नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २७३
जंघाए काम की सार एवं पूर्णतः मादक है परन्तु तुम चपला (चंचल स्वभाव)
होने से विश्वास के योग्य नहीं हो ॥ १७१ ॥
उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तु सा ॥ १७२ ॥
यदि पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्ध में 'चपला' का लक्षण समान उपलब्ध हो तो
इसे 'सर्वचपला' आर्या जानों ॥ १७२ ॥
कार्यौ द्वादशमात्रौ च पादावाद्यौ तृतीयकौ ।
अष्टादश द्वितीयश्च तथा पञ्चदशोत्तमाः ॥ १७३ ॥
इस वृत्त में प्रथम तथा तृतीय पाद में बारह मात्राएं तथा दूसरे में
अठारह और अन्तिम पाद में पन्द्रह मात्राएँ रखनी चाहिए ॥ १७३ ॥
'चतुःपञ्चप्रकाराणां चतुष्कानां विशेषतः ।
प्रस्तारयोगमासाद्य बाहुल्यं सम्प्रदर्शयेत् ॥ १७४ ॥
विषम स्थान या पाद में स्थित रहने वाले चार प्रकार के अर्थात् चार
गण रखे जाते हैं । समस्थान या समपाद में पांच प्रकार के गण या पांच गण
को रखते हैं । इनमें जो परस्पर संकीर्णता के द्वारा होने वाला वैशिष्ट्य है
उसे प्रस्तारगत विस्तार से दिखलाया जाता है ॥ १७४ ॥
पञ्च पञ्चाशदन्त्या २ तु त्रिंशदाद्या तथैव च ।
आर्या त्वक्षरपिण्डेन विज्ञेयाऽत्र प्रयोक्तृभिः ॥ १७५ ॥
अन्त्या अर्थात् अन्तिम सर्वलघु के पांच गण में रखा जाए इस प्रकार
इनके पचपन प्रभेद प्रस्तारगत विस्तार से होंगे । प्रथमार्ध में आदि के पाद
के आद्यगण के तीस प्रस्तारगत प्रभेद होंगे । दूसरे के छब्बीस प्रस्तारगत
भेद होंगे । इस प्रकार प्रयोक्तागण आर्या के अक्षर समुदाय को समझें ॥१७५॥
त्रिंशतस्त्वथ वर्णेभ्यो लघुवर्णत्रयं भवेत् ।
शेषाणि गुरुसंज्ञानि ३ एवं सर्वत्र निर्दिशेत् ॥ १७६ ॥
और इन तीस वर्ण गत प्रस्तार भेदों के प्रकार में द्वितीय और षष्ठ
स्थान के साथ अन्तिम स्थान पर स्थित रहने से तीन लघु वर्ण बनते हैं
तथा शेष गुरु संज्ञक वर्ण विभेद होते हैं, ऐसा सभी स्थान पर समझना
चाहिए ॥ १७६ ॥
१. श्लोकोऽयं अभिनवगुप्तव्याख्यातत्वादत्र निवेशितः ।
२. पञ्चाशदाद्या—ख० । ३. गुरुसंख्यानि—क० ।
१८ ना० शा० द्वि०