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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 668 में से

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पृष्ठ 388

सप्तदशोऽध्यायः २७७
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रयुज्यते ।
यत्र २श्लिष्टा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिधीयते ॥ ८ ॥
यदि नवीन तथा मनोहारि अर्थ की असिद्ध या अज्ञात विषय को सिद्ध
या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए श्लेष के द्वारा अभिव्यक्ति हो तो इसे
'शोभा' नामक लक्षण समझना चाहिए१ ॥ ८ ॥
उदाहरण—
यत्र १तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात् ।
२साध्यते निपुणैरर्थस्तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ९ ॥
जब समानार्थक वाक्यों द्वारा किसी अर्थ को प्रकट करते हुए निपुणजन
अपने प्रयोजन को साधें तो उसे 'उदाहरण' नामक लक्षण समझना
चाहिए२ ॥ ९ ॥
हेतु—
यत्प्रयोजनसामर्थ्याद्वाक्यमिष्टार्थसाधनम्३ ।
समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ १० ॥
जब संक्षिप्त और हृदय ग्राही वाक्यावली द्वारा उसके दक्षतापूर्वक प्रयोग
किये जाने के कारण इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाए तो उसे 'हेतु' नामक
लक्षण जानों३ ॥ १० ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं वाक्यं यत्र समाप्यते ।
अनेकत्वाद्विचाराणां स संशय इति स्मृतः ॥ ११ ॥
जब विचारों की अधिकता रहने के कारण बिना (उसके) सम्पूर्ण
आशय का ज्ञान किये ही वाक्य समाप्त हो जाए तो उसे 'संशय' समझना
चाहिए४ ॥ ११ ॥
१. शोभा का लक्षण दोनों पाठों में समानता युक्त है।
२. तुलना, सा० दर्पण ६।१७७ । उदाहरण का लक्षण अन्य पाठ में मिलता है।
३. हेतु का लक्षण अन्य पाठ में दूसरा है। इस लक्षण का विस्पष्टरूप कदाचित्
अस्पष्ट सा है। अभिनवगुप्त की व्याख्या यहाँ विशद है।
४. संशय का लक्षण दोनों पाठों में समान है।
२. श्लक्ष्णविचित्रार्था—ख०; यत्र श्लिष्टं विचित्रार्थम्—ग०।
१. त्वल्पार्थ—ख०; ग० । २. साध्यन्ते निपुणैरर्था—ख०; ग० ।
३. साधकम्—ख०; ग० ।