलब्ध हो तो
इसे 'सर्वचपला' आर्या जानों ॥ १७२ ॥
कार्यौ द्वादशमात्रौ च पादावाद्यौ तृतीयकौ ।
अष्टादश द्वितीयश्च तथा पञ्चदशोत्तमाः ॥ १७३ ॥
इस वृत्त में प्रथम तथा तृतीय पाद में बारह मात्राएं तथा दूसरे में
अठारह और अन्तिम पाद में पन्द्रह मात्राएँ रखनी चाहिए ॥ १७३ ॥
'चतुःपञ्चप्रकाराणां चतुष्कानां विशेषतः ।
प्रस्तारयोगमासाद्य बाहुल्यं सम्प्रदर्शयेत् ॥ १७४ ॥
विषम स्थान या पाद में स्थित रहने वाले चार प्रकार के अर्थात् चार
गण रखे जाते हैं । समस्थान या समपाद में पांच प्रकार के गण या पांच गण
को रखते हैं । इनमें जो परस्पर संकीर्णता के द्वारा होने वाला वैशिष्ट्य है
उसे प्रस्तारगत विस्तार से दिखलाया जाता है ॥ १७४ ॥
पञ्च पञ्चाशदन्त्या २ तु त्रिंशदाद्या तथैव च ।
आर्या त्वक्षरपिण्डेन विज्ञेयाऽत्र प्रयोक्तृभिः ॥ १७५ ॥
अन्त्या अर्थात् अन्तिम सर्वलघु के पांच गण में रखा जाए इस प्रकार
इनके पचपन प्रभेद प्रस्तारगत विस्तार से होंगे । प्रथमार्ध में आदि के पाद
के आद्यगण के तीस प्रस्तारगत प्रभेद होंगे । दूसरे के छब्बीस प्रस्तारगत
भेद होंगे । इस प्रकार प्रयोक्तागण आर्या के अक्षर समुदाय को समझें ॥१७५॥
त्रिंशतस्त्वथ वर्णेभ्यो लघुवर्णत्रयं भवेत् ।
शेषाणि गुरुसंज्ञानि ३ एवं सर्वत्र निर्दिशेत् ॥ १७६ ॥
और इन तीस वर्ण गत प्रस्तार भेदों के प्रकार में द्वितीय और षष्ठ
स्थान के साथ अन्तिम स्थान पर स्थित रहने से तीन लघु वर्ण बनते हैं
तथा शेष गुरु संज्ञक वर्ण विभेद होते हैं, ऐसा सभी स्थान पर समझना
चाहिए ॥ १७६ ॥
१. श्लोकोऽयं अभिनवगुप्तव्याख्यातत्वादत्र निवेशितः ।
२. पञ्चाशदाद्या—ख० । ३. गुरुसंख्यानि—क० ।
१८ ना० शा० द्वि०

२७४ नाट्यशास्त्रम्
१ सर्वेषामेव चार्याणामक्षराणां यथाक्रमम् ।
सर्वेषां जातिवृत्तानां२ पूर्वमुत्तरसंख्यया ।
विकल्पं३ गणनां कृत्वा संख्यां पिण्डेन दर्शयेत्४ ॥ १७७ ॥
सभी जातिवृत्तों में विकल्पगत संख्या के पूर्व विभेदों को उत्तर संख्या के
साथ गुणा करके उससे जो समुदाय संख्या बने वही उसका प्रस्तार भेद
होगा जिसे बोधक संख्या के रूप में दिखलाया जाए ॥ १७७ ॥
५ आर्यागीतिरधार्धे च केवलश्चाष्टभिर्गणैः ।
इतरार्धे६ तु षष्ठस्तु न लघुर्गण इष्यते ॥ १७८ ॥
आर्या गीति के आधे भाग में आठ गण रखते हैं और आर्यागीति के
प्रथमार्ध के समान उत्तरार्ध में भी षष्ठ गण के दो भेद माने जाते हैं जिसमें
लघुगण न हों ॥ १७८ ॥
७ वृत्तैरेवन्तु विविधैर्नानाच्छन्दस्समुद्भवैः ।
काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्विताः ॥ १७९ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे छन्दोविचितिर्नाम षोडशोऽध्यायः ।
❧—❧
इन छन्दों के नियमों को जानकर विविध छन्दों में नाटक काव्य आदि
का कविजन ३६ लक्षणों सहित निर्माण करें ॥ १७९ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का 'छन्दोविरचिति नामक सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण ॥
❧—❧
१. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तकेऽधिकम् ।
२. यानि वृत्तानि—ख० ।
३. विकल्पं गणयित्वा तु संख्या पिण्डेन दर्शयेत्—ख० ।
४. निर्द्दिशेत्—ग० ।
५. गीतिरधायैव केवलं त्वष्टभि—ख०; ग० ।
६. इतरार्धेऽपि षष्ठः स्यात् स विकल्पो भवेद् मणः—ख०; इतरा चापि षष्ठा
स्यात् स विकल्पो भवेद्गणः—ग० ।
७. एवं चतुर्विधैर्वृत्तै—ख० ।

३७५

सप्तदशोऽध्यायः
( वाचिकाभिनये ) काव्यादिलक्षणाध्याय
( नाट्य-रचना के छत्तीस ) लक्षण—
भूषणाक्षरसङ्घातौ शोभोदाहरणे तथा ।
हेतुसंशयदृष्टान्ताः प्राप्त्यभिप्राय एव च ॥ १ ॥
निदर्शनं निरुक्तञ्च सिद्धिश्चाथ विशेषणम् ।
गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोच्चयः ॥ २ ॥
^१दिष्टश्चैवोपदिष्टश्च विचारोऽथ विपर्ययः ।
भ्रंशश्चानुनयो माला दाक्षिण्यं गर्हणन्तथा ॥ ३ ॥
अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च पृच्छा सारूप्यमेव च ।
मनोरथश्च लेशश्च ^२सङ्क्षोभो गुणकीर्तनम् ॥ ४ ॥
^३ज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च ।
षट्त्रिंशल्लक्षणान्येवं काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ॥ ५ ॥
(दृश्य) काव्य में छत्तीस लक्षण^१ समायोजित होते हैं। इनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) भूषण ( २ ) अक्षर-संघात ( ३ ) शोभा ( ४ ) उदाहरण
( ५ ) हेतु ( ६ ) संशय ( ७ ) दृष्टान्त ( ८ ) प्राप्ति ( ९ ) अभिप्राय
( १० ) निदर्शन ( ११ ) निरुक्त ( १२ ) सिद्धि ( १३ ) विशेषण ( १४ )
गुणातिपात ( १५ ) गुणातिशय ( १६ ) तुल्यतर्क ( १७ ) पदोच्चय
( १८ ) दिष्ट ( १९ ) उपदिष्ट ( २० ) विचार ( २१ ) विपर्यय ( २२ ) भ्रंश


