नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टान्त—
सर्वलोकमनोग्राही यस्तु¹ पक्षार्थसाधकः ।
हेतुर्निदर्शनकृतः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ १२ ॥
हेतु तथा उदाहरण को देते हुए जिसमें किसी विषय या वस्तु का
मनोरंजक रूप में पक्ष-समर्थन किया जाए तो उस वचनावली को 'दृष्टान्त'
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवान्² कांश्चिद्भावो यत्रानुमीयते³ ।
⁴प्राप्तिं तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ १३ ॥
जब कुछ ( सूचनाओं के द्वारा या ) चेष्टाओं को देखकर किसी भाव को
ताड़ लिया जाए तो उसे 'प्राप्ति' नामक ( श्रेष्ठ ) नाटकों में प्राप्त होने वाला
लक्षण समझना चाहिए² ॥ १३ ॥
अभिप्राय—
अभूतपूर्वो यो ⁵ह्यर्थः सादृश्यात् परिकल्पितः ।
लोकस्य हृदयग्राही सोऽभिप्राय इति स्मृतः ॥ १४ ॥
जो विचार मनोग्राही स्वरुप वाला हो तथा जिसकी किसी ने कभी
कल्पना भी न की हो—जब ( दो विषयों की ) समानता के आधार पर उसे
प्रस्तुत या निर्माण किया जाए तो उसे 'अभिप्राय' समझना चाहिए³ ॥ १४ ॥
निदर्शन—( या विपरीत दृष्टि )
यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकीर्तनम् ।
⁶परापेक्षाभ्युदासार्थं तन्निदर्शनमुच्यते ॥ १५ ॥
१. 'दृष्टान्त' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं। इसकी दृष्टान्तालङ्कार से भी
तुलना की जा सकती है।
२. 'प्राप्ति' के लक्षण दोनों पाठों में प्रायः समान हैं।
३. 'अभिप्राय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'युक्ति' प्राप्त होता है।
१. यश्च—क०; पक्षपक्षार्थ—ख०; ग० ।
२. वावयवं किञ्चिद्—क० । ३. यत्रोपमीयते—क० ।
४. अत्रापि ह्यथैतां प्राप्तिं जानीयाल्लक्षणं बुधः—क; प्राप्तुं तमपि
जानीय—ख० ।
५. योऽप्यथोः—ख०; ग० ।
६. परोपेक्ष—क०; परापक्षोभ्युदासार्थ—ख० ।