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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

२६२ नाट्यशास्त्रम्
विषम पाद में रहे तो त्रिकों द्वारा जाना जानो वाला यह वृत्त पथ्या
कहलाता है ॥ १२५ ॥
यथा—प्रिय-दैवतमित्रासि, प्रिय सम्बन्धि-बान्धवा।
प्रियदानरता पथ्या दयिते त्वं प्रियासि मे ॥ १२६ ॥
तुम देवता तथा मित्रों का आदर करती हो, सम्बन्धी तथा बान्धवों
पर तुम्हारा स्नेह है, तुम सदा प्रेमपूर्वक इष्ट वस्तु को प्रस्तुत करती हो
तथा हितबुद्धिवाली हो इसलिए हे प्रिये, मुझे तुम अत्यन्त प्रिय हो ॥ १२६ ॥
सर्वविषमपथ्या—
म्रौ गौ तु¹ प्रथमे पादे यू सौ ग्लौ च द्वितीयके ।
पादे र्भौ ग्लौ तृतीये च चतुर्थे तु तसौ लगौ² ॥ १२७ ॥
यदि (अनुष्टुप जाति के वृत्त मे) प्रथम पाद में म, र, ग, ग; दूसरे
पाद में य, स, ल, ग; तीसरे पाद में रगण, भगण, लघु तथा गुरु तथा
चौथे पाद में जगण, सगण लघु तथा गुरु हों तो सर्वविषमा पथ्या वृत्त
कहलाता है ॥ १२७ ॥
यथा—नैवाचारो न ते मित्रं न सम्बन्धिगुण-प्रिया ।
सर्वथा सर्वविषमा पथ्या न भवसि प्रिये ॥ १२८ ॥
हे प्रिये, तुम्हारा व्यवहार अच्छा नहीं, तुम्हारा कोई मित्र नहीं, और न
तुमने अपने सम्बन्धीजन के लिए अच्छे कार्य किये, तुम प्रत्येक बात में बड़ी
स्थूल हो। इसी कारण तुम सभी को बड़ी असहमत बन रही हो ॥ १२८ ॥
विपरीत पथ्या—
अयुजोर्लक्षणं³ ह्येतद्विपरीतन्तु यत्र च।
पथ्या हि विपरीता सा विज्ञेया नामतो यथा⁴ ॥ १२९ ॥
जिसमें प्रथम तथा तीसरे पाद के उपर्युक्त पथ्या के लक्षण विपरीत हो
जाएँ तो उसे विपरीतपथ्या वृत्त जानो ॥ १२९ ॥
यथा—कृतेन⁵ रमणस्य किं सखि रोषेण तेऽप्यर्थम् ।
विपरीता न पथ्यासि, त्वं जड़े केन मोहिता ॥ १३० ॥
१. खलु भवेत् पूर्व—क० । २. पथ्या स्तो ग्लौ चतुर्थके—क० ।
३. एतदुदाहरणं ख —ग० पुस्तकयो र्न विद्यते । ४. युग्मयो—ग० ।
५. बुधैः—ख०; ग० ।
६. त्वं जडे केन मोहिता विपरीता न पथ्यासि—क० ।