१. 'लक्षणों' के विषय में नाट्यशास्त्र की टीकाओं में असमानता परिलक्षित
होती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने दस विभिन्न मतों का इस सन्दर्भ में उल्लेख
किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि महापुरुष लक्षण शब्द से लक्षण शब्द इस
सन्दर्भ में तुलना योग्य है। अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह गुण, रीति,
अलंकार आदि सभी से पार्थक्य रखता है। कुछ टीकाकारों ने लक्षणों को
नाट्योपयोगी मानते हुए इसका व्यापक प्रसार भी बतलाया है। इसका विवेचन
परिशिष्ट में दिया गया है।


१. दृष्टञ्चैवोपदिष्टञ्च—ख०; ग० । २. क्षोभोऽथ—ख०; ग० ।
३. ज्ञेयान्यक्त—ख०; ग० ।

(२३) अनुनय (२४) माला (२५) दाक्षिण्य (२६) गर्हण (२७)
अर्थापत्ति (२८) प्रसिद्धि (२९) पृच्छा (३०) सारूप्य (३१)
मनोरथ (३२) लेश (३३) संक्षेप (संक्षोभ) (३४) गुणकीर्तन (३५)
अनुक्त सिद्धि तथा (३६) प्रियवचन (प्रियोक्ति) ॥ १-५ ॥
भूषण१
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिः समलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव 'चित्रार्थैस्तद्भूषणमिति स्मृतम् ॥ ६ ॥
जो काव्य रचना अनेक अलङ्कारों तथा गुणों से अलङ्कारों से सजाए
व्यक्ति के शरीर के सदृश सुशोभित हो रही हो उस विभिन्न अर्थों के गुण-
सूचक लक्षण को 'भूषण' जानो२ ॥ ६ ॥
अक्षरसंघात—
यत्नाल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रमुपवर्ण्यते ।
तमप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ७ ॥
जहां थोड़े श्लिष्ट अक्षरों से विचित्र अर्थ की अभिव्यक्ति हो उसे 'अक्षर-
संघात' नामक लक्षण जानों३ ॥ ७ ॥
१. इस अध्याय में (३६ लक्षणों का निदर्शक) नाट्यशास्त्र का अंश दो
पाठान्तरों में उपलब्ध है। इनमें एक पाठ को प्राचीन टीकाकारों ने लिया
और उसी पाठ का विश्वनाथ तथा सिंहभूपाल प्रभृति ने अनुसरण किया ।
इस पाठ में सभी लक्षणों के अनुष्टुप् श्लोक हैं। हमने भी अपने अनुवाद में इसे
ही प्राथमिकता दी है। दूसरा पाठ—जो कि परवर्ती तथा परिष्कृत प्रतीत
होता है नाट्यशास्त्र के टीकाकारों द्वारा गृहीत है। विशेषतः आचार्य कीर्तिधर,
अभिनवगुप्तपाद तथा आचार्य धनञ्जय आदि के द्वारा । यह सत्रह लक्षणों में
उक्त पाठ से अभिन्नता रखता है जिनमें आठ लक्षण तो दोनों पाठों के समान
है। (द्वितीय पाठ को समग्र एवं सानुवाद अनुबन्ध में देने का उद्योग किया
गया है।) इस प्रकार दोनों ही पाठान्तरों का अर्थ उपलब्ध करवाने का उद्योग
हमने किया है। जिससे इस अध्याय के अध्ययन में बुद्धिभेद उत्पन्न न हो और
आवश्यकता के अनुसार दोनों ही पाठों का उपयोग हो सके।
२. दूसरे पाठ में इसे ही विभूषण माना गया है। लक्षण अनुबन्धाध्याय
में द्रष्टव्य ।
३. अक्षरसंघात का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. विन्यस्तै—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः २७७
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रयुज्यते ।
यत्र २श्लिष्टा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिधीयते ॥ ८ ॥
यदि नवीन तथा मनोहारि अर्थ की असिद्ध या अज्ञात विषय को सिद्ध
या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए श्लेष के द्वारा अभिव्यक्ति हो तो इसे
'शोभा' नामक लक्षण समझना चाहिए१ ॥ ८ ॥
उदाहरण—
यत्र १तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात् ।
२साध्यते निपुणैरर्थस्तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ९ ॥
जब समानार्थक वाक्यों द्वारा किसी अर्थ को प्रकट करते हुए निपुणजन
अपने प्रयोजन को साधें तो उसे 'उदाहरण' नामक लक्षण समझना
चाहिए२ ॥ ९ ॥
हेतु—
यत्प्रयोजनसामर्थ्याद्वाक्यमिष्टार्थसाधनम्३ ।
समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ १० ॥
जब संक्षिप्त और हृदय ग्राही वाक्यावली द्वारा उसके दक्षतापूर्वक प्रयोग
किये जाने के कारण इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाए तो उसे 'हेतु' नामक
लक्षण जानों३ ॥ १० ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं वाक्यं यत्र समाप्यते ।
अनेकत्वाद्विचाराणां स संशय इति स्मृतः ॥ ११ ॥
जब विचारों की अधिकता रहने के कारण बिना (उसके) सम्पूर्ण
आशय का ज्ञान किये ही वाक्य समाप्त हो जाए तो उसे 'संशय' समझना
चाहिए४ ॥ ११ ॥
१. शोभा का लक्षण दोनों पाठों में समानता युक्त है।
२. तुलना, सा० दर्पण ६।१७७ । उदाहरण का लक्षण अन्य पाठ में मिलता है।
३. हेतु का लक्षण अन्य पाठ में दूसरा है। इस लक्षण का विस्पष्टरूप कदाचित्
अस्पष्ट सा है। अभिनवगुप्त की व्याख्या यहाँ विशद है।
४. संशय का लक्षण दोनों पाठों में समान है।
२. श्लक्ष्णविचित्रार्था—ख०; यत्र श्लिष्टं विचित्रार्थम्—ग०।
१. त्वल्पार्थ—ख०; ग० । २. साध्यन्ते निपुणैरर्था—ख०; ग० ।
३. साधकम्—ख०; ग० ।

