नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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सप्तदशोऽध्यायः
( वाचिकाभिनये ) काव्यादिलक्षणाध्याय
( नाट्य-रचना के छत्तीस ) लक्षण—
भूषणाक्षरसङ्घातौ शोभोदाहरणे तथा ।
हेतुसंशयदृष्टान्ताः प्राप्त्यभिप्राय एव च ॥ १ ॥
निदर्शनं निरुक्तञ्च सिद्धिश्चाथ विशेषणम् ।
गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोच्चयः ॥ २ ॥
^१दिष्टश्चैवोपदिष्टश्च विचारोऽथ विपर्ययः ।
भ्रंशश्चानुनयो माला दाक्षिण्यं गर्हणन्तथा ॥ ३ ॥
अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च पृच्छा सारूप्यमेव च ।
मनोरथश्च लेशश्च ^२सङ्क्षोभो गुणकीर्तनम् ॥ ४ ॥
^३ज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च ।
षट्त्रिंशल्लक्षणान्येवं काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ॥ ५ ॥
(दृश्य) काव्य में छत्तीस लक्षण^१ समायोजित होते हैं। इनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) भूषण ( २ ) अक्षर-संघात ( ३ ) शोभा ( ४ ) उदाहरण
( ५ ) हेतु ( ६ ) संशय ( ७ ) दृष्टान्त ( ८ ) प्राप्ति ( ९ ) अभिप्राय
( १० ) निदर्शन ( ११ ) निरुक्त ( १२ ) सिद्धि ( १३ ) विशेषण ( १४ )
गुणातिपात ( १५ ) गुणातिशय ( १६ ) तुल्यतर्क ( १७ ) पदोच्चय
( १८ ) दिष्ट ( १९ ) उपदिष्ट ( २० ) विचार ( २१ ) विपर्यय ( २२ ) भ्रंश
१. 'लक्षणों' के विषय में नाट्यशास्त्र की टीकाओं में असमानता परिलक्षित
होती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने दस विभिन्न मतों का इस सन्दर्भ में उल्लेख
किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि महापुरुष लक्षण शब्द से लक्षण शब्द इस
सन्दर्भ में तुलना योग्य है। अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह गुण, रीति,
अलंकार आदि सभी से पार्थक्य रखता है। कुछ टीकाकारों ने लक्षणों को
नाट्योपयोगी मानते हुए इसका व्यापक प्रसार भी बतलाया है। इसका विवेचन
परिशिष्ट में दिया गया है।
१. दृष्टञ्चैवोपदिष्टञ्च—ख०; ग० । २. क्षोभोऽथ—ख०; ग० ।
३. ज्ञेयान्यक्त—ख०; ग० ।