षोडशोऽध्यायः २६३
तुमने अपने प्रिय पर रोष दिखला कर क्या कर लिया ? ऐसा लगता
है कि तुम मूर्ख हो और कुछ लोगों के द्वारा उभाड़ी जाने पर अन्यवस्थित
मति (मोहित) हो रही हो। अतएव तुम इस समय बड़ी विपरीत या
असहमत सी बन रही हो, जो ठीक नहीं है ॥ १३० ॥
(अनुष्टुप्) चपला—
चतुर्थादक्षराद्यत्र त्रिलघु स्यादयुक्ततः ।
अनुष्टुप्-चपला¹ सा तु विज्ञेया नामतो यथा ॥ १३१ ॥
यदि अनुष्टुप् वृत्त में चतुर्थ अक्षर से आगे पंचम, षष्ठ तथा सप्तम अक्षर
लघु हो तो उसे अनुष्टुप्-चपला नाम से अभिहित किया जाता है ॥ १३१ ॥
उदा०—न खल्वस्याः प्रियतमः श्रोतव्यं व्याहृतं सख्या ।
नारदस्य प्रतिकृतिः कथ्यते² चपला हीयम् ॥ १३२ ॥
यह उस (कन्या) का प्रियतम नहीं, यह बात मैंने अपनी सखी
की जोर से बातचीत करने से जान ली। यह चंचला स्त्री सचमुच नारद
की दूसरी प्रतिमा है (जो कलह-प्रिया है) ॥ १३२ ॥
विपुला—
विपुला तु युजि ज्ञेया लघुत्वात् सप्तमस्य तु ।
सर्वत्र सप्तमस्यैव केषाञ्चिद्विपुला³ यथा ॥ १३३ ॥
यदि अनुष्टुप् वृत्त के दूसरे तथा चौथे पाद में सातवाँ अक्षर लघु हो
तो (अनुष्टुप्) विपुला वृत्त होता है। कुछ विद्वानों के मत में सभी पादों
के सातवें वर्ण के लघु होने पर विपुला होती है ॥ १३३ ॥
यथा—संक्षिप्ता वज्रवन्मध्ये हेमकुम्भ-निभस्तनि ।
विपुलासि प्रिये⁴ कट्यां, शरच्चन्द्र-निभानने⁵ ॥ १३४ ॥
हे प्रिये ! तुम्हारा शरीर दुबला, तुम्हारा कटिभाग वज्र के समान
पतला, उरोज सुवर्ण-कलश के समान, नितम्ब गुरु तथा विस्तीर्ण एवं मुख
शारदीय चन्द्र के समान सुन्दर है ॥ १३४ ॥
१. विपुला—ग० । २. श्रूयते विपुला हीयम्—क० ।
३. विपुलेरनु—क० । ४. प्रिये श्रोण्यां—क० ।
५. पूर्णचन्द्रनिभानने—क० ।

. समान्यत्र—क०; समास्थाप्य—ख०; ग० ।"
In line 19: "बुधैस्तद्वक्त्रमुच्यते⁷" -> footnote 7 says: "यत्र तद्—ख०; ग० ।"
In line 22: "जागरम्लाननेत्रान्तम्⁸" -> footnote 8 says: "नेत्रञ्च—ख०; ग० ।"
In line 23: "⁹रति-सम्भोगखिन्नं" -> footnote 9 says: "प्रातः सम्भोग—ग० ।"

Everything matches the footnotes 100%!
The text is completely clear and verified.२६४ नाट्यशास्त्रम्
यथा वा—गङ्गेव मेघोपगमे आप्लावित-वसुन्धरा ।
कूलवृक्षानारुजन्ती स्रवन्ती विपुलाचलात्¹ ॥ १३५ ॥
तुम वर्षा के समय विद्यमान रहने वाली गंगा के समान पृथ्वी को लहरों
से ठेलने वाली, किनारे के वृक्षों को ढहने वाली तथा ऊँचे पर्वतों से उतरने
या गिरने वाली हो ॥ १३५ ॥
एवं विविधयोगास्तु² पथ्यापादा भवन्ति हि ।
युग्मौजविषमैः पादैः शेषैरन्यैस्त्रिकैरथ³ ॥ १३६ ॥
[L

