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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

(२३) अनुनय (२४) माला (२५) दाक्षिण्य (२६) गर्हण (२७)
अर्थापत्ति (२८) प्रसिद्धि (२९) पृच्छा (३०) सारूप्य (३१)
मनोरथ (३२) लेश (३३) संक्षेप (संक्षोभ) (३४) गुणकीर्तन (३५)
अनुक्त सिद्धि तथा (३६) प्रियवचन (प्रियोक्ति) ॥ १-५ ॥
भूषण१
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिः समलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव 'चित्रार्थैस्तद्भूषणमिति स्मृतम् ॥ ६ ॥
जो काव्य रचना अनेक अलङ्कारों तथा गुणों से अलङ्कारों से सजाए
व्यक्ति के शरीर के सदृश सुशोभित हो रही हो उस विभिन्न अर्थों के गुण-
सूचक लक्षण को 'भूषण' जानो२ ॥ ६ ॥
अक्षरसंघात—
यत्नाल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रमुपवर्ण्यते ।
तमप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ७ ॥
जहां थोड़े श्लिष्ट अक्षरों से विचित्र अर्थ की अभिव्यक्ति हो उसे 'अक्षर-
संघात' नामक लक्षण जानों३ ॥ ७ ॥
१. इस अध्याय में (३६ लक्षणों का निदर्शक) नाट्यशास्त्र का अंश दो
पाठान्तरों में उपलब्ध है। इनमें एक पाठ को प्राचीन टीकाकारों ने लिया
और उसी पाठ का विश्वनाथ तथा सिंहभूपाल प्रभृति ने अनुसरण किया ।
इस पाठ में सभी लक्षणों के अनुष्टुप् श्लोक हैं। हमने भी अपने अनुवाद में इसे
ही प्राथमिकता दी है। दूसरा पाठ—जो कि परवर्ती तथा परिष्कृत प्रतीत
होता है नाट्यशास्त्र के टीकाकारों द्वारा गृहीत है। विशेषतः आचार्य कीर्तिधर,
अभिनवगुप्तपाद तथा आचार्य धनञ्जय आदि के द्वारा । यह सत्रह लक्षणों में
उक्त पाठ से अभिन्नता रखता है जिनमें आठ लक्षण तो दोनों पाठों के समान
है। (द्वितीय पाठ को समग्र एवं सानुवाद अनुबन्ध में देने का उद्योग किया
गया है।) इस प्रकार दोनों ही पाठान्तरों का अर्थ उपलब्ध करवाने का उद्योग
हमने किया है। जिससे इस अध्याय के अध्ययन में बुद्धिभेद उत्पन्न न हो और
आवश्यकता के अनुसार दोनों ही पाठों का उपयोग हो सके।
२. दूसरे पाठ में इसे ही विभूषण माना गया है। लक्षण अनुबन्धाध्याय
में द्रष्टव्य ।
३. अक्षरसंघात का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. विन्यस्तै—ख० ।