२७८ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टान्त—
सर्वलोकमनोग्राही यस्तु¹ पक्षार्थसाधकः ।
हेतुर्निदर्शनकृतः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ १२ ॥
हेतु तथा उदाहरण को देते हुए जिसमें किसी विषय या वस्तु का
मनोरंजक रूप में पक्ष-समर्थन किया जाए तो उस वचनावली को 'दृष्टान्त'
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवान्² कांश्चिद्भावो यत्रानुमीयते³ ।
⁴प्राप्तिं तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ १३ ॥
जब कुछ ( सूचनाओं के द्वारा या ) चेष्टाओं को देखकर किसी भाव को
ताड़ लिया जाए तो उसे 'प्राप्ति' नामक ( श्रेष्ठ ) नाटकों में प्राप्त होने वाला
लक्षण समझना चाहिए² ॥ १३ ॥
अभिप्राय—
अभूतपूर्वो यो ⁵ह्यर्थः सादृश्यात् परिकल्पितः ।
लोकस्य हृदयग्राही सोऽभिप्राय इति स्मृतः ॥ १४ ॥
जो विचार मनोग्राही स्वरुप वाला हो तथा जिसकी किसी ने कभी
कल्पना भी न की हो—जब ( दो विषयों की ) समानता के आधार पर उसे
प्रस्तुत या निर्माण किया जाए तो उसे 'अभिप्राय' समझना चाहिए³ ॥ १४ ॥
निदर्शन—( या विपरीत दृष्टि )
यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकीर्तनम् ।
⁶परापेक्षाभ्युदासार्थं तन्निदर्शनमुच्यते ॥ १५ ॥
१. 'दृष्टान्त' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं। इसकी दृष्टान्तालङ्कार से भी
तुलना की जा सकती है।
२. 'प्राप्ति' के लक्षण दोनों पाठों में प्रायः समान हैं।
३. 'अभिप्राय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'युक्ति' प्राप्त होता है।
१. यश्च—क०; पक्षपक्षार्थ—ख०; ग० ।
२. वावयवं किञ्चिद्—क० । ३. यत्रोपमीयते—क० ।
४. अत्रापि ह्यथैतां प्राप्तिं जानीयाल्लक्षणं बुधः—क; प्राप्तुं तमपि
जानीय—ख० ।
५. योऽप्यथोः—ख०; ग० ।
६. परोपेक्ष—क०; परापक्षोभ्युदासार्थ—ख० ।

जिसमें पहिले कही गई किसी भूल या विपरीत दृष्टि को दूर करने के
लिए ( कुछ ) प्रसिद्ध बातों का समर्थन स्वरूप प्रयोग किया जाए तो उसे
'निदर्शन' समझना चाहिए¹ ॥ १५ ॥
निरुक्त—
निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्वोक्तार्थप्रसिद्धये¹।
यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुदाहृतम् ॥ १६ ॥
पिछली अदुष्ट ( निरवद्य ) बात को पुष्ट करने के लिए उसके समर्थन
में प्रयुक्त की जाने वाली वाक्यावली को 'निरूक्त' समझना चाहिए² ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनान्तु³ प्रधानानां नाम ⁴यत्राभिकीर्त्यते।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं सा सिद्धिरभिधीयते ॥ १७ ॥
जिसमें अपने इष्ट विषय को पूर्ण बतलाने के ( या प्राप्त करने के ) लिए
अनेक प्रसिद्ध बड़े व्यक्तियों के नाम लिए जाए तो उसे 'सिद्धि' समझना
चाहिए³ ॥ १७ ॥
विशेषण—
सिद्धान् बहून् प्रधानार्थानुक्त्वा यत्र प्रयुज्यते ।
विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम् ॥ १८ ॥
जब अनेक प्रसिद्ध तथा बड़े विषयों को कहने के बाद उनकी विशेषता
बतलाते हुए किसी बात को कहा जाए तो उसे 'विशेषण' समझना
चाहिए⁴ ॥ १८ ॥
१. 'निदर्शन' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आशीः' प्राप्त होता है। निदर्शन
के लक्षण का आचार्य अभिनवगुप्त ने विवेचन नहीं किया केवल एक
उदाहरण मात्र दे दिया है जिससे यह अधिक स्पष्ट नहीं हो पाया।
२. 'निरुक्त' का लक्षण दोनों पाठों में समानता लिये हुए मिलता है। दूसरे
पाठ में इसके दो भेद भी निदर्शित किये गये हैं।
३. 'सिद्धि' के लक्षण में दोनों पाठों में थोड़ी भिन्नता है।
४. 'विशेषण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'क्रम' मिलता है। लक्षण वहीं
दृष्टव्य।
१. क्तार्थः प्रसिद्धयति—क०।
२. तदप्यागमसम्भूतं निरुक्तमभिनिर्दिशेत्—क०।
३. बहूनाञ्च प्रयुक्तानां—क०। ४. यत्राभिधीयते—क०।