षोडशोऽध्यायः २६५
हे सुन्दरि, तुम्हारे अधर दन्तक्षतों से युक्त, जागरण से अलसाई
कोने से युक्त आँखें तथा रति (संभोग) से थका हुआ तुम्हारा चेहरा और
भी सुन्दर हो गया है ॥ १३९ ॥
इत्येषा सर्वविषमा नामतोऽनुष्टुबुच्यते ।
तद्विदां¹ मतवैषम्यं त्रिकादक्षरदस्तथा ॥ १४० ॥
अनुष्टुप् जाति के सर्वविषम स्वरूप में ये भेद हो जाते हैं। इसमें
आचार्यों का मतैक्य नहीं है कि ये त्रिकों से या अक्षरों से लक्षित किये
जाएँ ॥ १४० ॥
वानवासिका
पादे षोडशमात्रास्तु गाथांशक-विकल्पिताः² ।
चतुर्भिरंशकैर्ज्ञेया वृत्तज्ञैर्वानवासिका ॥ १४१ ॥
यदि सोलह मात्राओं से बनने वाले पाद का गाथा छन्द में
(जो कि चार भागों में विभक्त हो) त्रिकों (गणों) के द्वारा या
त्रिकों के भागों द्वारा निरूपण किया जाए तो उसे वानवासिका वृत्त
कहते हैं* ॥ १४१ ॥
यथा—असंस्थितपदा सुविह्वलाङ्गी³ मदस्खलितचेष्टितैर्मनोज्ञा ।
क्व यास्यसि वरोरु सुरतकाले विषमा किं वानवासिका त्वम् ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी चाल लड़खड़ाती हुई, शरीर आवेगपूर्ण है और
मधुपान के कारण तुम्हारी चेष्टाएँ बड़ी ही मधुर हैं। इस प्रणयानन्द के
अवसर पर तुम पीछे हटकर कहाँ जा रही हो ? क्या तुम विषमभावना
वाली (विरागयुक्त) वनवासिनी स्त्री तो नहीं ? ॥ १४२ ॥
केतुमती
स्र्जौ सगौ च प्रथमे पादे तथा चैव तृतीयके ।
केतुमत्यां गणाः प्रोक्ता भौ नगौ गश्च सदा बुधैः ॥ १४३ ॥
यदि प्रथम तथा तृतीय पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु तथा
द्वितीय और चतुर्थपाद में भगण, रगण, नगण तथा गुरु हों तो केतुमती
वृत्त होता है ॥ १४३ ॥

  • पिङ्गलाचार्य ने इसे मात्रासमक माना है जिसका प्रभेद वानवासिका
    होता है ।
    १. द्विधामतं हि वैषम्यं—ख०; ग० ।
    २. यस्या नित्यं भवन्ति हि—क०; त्रिकांशक विकल्पिता—ग० ।
    ३. सविह्वलाङ्गी—क० ।

वक्त्रस्यापरपूर्वस्य⁴ चादौ नौ रो लगौ त्रिकाः ।
न जौ जरौ द्वितीये च शेषाग्रं पुनरेव तु ॥ १४५ ॥
यदि प्रथम और तृतीय पाद में नगण, नगण, रगण, लघु तथा गुरु और
द्वितीय तथा चतुर्थ पाद में नगण जगण तथा रगण हों तो उसे अपरवक्त्र
वृत्त कहते हैं ॥ १४५ ॥
यथा—सुतनु जलपरीतलोचनं⁵ जलदनिरुद्धमिवेन्दुमण्डलम् ।
किमिदमपर-वक्त्रमेव ते शशिवदनेऽद्य मुखं पराङ्मुखम् ॥
अरी चन्द्रमुखी, तुम्हारी आँखें आँसुओं से लबालब क्यों भरी हैं ?
तुम्हारा मुँह ऐसा लग रहा है जैसे मेघों से ढ़का हुआ चाँद हो और
तुम्हारा यह दूसरी ओर मोड़ा हुआ मुँह तो किसी दूसरे जैसा ही दिखने
लगा है। यह सब क्या है ॥ १४६ ॥
पुष्पिताग्रा
नौ र्यौ तु प्रथमे पादे न्जौ⁷ ज्ञौ गश्च तथापरे ।
यत्र⁸ तत् पुष्पिताग्रा स्याद्यदि शेषन्तु पूर्ववत् ॥ १४७ ॥
[L23

