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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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२७२ नाट्यशास्त्रम्
तथा नयन बड़े हों, हाथ और पैरों के तले लाल हों तथा नाक, कपोल,
ललाट तथा कान ऊँचे उठे हुए हों ॥ १६५ ॥
चपला आर्या—
द्वितीयश्च चतुर्थश्च गुरुमध्यगतो भवेत् ।
उभयोरर्धयोर्यत्र विज्ञेया चपला यथा ॥ १६६ ॥
चपला में द्वितीय और चतुर्थ गण ( 'ज' या ) मध्य गुरु के रहते हैं
जो दोनों के अर्धभाग में होता है ॥ १६६ ॥
यथा—उद्भटगामिनी परुषभाषिणी कामचिह्नकृतवेषा ।
जानाति मांस-युक्ता सुरा-प्रिया सर्वतश्चपला ॥ १६७ ॥
वह स्त्री जो अपने पति के प्रतिकूल उद्धत आचरण करे और उसे
कठोर वचन कहे, जिसके वेष (वस्त्रादि) में उपभोग के चिह्न दिखाई दे
रहे हों, जिसके शरीर पर अधिक मांस हो, सुरा पीने की आदत हो,
वह चंचला स्त्री किसी को कभी भी प्राप्त हो सकती है ॥ १६७ ॥
मुखचपला तथा जघनचपला—आर्या
पूर्वार्धे लक्षणं ह्येतदस्याः१ सा च मुखेन तु ।
पश्चिमार्धे२ तु चपला यस्याः सा जघनेन तु ॥ १६८ ॥
जब चपला का लक्षण पूर्वार्द्ध में उपलब्ध हो तो मुख चपला तथा
उत्तरार्ध में लक्षण दिखे तो जघनचपला होती है ॥ १६८ ॥
मुखचपला यथा—
आर्यामुखे तु चपला तथापि चार्या न मे यतः सा तु ।
दक्षा गृहकृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्त्ता ॥ १६९ ॥
मेरी स्त्री वाचाल है पर उसका व्यवहार बुरा नहीं है। वह गृहकार्य में
चतुर है और मेरे दुःखी होने पर वह भी दुःखी हो जाती है ॥ १६९ ॥
जघनजपला यथा—
वरमृगनयने चपलासि वरोरु शशाङ्कदर्पणनिभास्ये ।
कामस्य सारभूते पूर्वमदचारुजघनेन ॥ १७० ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी चंचल आँखें श्रेष्ठ हरिण के समान हैं और तुम्हारा
मुख चाँद या दर्पण के समान (स्वच्छ या आह्लादक) है, तुम्हारी सुन्दर
१. यस्याः सा चपलामुखे—क० ।
२. पश्चिमार्धं भवेद्यत्र जघने चपला तु सा—क० ।