२८० नाट्यशास्त्रम्
गुणातिपात
गुणाभिधानैर्विविधैर्विपरीतार्थयोजितैः ।
गुणातिपातो १मधुरैर्निष्ठुरार्थैर्भवेद्यथा२ ॥ १९ ॥
जब किसी के गुण मधुर पदावली में वर्णन करने पर कठोर अर्थ को
लाते हुए (प्रकट करते हुए) विपरीत आशय में (या योजना में) लग
जाए तो उसे 'गुणातिपात' समझना चाहिए१ ॥ १९ ॥
अतिशय
बहून् गुणान् कीर्तयित्वा सामान्यजनसम्भवान् ।
विशेषः कीर्त्यते यस्तु ज्ञेयः सोऽतिशयो बुधैः ॥ २० ॥
जब सामान्य मनुष्यों में दिखने वाले अनेक गुणों का बखान करने के
बाद कुछ गुणगत विशेषताओं को (भी) बतलाया जाए तो उसे 'अतिशय'२
समझना चाहिए ॥ २० ॥
तुल्यतर्क
रूपकैरुपमाभिर्वा३ तुल्यार्थाभिः प्रयोजितः४ ।
५अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शस्तुल्यतर्कः६ प्रकीर्तितः७ ॥ २१ ॥
किसी परोक्ष अर्थ को उपमा या रूपक के द्वारा अर्थगत समानता
बतलाते हुए प्रत्यक्षतः अभिहित किया जाए तो उसे 'तुल्यतर्क'३ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ २१ ॥
पदोच्चय—
बहूनान्तु८ प्रयुक्तानां पदानां९ बहुभिः पदैः ।
उच्चयः सदृशार्थो यः स विज्ञेयः पदोच्चयः ॥ २२ ॥
जब अनेक शब्दों का प्रयोग उन्हीं के समान दूसरे शब्दों को मिलाते
१. अन्य पाठ में 'गुणानुवाद' इसी का अभिधान किया गया है। लक्षण भी
भिन्न है।
२. 'अतिशय' का लक्षण दोनों पाठों में भिन्न है।
३. 'तुल्यतर्क' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आक्रन्द' है।

१. निष्ठुरार्थों—क० । २. भवेदथ—ख०; ग० ।
३. रुपमानैर्वा—ख०; ग० । ४. प्रयोक्तृभिः—ख०; ग० ।
५. अप्रत्ययार्थ—ख०; ग० । ६. संस्पृष्टः—क० ।
७. इति स्मृतः—क० । ८. सम्प्रयुक्तानां—क० ।
९. पादानां—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८१
हुए—उसी अर्थ को बतलाने के लिए ( या उसी कार्य को बनाने के लिए )
किया जाए तो उसे 'पदोच्चय' समझना चाहिए¹ ॥ २२ ॥
दिष्ट ( दृष्ट )—
यथादेशं यथाकालं १यथारूपञ्च वर्ण्यते ।
यत् प्रत्यक्षं परोक्षं वा दिष्टं² तद्वर्णतोऽपि³ वा ॥ २३ ॥
जब किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विषय का देश, काल तथा स्वरूप के
अनुसार ठीक वैसा ही वर्णन कर दिया जाए तो उसे 'दिष्ट'² समझना
चाहिए ॥ २३ ॥
उपदिष्ट—
परिगृह्य तु शास्त्रार्थं यद्वाक्यमभिधीयते ।
४विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते ॥ २४ ॥
जब किसी ( इष्ट ) विषय को शास्त्र का आधार लेकर कहा जाए
तथा जिससे विद्वान् सन्तुष्ट हों जाए तो उसे 'उपदिष्ट'३ समझना
चाहिए ॥ २४ ॥
विचार—
५पूर्वाशयसमानार्थैरप्रत्यक्षार्थसाधनैः ।
६अनेकोपाधिसंयुक्तो विचारः परिकीर्तितः ॥ २५ ॥
जिसमें पिछली कही गई बातों के समान आशय वाले परोक्षार्थ के
साधक अनेक प्रकार के उपायों को दोष-पूर्ण ( या त्रुटिपूर्ण ) रूप से प्रकट
किया जाए उसे 'विचार'४ समझना चाहिए ॥ २५ ॥
१. 'पदोच्चय' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं ।
२. 'दिष्ट' के स्थान पर अन्यत्र 'दृष्ट' पाठ मिलता है । इसके स्थान पर अन्य
पाठ में 'सारूप्य' रखा गया है ।
३. 'उपदिष्ट' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपपत्ति' प्राप्त होता है ।
४. 'विचार' का के स्थान पर अन्य पाठ में पश्चात्ताप है ।
१. पात्रञ्च—क० । २. दृष्टं—क० ।
३. वर्णकोऽपि—क० । ४. विदुर्मनोहरं—क० ।
५. पूर्वं शेष—क०; पूर्वंदेश—ख०; ग० ।
६. तिरस्कृताथंविषयो—क०; अनेकोपोहसंयुक्तो—ख०; ग० ।