षोडशोऽध्यायः २६७
दूसरे तथा चौथे पाद में नगण, जगण, जगण, रगण तथा गुरु हों तो
पुष्पिताग्रा वृत्त होता है ॥ १४७ ॥
यथा—पवनरय¹ विधूतचारुशाखं प्रमुदितकोकिलकण्ठनादरम्यम् ।
मधुकर ²परिगीयमान-शब्दं वरतनु पश्य वनं सुपुष्पिताग्रम्॥१४८॥
सुन्दरि, पुष्पों से अलंकृत इस वन को (सिरे तक) देख जाओ ।
इसमें पवन के वेग से टहनियाँ हिल रही हैं, कोकिल आनन्द में आलाप
कर रहे हैं और भौंरे चारों ओर गूँज रहे हैं ॥ १४८ ॥
उद्गता
स्जौ³ स्लौ चादौ यथा नसौ जगौ भौ ज्लौ गश्च तथा पुनः ।
स्जौ स्जौ गश्च त्रिका ह्येते उद्गतायाः प्रकीर्तिताः ॥१४९॥
जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु हो, द्वितीय पाद
में नगण, सगण, जगण तथा गुरु, तृतीय पाद में भगण, जगण, लघु
तथा गुरु और चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु हो तो
उद्गता वृत्त होता है ॥ १४९ ॥
यथा—तव रोमराजिरतिभाति, सुतनु मदनस्य मञ्जरी ।
नाभिकमलविवरोत्पतिता⁴, भ्रमरावलीव कुसुमात्समुद्गता⁵ ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी यह रोमावाली—जो नाभिकमल के मध्य से
ऊपर की ओर उठ रही है, पुष्पों पर से जा उड़ने वाली भौरों की कतार—
जो कामदेव की कुसुममंजरी पर बैठी हो—के समान अतिशय शोभित हो
रही है ॥ १५० ॥
ललिता
स्जौ⁶ स्लौ च ततो नसौ जगौ नौ सौ चेति तृतीयके ।
स्जौ स्जौ गश्च चतुर्थे तु ललिताया गणाः स्मृताः ॥ १५१ ॥
१. पवनबल—क० । २. रवगीयमानवृक्षं—ख० ; ग० ।
३. भजो ज्लो गश्च तृतीये स्युः स्जी स्जौ गश्च तुरीयके ।
एते त्रिकाः क्रमप्राप्ता उद्गतायां प्रकीर्तिताः ॥—ख० ; ग० ।
४. कमले—ख० ; ग० । ५. कुसुमे समुद्गता—ख० ; ग० ।
६. स्जो जश्च ललितापादे नसौ जो गश्च द्वितीsurface... wait!
६. स्जो जश्च ललितापादे नसौ जो गश्च द्वितीयके ।
नो सौ चैव तृतीये तु द्विः स्जो गश्च चतुर्थके ॥—ख० ; ग० ।

२१८ नाट्यशास्त्रम्
जिसके प्रथमपाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु; द्वितीय
पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु, (अर्थात् प्रथम दो पाद उद्गता के
समान हों) तृतीय पाद में दो नगण और दो सगण तथा चतुर्थ पाद में
सगण, जगण, सगण, जगण और एक गुरु हो तो ललिता नामक वृत्त
होता है ॥ १५१ ॥
यथा—१ललिता-कुलअमित२-चारुवसनकरचारुपल्लवा ।
प्रविकसित-कमलकान्तिमुखी³ प्रभासि देहि सुरतश्रमातुरा ॥
हे सुन्दरि, तुम अपने विकसित कमल के समान शोभा वाले मुँह से
अतिशय सुशोभित हो रही हो (और सम्प्रति) शीघ्र सुकुमारता पूर्वक
चलने पर सुन्दर लगने वाले तुम्हारे वस्त्र तथा हाथ भी बड़े अच्छे लग
रहे हैं ॥ १५२ ॥
एवमेतानि वृत्तानि समानि विषमाणि च ।
नाटकाद्येषु४ काव्येषु प्रयोक्तव्यानि सूरिभिः ॥ १५३ ॥
ये सम तथा विषम प्रकार के वृत्त हैं जिनका नाटक तथा काव्य में
सुधिजन प्रयोग करें ॥ १५३ ॥
सन्त्यन्यान्यपि वृत्तानि यान्युक्तानीह पिण्डशः५ ।
न च तानि प्रयोज्यानि ६हतशोभानि तानि हि ॥ १५४ ॥
इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के अन्य मात्रिक वृत्त भी होते हैं, जिन्हें
सामूहिक रूप में बतलाया गया पर उनका (अप्रचलित स्वरूप हो तो)
प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे किसी प्रकार रचनासौन्दर्य को नहीं
बढ़ाते हैं ॥ १५४ ॥
यान्यत्र७ प्रतिषिद्धानि गीतके तानि योजयेत् ।
८ध्रुवायोगे तु वक्ष्यामि तेषामेव९ विकल्पनम् ॥ १५५ ॥
१. ललितावलि भ्रमरजासु वदनकरचारुपल्लवा ।
ललितासुतासुतनु वदतेऽद्य लोचने वलिता लतेव चलबालपल्लवा ॥-क० ।
२. भ्रमिवाहवसनकरपल्लवा हि मे—ख०; ग० ।
३. कमलकान्तमुखि प्रतिभासि—ख०; ग० ।
४. नाटकादिषु—ग० । ५. पण्डितैः—ख०; ग० ।
६. न शोभां जनयन्ति हि—ख० ।
७. यान्यतः परमत्र स्यु—ख०; ग० ।
८. ध्रुवाविधाने व्याख्यास्ये—ख०; ग० । ९. तेषाञ्चैव—ख०; ग० ।

