नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ नाट्यशास्त्रम्
१ सर्वेषामेव चार्याणामक्षराणां यथाक्रमम् ।
सर्वेषां जातिवृत्तानां२ पूर्वमुत्तरसंख्यया ।
विकल्पं३ गणनां कृत्वा संख्यां पिण्डेन दर्शयेत्४ ॥ १७७ ॥
सभी जातिवृत्तों में विकल्पगत संख्या के पूर्व विभेदों को उत्तर संख्या के
साथ गुणा करके उससे जो समुदाय संख्या बने वही उसका प्रस्तार भेद
होगा जिसे बोधक संख्या के रूप में दिखलाया जाए ॥ १७७ ॥
५ आर्यागीतिरधार्धे च केवलश्चाष्टभिर्गणैः ।
इतरार्धे६ तु षष्ठस्तु न लघुर्गण इष्यते ॥ १७८ ॥
आर्या गीति के आधे भाग में आठ गण रखते हैं और आर्यागीति के
प्रथमार्ध के समान उत्तरार्ध में भी षष्ठ गण के दो भेद माने जाते हैं जिसमें
लघुगण न हों ॥ १७८ ॥
७ वृत्तैरेवन्तु विविधैर्नानाच्छन्दस्समुद्भवैः ।
काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्विताः ॥ १७९ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे छन्दोविचितिर्नाम षोडशोऽध्यायः ।
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इन छन्दों के नियमों को जानकर विविध छन्दों में नाटक काव्य आदि
का कविजन ३६ लक्षणों सहित निर्माण करें ॥ १७९ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का 'छन्दोविरचिति नामक सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण ॥
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१. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तकेऽधिकम् ।
२. यानि वृत्तानि—ख० ।
३. विकल्पं गणयित्वा तु संख्या पिण्डेन दर्शयेत्—ख० ।
४. निर्द्दिशेत्—ग० ।
५. गीतिरधायैव केवलं त्वष्टभि—ख०; ग० ।
६. इतरार्धेऽपि षष्ठः स्यात् स विकल्पो भवेद् मणः—ख०; इतरा चापि षष्ठा
स्यात् स विकल्पो भवेद्गणः—ग० ।
७. एवं चतुर्विधैर्वृत्तै—ख० ।