२८२ : नाट्यशास्त्रम्
विपर्यय—
विचारस्यान्यथाभावस्तथादृष्टोपदिष्टयोः । १
सन्देहाज्जायते२ यत्र स विज्ञेयो विपर्ययः ॥ २६ ॥
जब किसी (बात) को देखकर या कहकर फिर उसी विचार का
सन्देह के कारण (परित्याग या) विपरीत स्वरूप हो जाए तो उसे
'विपर्यय' समझना चाहिए ॥ २६ ॥
भ्रंश—
वाच्यमर्थं परित्यज्य दृप्तादिभिरनेकधा ।
अन्यस्मिन्नेव पतनादाशु३ भ्रंशः स दूष्यते ॥ २७ ॥
जब अहंकार (घबराहट या शीघ्रता) आदि के कारण किसी व्यक्ति
द्वारा वाच्यार्थ को छोड़कर कुछ दूसरी ही बात मुंह से निकाली जाए तो
उसे 'भ्रंश' समझना चाहिए२ ॥ २७ ॥
अनुनय—
उभयोः प्रीतिजननो विरुद्धाभिनिवेशयोः ४ ।
५अर्थस्य साधकश्चैव विज्ञेयोऽनुनयो बुधैः ॥ २८ ॥
जो शब्दावली दो प्रतिपक्षी (विरुद्ध) व्यक्तियों की प्रीति सम्पादन
करते हुए अपनी इष्टसिद्धि को प्राप्त करे (तो) उसे 'अनुनय'३ समझना
चाहिए ॥ २८ ॥
माला—
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं६ कीर्त्यन्ते यत्र सूरिभिः ।
प्रयोजनान्यनेकानि सा मालेत्यभिसंज्ञिता ॥ २९ ॥
जब अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए विद्वानों के द्वारा अनेक
१. 'विपर्यय' के स्थान पर अन्यपाठ में 'मिथ्याध्यवसाय' रखा गया है ।
२. भ्रंश के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रियवचन' या 'प्रियोक्ति' प्राप्त होता है ।
३. 'अनुनय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुवृत्ति' है ।
१. दिष्टोपदिष्टयोः—क०; दृष्टोपयोगतः—ख०; ग० ।
२. कल्प्यते यस्तु—ख०; कल्प्यते वस्तु—ग० ।
३. दिह् भ्रंशः स इष्यते—ख० ग० । ४. भिनिविष्टयोः—ख०; ग० ।
५. द्वयर्थस्य—क० ।
६. अनीप्सितार्थं—क०; ईप्सितार्थप्रसिद्धयर्थं—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८३
आवश्यकताओं की पूर्ति का सुझाव दिया जाए तो उसे 'माला'¹ समझना
चाहिए ॥ २९ ॥
दाक्षिण्य—
हृष्टैः प्रसन्नवदनैर्यत् परस्यानुवर्तनम्¹ ।
क्रियते ²वाक्यचेष्टाभिस्तद्दाक्षिण्यमुदाहृतम्³ ॥ ३० ॥
जब सुखपूर्वक प्रसन्न मुंह, मीठे वचनों और अनुकूल चेष्टाओं के द्वारा
एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ अनुकूल भाव में चलना हो तो इसे
'दाक्षिण्य'² समझना चाहिए ॥ ३० ॥
गर्हण—
यत्र सङ्कीर्तयन् दोषं⁴ गुणमर्थेन दर्शयेत् ।
⁵गुणातिपाताद्दोषाद् वा गर्हणं नाम तद्भवेत् ॥ ३१ ॥
जब दोषों को बतलाकर उन्हें गुण के रूप में वर्णित किया जाए या
गुणों को बतलाकर उन्हें दोष सिद्ध कर दिया जाए तो 'गर्हण'³ समझना
चाहिए ॥ ३१ ॥
अर्थापत्ति—
⁶अर्थान्तरस्य कथने यत्रान्योऽर्थः प्रतीयते⁷ ।
⁸वाक्यमाधुर्यसम्पन्ना सार्थापत्तिरुदाहृता ॥ ३२ ॥
जब किसी मधुर शब्दावली के कहने पर उसी से दूसरे अर्थ की भी
उसके साथ ही प्रतीति हो जाए तो 'अर्थापत्ति'⁴ समझना चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'माला' का केवल उदाहरण ही अभिनवगुप्ताचार्य ने दिया है।
साहित्यदर्पण में इसका भिन्न लक्षण मिलता है।
२. 'दाक्षिण्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'याच्ञा' प्राप्त होता है।
३. 'गर्हण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'कपटसंघात' या 'कपट' प्राप्त
होता है।
४. अर्थापत्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'कार्य' प्राप्त होता है।
१. वर्णनम्—क० । २. वान्यचेष्टाभि—ख०; ग० ।
३. मिति स्मृतम्—ख०; ग० । ४. दोषान्—क० ।
५. गुणाभिवादाद्दोषाद्वा—क० । ६. अन्यमर्थ समालोच्य—क० ।
७. प्रकाश्यते—क० । ८. वाक्यं माधुर्यसंयुक्तं—क० ।