षोडशोऽध्यायः २६९
जो मात्रिक वृत्त यहाँ छोड़ दिये गए हैं उनकी गीत में योजना की
जाए। इनका विशेष वर्णन ध्रुवाओं के वर्णन के अवसर पर किया
जाएगा ॥ १५५ ॥
आर्या वृत्त—
वृत्तलक्षणमेवन्तु¹ समासेन मयोदितम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ह्यार्याणामपि² लक्षणम् ॥ १५६ ॥
यहाँ मैंने संक्षेप में वृत्तों का लक्षण और स्वरूप बतलाया। अब मैं
आर्या के लक्षण बतलाता हूँ ॥ १५६ ॥
पथ्या च विपुला चैव चपला मुखतोऽपरा ।
जघने चपला चैव आर्याः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥ १५७ ॥
आर्या के पाँच प्रकार होते हैं—(१) पथ्या, (२) विपुला, (३) चपला,
(४) मुखचपला तथा (५) जघनचपला ॥ १५७ ॥
आसान्तु³ सम्प्रवक्ष्यामि यतिमात्राविकल्पनम् ।
⁴लक्षणं नियमञ्चैव विकल्पगुणसंश्रयम् ॥ १५८ ॥
अब मैं इन आर्याओं के लक्षण एवं उनमें होनेवाली यति तथा मात्राएँ,
उनके भेद तथा विकल्प के (गुरु, लघु के विकल्प के) नियम आदि
बतलाता हूँ ॥ १५८ ॥
यतिश्छेदस्तु विज्ञेयश्चतुर्मात्रो गणः स्मृतः ।
द्वितीयान्त्यौ युजौ पादावयुजौ⁵ त्वपरौ स्मृतौ ॥ १५९ ॥
यति कहते हैं पाद के विभाग (छेद) को और (इन आर्या आदि
मात्रिक वृत्तों में) गण चार मात्रा का होता है। द्वितीय तथा चतुर्थ पाद
(युग्) या सम तथा प्रथम और तृतीय पाद को असम या अयुग् पाद
कहते हैं ॥ १५९ ॥
गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गणसमन्वितः ।
अयुग्गणो विधातव्यो युग्गणस्तु⁶ यथेप्सितः ॥ १६० ॥
(आर्या में) मध्य-गुरु-गण (अर्थात् जगण) को छोड़कर शेष सभी
१. मेतत्तु—ख०; ग० । २. आर्याणा—ख०; ग० ।
३. आसाञ्चैव प्रवक्ष्यामि—ख०; ग० ।
४. लक्षणैनियतांशैश्च विकल्पान् गणसंश्रितान्—ख०; ग० ।
५. शेषौ चैवायुजौ स्मृतौ—ख०; ग० ।
६. युग्गणः पञ्च चैव तु—ख०; ग० ।

