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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 668 में से

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पृष्ठ 390

जिसमें पहिले कही गई किसी भूल या विपरीत दृष्टि को दूर करने के
लिए ( कुछ ) प्रसिद्ध बातों का समर्थन स्वरूप प्रयोग किया जाए तो उसे
'निदर्शन' समझना चाहिए¹ ॥ १५ ॥
निरुक्त—
निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्वोक्तार्थप्रसिद्धये¹।
यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुदाहृतम् ॥ १६ ॥
पिछली अदुष्ट ( निरवद्य ) बात को पुष्ट करने के लिए उसके समर्थन
में प्रयुक्त की जाने वाली वाक्यावली को 'निरूक्त' समझना चाहिए² ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनान्तु³ प्रधानानां नाम ⁴यत्राभिकीर्त्यते।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं सा सिद्धिरभिधीयते ॥ १७ ॥
जिसमें अपने इष्ट विषय को पूर्ण बतलाने के ( या प्राप्त करने के ) लिए
अनेक प्रसिद्ध बड़े व्यक्तियों के नाम लिए जाए तो उसे 'सिद्धि' समझना
चाहिए³ ॥ १७ ॥
विशेषण—
सिद्धान् बहून् प्रधानार्थानुक्त्वा यत्र प्रयुज्यते ।
विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम् ॥ १८ ॥
जब अनेक प्रसिद्ध तथा बड़े विषयों को कहने के बाद उनकी विशेषता
बतलाते हुए किसी बात को कहा जाए तो उसे 'विशेषण' समझना
चाहिए⁴ ॥ १८ ॥
१. 'निदर्शन' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आशीः' प्राप्त होता है। निदर्शन
के लक्षण का आचार्य अभिनवगुप्त ने विवेचन नहीं किया केवल एक
उदाहरण मात्र दे दिया है जिससे यह अधिक स्पष्ट नहीं हो पाया।
२. 'निरुक्त' का लक्षण दोनों पाठों में समानता लिये हुए मिलता है। दूसरे
पाठ में इसके दो भेद भी निदर्शित किये गये हैं।
३. 'सिद्धि' के लक्षण में दोनों पाठों में थोड़ी भिन्नता है।
४. 'विशेषण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'क्रम' मिलता है। लक्षण वहीं
दृष्टव्य।
१. क्तार्थः प्रसिद्धयति—क०।
२. तदप्यागमसम्भूतं निरुक्तमभिनिर्दिशेत्—क०।
३. बहूनाञ्च प्रयुक्तानां—क०। ४. यत्राभिधीयते—क०।