२८४ नाट्यशास्त्रम्
प्रसिद्धि—
वाक्यैः सातिशयैरुक्ता १वाक्यार्थस्य प्रसाधकैः ।
लोकप्रसिद्धैर्बहुभिः २ प्रसिद्धिरिति कीर्तिता ॥ ३३ ॥
जब अतिशय उत्तम शब्दों वाले वाक्यों के द्वारा—जो अनेक लोक
प्रसिद्ध तथा अपने ( अर्थ के ) साधक अर्थों को वाक्यों में लिए हुए हो—
कथन हो तो उसे 'प्रसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ३३ ॥
पृच्छा—
३यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ ३४ ॥
स्वयं को या दूसरे को सम्बोधन करते हुए जब कल्पित व्यक्ति या
परोक्ष व्यक्ति द्वारा स्वयं को कुछ कहा या पूछा जाए तो उसे 'पृच्छा'
समझना चाहिए ॥ ३४ ॥
सारूप्य
५दृष्टश्रुतानुभूतार्थकथनादि - समुद्भवम्६ ।
७सादृश्यं क्षोभजननं सारूप्यमिति संज्ञितम् ॥ ३५ ॥
जब किसी वस्तु को देखते, सुनते या अनुभव करते हुए उसकी
( सन्दिग्ध ) समानता के कारण बुद्धि में भ्रम उत्पन्न हो जाए तो उसे
'सारूप्य' समझना चाहिए ॥ ३५ ॥
मनोरथ—
८हृदयस्थस्य वाक्यस्य गूढार्थस्य९ विभावकम् ।
अन्यापदेशैः१० कथनं मनोरथ इति स्मृतः ॥ ३६ ॥
१. 'प्रसिद्धि' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनीति' प्राप्त होता है ।
२. पृच्छा का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
३. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिमान' प्राप्त होता है ।
१. स्ववाक्यार्थप्रकाशकैः—क० । २. बह्वर्थैः—क० ।
३. यत्राकरो—ख०; ग० । ४. पृच्छेत् प्रज्ञापयन्नर्थं—क० ।
५. श्रुतादि—क० । ६. कथनाभिः—ख०; ग० ।
७. सादृश्यमक्षजनितं—ख० । ८. हृदयार्थस्य—ख०; ग० ।
९. गूढस्यार्थप्रकाशकम्—सुश्लिष्टार्थप्रकाशकम्—क० ।
१०. पदेशकथनं—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८५
जब हृदय में विद्यमान गुप्त अभिलाषाओं को अन्यापदेश (दूसरे की
अवस्थाओं के वर्णन) के द्वारा निदर्शित किया जाए तो इसे 'मनोरथ'१
समझना चाहिए ॥ ३६ ॥
लेश—
यद्वाक्यं १वाक्यकुशलैरुपायेनाभिधीयते ।
२सदृशार्थाभिनिष्पत्या स लेश इति कीर्तितः ॥ ३७ ॥
जब चतुर जन द्वारा किसी बात को विषय की समानता बतलाने वाली
पदावली को प्रयुक्त करते हुए बड़ी खूबी से प्रस्तुत किया जाए तो उसे
'लेश'२ समझना चाहिए ॥ ३७ ॥
क्षोभ—
परदोषैर्विचित्रार्थैर्यत्रात्मा ३परिकीर्त्यन्ते ।
४अदृष्टोऽन्योऽपि वा कश्चित् स तु क्षोभ इति स्मृतः ॥ ३८ ॥
यदि किसी दोष रहित या न देखी हुई वस्तु को भी विचित्र अर्थों के
अभिधान द्वारा दोष से युक्त स्वरूप वाली बतला दे उसे 'क्षोभ'३ समझना
चाहिए । ३९ ॥
गुणकीर्तन—
लोके गुणातिरिक्तानां ५गुणानां यत्र नामभिः ।
एको६ हि शब्द्यते तत्तु विज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ३९ ॥
जब संसार में उपलब्ध होने वाली सारी गुणों की संख्या और स्थिति
से अधिक गुण एक व्यक्ति में बतलाए जाए तो उसे 'गुणकीर्तन'४ समझना
चाहिए ॥ ३९ ॥
१. मनोरथ का लक्षण दोनों पाठों में समान है ।
२. 'लेश' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रतिषेध' प्राप्त होता है ।
३. 'क्षोभ' के स्थान पर संक्षोम तथा संक्षेप पाठ भी मिलता है। इसके
स्थान पर अन्य पाठ में 'परिदेवन' प्राप्त होता है जिसके पाठ परिवाद,
परिवादन तथा परिवेदन भी प्राप्त होते हैं ।
४. गुणकीर्तन का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है ।
१. वादकुशलै—ख० ।
२. सादृश्यार्था—क०; सदृशार्थाविनिष्पन्नः—ख०; ग० ।
३. चाभिधीयते—क० । ४. अदृष्टो—क० ।
५. बहूनां—क० । ६. एकोऽपि—ख०; ग० ।

२८६ नाट्यशास्त्रम्
अनुक्तसिद्धि—
प्रस्तावेनैव शेषोऽर्थः कृत्स्नो यत्र प्रतीयते¹।
वचनेन विनानुक्तसिद्धिः² सा परिकीर्तिता ॥ ४० ॥
जहां बिना अभिहित किये ही प्रस्ताव मात्र से किसी विषय के शेष भाग
की प्रतीति हो जाए उसे 'अनुक्तसिद्धि' समझना चाहिए ॥ ४० ॥
प्रियोक्ति—
यत् प्रसन्नेन मनसा पूज्यं पूजयितुं वचः ।
हर्षप्रकाशनार्थन्तु सा प्रियोक्तिरुदाहृता ॥ ४१ ॥
जब प्रसन्न चित्त हो पूज्यजन के सम्मान और अपने हर्ष को प्रकट करने
के लिए उपयुक्त शब्दों को उच्चारित किया जाए तो उसे 'प्रियोक्ति' समझना
चाहिए ॥ ४१ ॥
एतानि ³काव्यस्य च लक्षणानि षट्त्रिंशदुद्देशनिदर्शकानि⁴ ।
⁵प्रबन्धशोभाकरणानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि ⁶यथारसानि ॥ ४२ ॥
नाट्यरचना में प्रयुक्त किये जाने वाले ये ही वे छत्तीस लक्षण हैं जिन्हें
नाट्यरचना के अवसर पर दृष्टि में रखा जाए और नाट्यरचना के शोभा
धायक इन लक्षणों को उपयुक्त रसों के अनुकूल रखते हुए सदा प्रयुक्त करना
चाहिए ॥ ४२ ॥
अलंकार ( तथा उनके लक्षण )—
उपमा ⁷रूपकञ्चैव दीपकं यमकं तथा ।
⁸काव्यस्यैते ह्यलङ्काराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥ ४३ ॥
१. अनुक्तसिद्धि के स्थान पर ही अभिनवगुप्त ने अन्य पाठ में 'परिदेवन'
भी माना है तथा इसके स्थान पर 'क्षोभ' को भी संकेतित किया है ।
२. प्रियोक्ति का अन्य पाठ में लक्षण भिन्न है । अभिनवगुप्तपाद ने इसे 'अंश'
के स्थान पर भी उल्लिखित किया है ।
१. प्रदीयते—क० ।
२. जातु सिद्धिः—क०; विजानाति सिद्धिः—ख; विजानातु सिद्धिः—ग० ।
३. एतानि काव्यस्य विभूषणानि—क०; एतानि वा काव्यविभूषणानि—ख० ।
४. दुद्देश्यनिदर्शनानि ख०; ग० । ५. काव्येषु सोदाहरणानि—ख; ग० ।
६. रसानुरूपम्—क०; बलानुरूपम् ख० ।
७. दीपकञ्चैव रूपकं—ख०; ग० ।
८. अलङ्कारास्तु विज्ञेयाश्चत्वारो नाटकाश्रयाः—क० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८७
नाटक आदि में सम्प्राप्त तथा प्रयोग किये जाने वाले अलंकार चार हैं ।
वे हैं—उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक ॥ ४३ ॥
उपमा—
यत्किञ्चित् काव्यबन्धेषु सादृश्येनोपमीयते ।
उपमा नाम सा¹ ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया ॥ ४४ ॥
काव्यरचना में जब दो पदार्थों की गुण या प्रकृति पर आश्रित होकर
सादृश्य द्वारा तुलना की जाए तो उसे 'उपमा' समझना चाहिए ॥ ४४ ॥
एकस्यैकेन सा कार्या² ह्यनेकेनाथवा पुनः ।
अनेकस्य तथैकेन बहूनां बहुभिस्तथा ॥ ४५ ॥
यह तुलना एक पदार्थ की एक से या अनेक से, या अनेकों की एक से,
या अनेकों की अनेकों से की जाती है ॥ ४५ ॥
तुल्यन्ते शशिनः वक्त्रमित्येकेनेकसंश्रया³ ।
⁴शशाङ्कवत्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति भवेत्तु⁵ या ॥ ४६ ॥
⁶एकस्यानेकविषया सोपमा परिकीर्तिता ।
श्येनबर्हिणभासानां⁷ तुल्यार्थं⁸ इति या भवेत् ॥ ४७ ॥
एकस्य बहुभिः सा स्यादुपमा नाटकाश्रया⁹ ।
¹⁰बहूनां बहुभिर्ज्ञेया घना इव गजा इति ॥ ४८ ॥
(इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं ) 'तेरा मुख चन्द्र के समान है'
में एक की उपमा एक से दी गई है । 'नक्षत्र चन्द्रमा की तरह प्रकाशित हैं',
में अनेकों की उपमा एक से है । 'बाज, मयूर ( तथा गिद्ध ) के समान नेत्र'
१. यहाँ 'उपमीयते' पद से उपमेय का, सादृश्य पद से साधारण धर्म का
गुणाकृति के द्वारा इवादि वाचक का तथा समाश्रय शब्द से उसी का
आश्रय ग्रहण निदर्शित किया गया है ।
१. विज्ञेया—क० ।
२. कार्यानेकेनाप्यथवा पुनः—ख०; ग० ।
३. इति ह्येककृता भवेत्—क०, ख० ।
४. चन्द्रवत्सम्प्रकाशन्ते ज्योतींषीति द्विजोत्तमाः—क० ।
५. भवेद्धि या—क० । ६. एकेन सा त्वनेकेषामुपमा—क० ।
७. गृध्राणां—क० । ८. तुल्याक्ष—क० ।
९. नाटकाश्रये—क० ।
१०. घना इव गजा यत्र बहूनां बहुभिस्तथा—क० ।