२७० नाट्यशास्त्रम्
चार मात्रा के अयुग् गण काव्य रचना में कवि द्वारा रखे जा सकते हैं
पर युग् गण में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है ॥ १६० ॥
१षष्ठस्य द्विविकल्पस्य नैधने ह्येकसंश्रितः२ ।
३पश्चार्धे तु षष्ठः स्यादेकमात्रस्तु केवलः ॥ १६१ ॥
षष्ठ गण के दो (वैकल्पिक) स्वरूप हैं और आठवाँ गण केवल एक
वर्ण होता है। उत्तरार्ध में छठा गण केवल एक मात्रा से ही निर्मित
होता है ॥ १६१ ॥
द्विविकल्पस्तु षष्ठो४ यो गुरुमध्यो भवेत्तु सः ।
तथा५ सर्वलघुश्चैव६ यतिसंज्ञासमाश्रितः ॥ १६२ ॥
छः गण के दो वैकल्पिक स्वरूपों में एक है 'ज' जिसमें गुरु मध्य में
होता है और दूसरा इसका रूप चार लघु वर्ण (मात्रा) वाला है। ये यति
से सम्बद्ध या उस पर आश्रित रहते हैं ॥ १६२ ॥
७द्वितीयादिलघुर्ज्ञेयः सप्तमे९ पञ्चमे यतिः ।
८प्रथमादिरथान्त्ये च पञ्चमे वा विधीयते ॥ १६३ ॥
जब दूसरा गण आदि लघु हो तथा पंचम-गण के बाद हो तो यति
होती है, जबकि वह पूर्ण होता हो या षष्ठ गण के प्रथम अक्षर से या पाँचवें
गण के बाद पूर्ण होता हो ॥ १६३ ॥
[ १०गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गुणसमन्वितः ।
अयुग्गणो विधातव्यः युग्गणस्तु स एव च ॥
प्रक्षिप्तः—मध्य गुरु अर्थात् जगण को छोड़ कर चार गण से युक्त विषम
गण वाले तथा शेष उसी प्रकार सम गण वाले पाद रखे जाते हैं।]
१. षष्ठोऽस्य द्विविकल्पः स्यात्—क०; षष्ठो वै द्विविकल्पस्तु—ख० ।
२. संस्थितः—क०; ख० ।
३. पश्चार्धे यो गणः षष्ठ एकमात्रः स इष्यते ।—क०; स उच्यते—ख०; ग० ।
४. षष्ठोऽत्र—ग० । ५. यथा—ख० ।
६. सर्वयतिश्चैव यदि संज्ञां—क० यतिः संज्ञाः समाश्रितः—ग० ।
७. सद्वितीयाद्विलघुनी सप्तमे सप्तमाद्यदि—क०, सा द्वितीया द्विलघुका
सप्तमे प्रथमे यतिः—ख; साद्वितीयाद् द्विलघुनि सप्तमे प्रथमाद्यति—ग० ।
८. प्रथमादि तथान्ते च—क; ग० ।
९. पञ्चमे तु—ग० ।
१०. प्रमाणश्चैव पञ्चमः—ख० ।

षोडशोऽध्यायः २७१
पथ्या आर्या—विपुला आर्या—
'गणेषु त्रिषु पादस्य यस्याः पथ्या तु सा भवेत् ।
अतश्च विपुलाऽन्या तु विज्ञेयाऽयतिलक्षणा ॥ १६४ ॥
जिसमें तीन गण के पश्चात् यति हो (अर्थात् जिसमें तीन गणों या
१२ मात्रा का पाद हो) उसमें पथ्या आर्या होती है पर विपुला आर्या इससे
भिन्न है क्योंकि उसमें किसी प्रकार की (पाद में) यति नहीं होती
(अयतिलक्षणा) है ॥ १६४ ॥
पथ्या यथा—
रक्तमृदुपद्मनेत्रा सितदीर्घबहुल-मृदुकेशी ।
कस्य तु पृथुमृदुजघना तनुबाह्वंसोदरी पथ्या ॥ १६५ ॥
ऐसी स्त्री किसे इष्ट नहीं जो रक्तवर्ण के कोमल कमल जैसे नेत्रों वाली
हो, जिसके काले, लम्बे, कोमल तथा घुँघराले बाल हों और मोटी तथा
कोमल जाँघें हों, पतली बाँहें, कंधे तथा उदर हों ॥ १६५ ॥
विपुला यथा—
विपुलजघनवदनस्तननयनैस्ताम्राधरोष्ठकरचरणैः ।
आयतनासागण्डैर्ललाटकर्णैः शुभा कन्या २ ॥ १६५ ॥
वह कन्या शुभ लक्षण वाली होती है जिसका नितम्ब, चेहरा, उरो-
१. प्रथमतृतीयो पादौ द्वादशमात्रौ भवेत्तु सा पथ्या ।
विपुलान्या खलु गदिता पूर्वोदितलक्षणोपेता ॥—क०
ख० पुस्तकेऽत्रैषाधिका सार्धपञ्चश्लोकी—
द्वितीयश्च चतुर्थश्च जकारौ गुरुमध्यगौ ।
यस्याः स्यात् पादयोगे तु विज्ञेया विपुला तु सा ॥
मुखेऽस्य मुखचपला स्यादन्यत्र जघने तथा ।
उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तथा ।
त्रिंशन्मात्रास्तु पूर्वार्द्ध विंशति सप्त चापरे ।
उभयोरर्धयोर्ज्ञेयो मात्रापिण्डो विभागशः ।
अधिकानि यानि त्रिंशद्ध्यस्तानि द्विगुणितानि तु ।
अक्षरत्रययुक्तानि ज्ञेयान्यत्र लघूनि तु ।
एतानि लघुसंज्ञानि निर्द्दिष्टानि समासतः ।
सर्वासामेव चार्याणामक्षराणि यथाक्रमम् ॥

२७२ नाट्यशास्त्रम्
तथा नयन बड़े हों, हाथ और पैरों के तले लाल हों तथा नाक, कपोल,
ललाट तथा कान ऊँचे उठे हुए हों ॥ १६५ ॥
चपला आर्या—
द्वितीयश्च चतुर्थश्च गुरुमध्यगतो भवेत् ।
उभयोरर्धयोर्यत्र विज्ञेया चपला यथा ॥ १६६ ॥
चपला में द्वितीय और चतुर्थ गण ( 'ज' या ) मध्य गुरु के रहते हैं
जो दोनों के अर्धभाग में होता है ॥ १६६ ॥
यथा—उद्भटगामिनी परुषभाषिणी कामचिह्नकृतवेषा ।
जानाति मांस-युक्ता सुरा-प्रिया सर्वतश्चपला ॥ १६७ ॥
वह स्त्री जो अपने पति के प्रतिकूल उद्धत आचरण करे और उसे
कठोर वचन कहे, जिसके वेष (वस्त्रादि) में उपभोग के चिह्न दिखाई दे
रहे हों, जिसके शरीर पर अधिक मांस हो, सुरा पीने की आदत हो,
वह चंचला स्त्री किसी को कभी भी प्राप्त हो सकती है ॥ १६७ ॥
मुखचपला तथा जघनचपला—आर्या
पूर्वार्धे लक्षणं ह्येतदस्याः१ सा च मुखेन तु ।
पश्चिमार्धे२ तु चपला यस्याः सा जघनेन तु ॥ १६८ ॥
जब चपला का लक्षण पूर्वार्द्ध में उपलब्ध हो तो मुख चपला तथा
उत्तरार्ध में लक्षण दिखे तो जघनचपला होती है ॥ १६८ ॥
मुखचपला यथा—
आर्यामुखे तु चपला तथापि चार्या न मे यतः सा तु ।
दक्षा गृहकृत्येषु तथा दुःखे भवति दुःखार्त्ता ॥ १६९ ॥
मेरी स्त्री वाचाल है पर उसका व्यवहार बुरा नहीं है। वह गृहकार्य में
चतुर है और मेरे दुःखी होने पर वह भी दुःखी हो जाती है ॥ १६९ ॥
जघनजपला यथा—
वरमृगनयने चपलासि वरोरु शशाङ्कदर्पणनिभास्ये ।
कामस्य सारभूते पूर्वमदचारुजघनेन ॥ १७० ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी चंचल आँखें श्रेष्ठ हरिण के समान हैं और तुम्हारा
मुख चाँद या दर्पण के समान (स्वच्छ या आह्लादक) है, तुम्हारी सुन्दर
१. यस्याः सा चपलामुखे—क० ।
२. पश्चिमार्धं भवेद्यत्र जघने चपला तु सा—क० ।