२८८ :नाट्यशास्त्रम्:
में एक की (नेत्र की) अनेकों से उपमा है तथा 'हाथी बादलों की तरह है'
में अनेकों की अनेकों से उपमा है ॥ ४६-४८ ॥
उपमा के पांच प्रकार (विभेद)
प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशी तथा ।
किञ्चिच्च सदृशी ज्ञेया ह्युपमा पञ्चधा पुनः ॥ ४९ ॥
उपमा के पांच प्रकार हैं। जो (१) प्रशंसा, (२) निन्दा, (३)
कल्पिता, (४) सदृशी तथा (५) किञ्चित् सदृशी ॥ ४९ ॥
प्रशंसा¹ यथा—
दृष्ट्वा² तु तां विशालाक्षीं तुतोष मनुजाधिपः ।
मुनिभिः साधितां कृच्छ्रात्³ सिद्धिं मूर्त्तिमतीमिव ॥ ५० ॥
प्रशंसा का उदाहरण—मुनिजन द्वारा कष्ट से अर्जित सिद्धि के समान
उस विशालाक्षी रमणी को देखकर वह राजा प्रसन्न हुआ ॥ ५० ॥
निन्दा यथा—
सा तं सर्वगुणैर्हीनं ⁴सस्वजे कर्कशच्छविम् ।
वने कण्टकिनं वल्ली ⁵दावदग्धमिव द्रुमम् ॥ ५१ ॥
निन्दा का उदाहरण—उस रमणी ने सब गुणों से हीन बेढंगी शक्ल
वाले (कर्कशच्छवि) उस पुरुष का—दावाग्नि से दग्ध कांटे वाले वृक्ष का
लता के समान आलिंगन किया ॥ ५१ ॥
कल्पिता यथा—
क्षरन्तो⁶ दानसलिलं लीलामन्थरगामिनः ।
मतङ्गजा विराजन्ते जङ्गमा इव पर्वताः ॥ ५२ ॥
कल्पिता का उदाहरण—मदजल के वर्षण करने वाले, लीला से मन्द-
मन्द गति शाली ये गजराज जंगम पर्वतों के समान दिखाई देते हैं ॥ ५२ ॥
सदृशी यथा—
यत्त्वयाद्य कृतं कर्म परचित्तानुरोधिना ।
सदृशं तत्तवैव स्यादिति मानुषकर्मणः⁷ ॥ ५३ ॥
सदृशी का उदाहरण—दूसरों के (मन के) अनुरोध से आपने जो


१. प्रशंसया यथा—ख०। २. आलप्य तां—क०।
३. कृत्वा—क०। ४. संश्रिता पुरुषाधमम्—क०।
५. वह्निदग्ध—क०; दवदाघमिव—ख०।
६. मदवारिनिषिक्ताङ्गा—क०। ७. कर्मणा—क०।

सप्तदशोऽध्यायः २८९
कार्य किया वह अतिमानुषकर्मा (मनुष्यों से भी बढ़कर कार्य कर लेने वाला)
पुरुष आपके ही समान है ॥ ५३ ॥
किञ्चित्सदृशी यथा—
सम्पूर्णचन्द्रवदना नीलोत्पलदलेक्षणा¹।
²मत्तमातङ्गगमना सम्प्राप्तेयं ³सखी मम ॥ ५४ ॥
किञ्चित् सदृशी का उदाहरण—यह मेरी सखी आ गई, जो पूर्णचन्द्र के
समान मुखवाली, नीलकमल के सदृश नेत्रों वाली तथा मदमत्त हाथी के
समान चालवाली है ॥ ५४ ॥
उपमायाः बुधैरेते ज्ञेया भेदाः समासतः ।
⁴ये शेषा लक्षणैर्नोक्तास्ते ग्राह्या लोककाव्यतः ॥ ५५ ॥
उपमा अलङ्कार के संक्षेप में ये ही भेद होते हैं। इसके जिन अन्य
प्रकारों को यहां लक्षणों द्वारा नहीं कहा गया उन्हें लोक प्रचलित काव्यों के
द्वारा समझा जाए ॥ ५५ ॥
दीपक—
⁵नानाधिकरणार्थानां शब्दानां सम्प्रदीपकम्⁶ ।
एकवाक्येन संयुक्तं⁷ तद्दीपकमिहोच्यते ॥ ५६ ॥
भिन्न विषयों वाले शब्दों का एक वाक्य में दीपक के समान संयोग होने
पर दीपक¹ ( अलंकार ) होता है ॥ ५६ ॥
१. एक अवान्तर वाक्य से बिना संयुक्त हुए ही 'दीपक' की तरह वाक्य का
प्रकाशक होने के कारण इसे 'दीपक' समझा जाए यही कारिका का आशय है।
'दीपक' का आशय आचार्य अभिनवगुप्त ने 'आकांक्षापूरक' माना है जो क्रिया,
गुण तथा जात्यादि से होते हों ।
१. निभेक्षणा—क० । २. मत्तनागेन्द्र—क० । ३. प्रिया—क० ।
४. शेषा ये लक्षणे नोक्ताः संसाध्यास्तेऽपि लोकतः—क०, ये शेषा लक्षणे
नोक्ताः—ख०; ग० ।
५. नानाविकरण—क०; नानाधिकरणस्थानां—क०; ग० ।
६. सम्प्रदीपनः—क०; सम्प्रकीर्तितम्—ख०; सम्प्रदीपतः—ग० ।
७. संयोगो यस्तु—क०; संयोगो यस्तद्दीपकमुच्यते—क०; ग० ।
८. अस्मादनन्तरमेकमधिकं प्रक्षिप्तञ्च पद्यं क—पुस्तके । तद्यथा—
प्रसृतं मधुरं वापि गुणैः सर्वैरलङ्कृतम् ।
काव्ये यन्नाटके विप्रास्तद्दीपकमिति स्मृतम् ॥ इति ।
१६ ना० शा० द्वि०

२४० नाट्यशास्त्रम्
यथा—
सरांसि हंसैः कुसुमैश्च वृक्षाः मत्तैर्द्विरेफैश्च सरोरुहाणि ।
गोष्ठीभिरुद्यानवनानि चैव तस्मिन्नशून्यानि सदा क्रियन्ते ॥ ५७ ॥
उदाहरण :—वहां हंसी से सरोवर, पुष्पों से वृक्ष, मत्त भंवरों से कमल
तथा गोष्ठियों से उपवन ( सदा ) ( शोभा ) युक्त रहते हैं ॥ ५७ ॥
रूपक—
स्वविकल्पेन¹ रचितं तुल्यावयवलक्षणम् ।
किञ्चित्सा दृश्यसम्पन्नं यद् रूपं रूपकन्तु तत् ॥ ५८ ॥
जो अपने विकल्प से निर्मित 'तुल्य अवयवों वाला तथा थोड़ा सादृश्य
गुण युक्त ( अभिन्न ) रूप हो वह 'रूपक' कहलाता है ॥ ५८ ॥
[ ²नानाद्रव्यानुरागाद्यैर्यदौपम्यगुणाश्रयम् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तं तद्रूपकमिति स्मृतम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक द्रव्यों के सम्बन्ध से उपमा के गुणों का आश्रय लेकर
जिसके स्वरूप का सम्यक्

सप्तदशोऽध्यायः २९१
यमक—
शब्दाभ्यासस्तु¹ यमकं पादादिषु विकल्पितम् ।
विशेषदर्शनञ्चास्य गदतो मे निबोधत ॥ ६० ॥
शब्दों की आवृत्ति 'यमक' कहलाती है । जो कि पादों से प्रारंभ होकर
अनेक विधाओं को धारण करती हैं । अब इनके विशेष स्वरूप को बतलाता
हूँ । आप ध्यान पूर्वक सुनें ॥ ६० ॥
यमकों के दस प्रकार—
²पादान्तयमकञ्चैव काञ्चीयमकमेव च ।
³समुद्गयमकञ्चैव विक्रान्तयमकन्तथा ॥ ६१ ॥
यमकं चक्रवालञ्च संदष्टयमकं तथा ।
पादादियमकञ्चैव ⁴तथाम्रेडितमेव च ॥ ६२ ॥
चतुर्व्यवसितञ्चैव मालायमकमेव च ।
एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ॥ ६३ ॥
दृश्य काव्य (नाटक) में होनेवाले यमक के दस प्रकार होते हैं।
यथा—(१) पादान्तयमक, (२) काञ्ची-यमक, (३) समुद्ग-यमक,
(४) विक्रान्त-यमक, (५) चक्रवाल-यमक, (६) संदष्ट-यमक,
(७) पादादि-यमक, (८) आम्रेडित-यमक, (९) चतुर्व्यवसित-यमक
तथा (१०) माला-यमक ॥ ६१–६३ ॥
पादान्तयमक—
चतुर्णां यत्र पादानान्ते स्यात् सममक्षरम्⁵ ।
तद्धि पादान्तयमकं विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ६४ ॥
(लक्षण) यदि चारों पादों के अन्त में समान पद (अक्षर) हो तो
उसे 'पादान्तयमक' समझना चाहिये ॥ ६४ ॥
यथा—दिनक्षयात् संहतरश्मिमण्डलं
दिवीव लग्नं तपनीयमण्डलम् ।
१. 'यमक' के भरतमुनि ने १० प्रभेद किये हैं । आचार्य भामह ने इसके
५ भेद माने हैं तथा भरतमुनि के १० प्रभेदों का अपने भेदों में अन्तर्भाव
भी निर्दिष्ट किया है । (द्र० भाम० काव्या० २।९०)
१. शब्दाभ्यासं—कं० । २. पदान्त—क० ।
३. सामुद्ग—क० । ४. आम्रेडितमथापि च—क० ।
५. स्याद् यमकाक्षरम्—क० ।