षोडशोऽध्यायः २७३
जंघाए काम की सार एवं पूर्णतः मादक है परन्तु तुम चपला (चंचल स्वभाव)
होने से विश्वास के योग्य नहीं हो ॥ १७१ ॥
उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तु सा ॥ १७२ ॥
यदि पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्ध में 'चपला' का लक्षण समान उपलब्ध हो तो
इसे 'सर्वचपला' आर्या जानों ॥ १७२ ॥
कार्यौ द्वादशमात्रौ च पादावाद्यौ तृतीयकौ ।
अष्टादश द्वितीयश्च तथा पञ्चदशोत्तमाः ॥ १७३ ॥
इस वृत्त में प्रथम तथा तृतीय पाद में बारह मात्राएं तथा दूसरे में
अठारह और अन्तिम पाद में पन्द्रह मात्राएँ रखनी चाहिए ॥ १७३ ॥
'चतुःपञ्चप्रकाराणां चतुष्कानां विशेषतः ।
प्रस्तारयोगमासाद्य बाहुल्यं सम्प्रदर्शयेत् ॥ १७४ ॥
विषम स्थान या पाद में स्थित रहने वाले चार प्रकार के अर्थात् चार
गण रखे जाते हैं । समस्थान या समपाद में पांच प्रकार के गण या पांच गण
को रखते हैं । इनमें जो परस्पर संकीर्णता के द्वारा होने वाला वैशिष्ट्य है
उसे प्रस्तारगत विस्तार से दिखलाया जाता है ॥ १७४ ॥
पञ्च पञ्चाशदन्त्या २ तु त्रिंशदाद्या तथैव च ।
आर्या त्वक्षरपिण्डेन विज्ञेयाऽत्र प्रयोक्तृभिः ॥ १७५ ॥
अन्त्या अर्थात् अन्तिम सर्वलघु के पांच गण में रखा जाए इस प्रकार
इनके पचपन प्रभेद प्रस्तारगत विस्तार से होंगे । प्रथमार्ध में आदि के पाद
के आद्यगण के तीस प्रस्तारगत प्रभेद होंगे । दूसरे के छब्बीस प्रस्तारगत
भेद होंगे । इस प्रकार प्रयोक्तागण आर्या के अक्षर समुदाय को समझें ॥१७५॥
त्रिंशतस्त्वथ वर्णेभ्यो लघुवर्णत्रयं भवेत् ।
शेषाणि गुरुसंज्ञानि ३ एवं सर्वत्र निर्दिशेत् ॥ १७६ ॥
और इन तीस वर्ण गत प्रस्तार भेदों के प्रकार में द्वितीय और षष्ठ
स्थान के साथ अन्तिम स्थान पर स्थित रहने से तीन लघु वर्ण बनते हैं
तथा शेष गुरु संज्ञक वर्ण विभेद होते हैं, ऐसा सभी स्थान पर समझना
चाहिए ॥ १७६ ॥
१. श्लोकोऽयं अभिनवगुप्तव्याख्यातत्वादत्र निवेशितः ।
२. पञ्चाशदाद्या—ख० । ३. गुरुसंख्यानि—क० ।
१८ ना० शा० द्वि०

२७४ नाट्यशास्त्रम्
१ सर्वेषामेव चार्याणामक्षराणां यथाक्रमम् ।
सर्वेषां जातिवृत्तानां२ पूर्वमुत्तरसंख्यया ।
विकल्पं३ गणनां कृत्वा संख्यां पिण्डेन दर्शयेत्४ ॥ १७७ ॥
सभी जातिवृत्तों में विकल्पगत संख्या के पूर्व विभेदों को उत्तर संख्या के
साथ गुणा करके उससे जो समुदाय संख्या बने वही उसका प्रस्तार भेद
होगा जिसे बोधक संख्या के रूप में दिखलाया जाए ॥ १७७ ॥
५ आर्यागीतिरधार्धे च केवलश्चाष्टभिर्गणैः ।
इतरार्धे६ तु षष्ठस्तु न लघुर्गण इष्यते ॥ १७८ ॥
आर्या गीति के आधे भाग में आठ गण रखते हैं और आर्यागीति के
प्रथमार्ध के समान उत्तरार्ध में भी षष्ठ गण के दो भेद माने जाते हैं जिसमें
लघुगण न हों ॥ १७८ ॥
७ वृत्तैरेवन्तु विविधैर्नानाच्छन्दस्समुद्भवैः ।
काव्यबन्धास्तु कर्तव्याः षट्त्रिंशल्लक्षणान्विताः ॥ १७९ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे छन्दोविचितिर्नाम षोडशोऽध्यायः ।
❧—❧
इन छन्दों के नियमों को जानकर विविध छन्दों में नाटक काव्य आदि
का कविजन ३६ लक्षणों सहित निर्माण करें ॥ १७९ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का 'छन्दोविरचिति नामक सोलहवां अध्याय सम्पूर्ण ॥
❧—❧
१. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तकेऽधिकम् ।
२. यानि वृत्तानि—ख० ।
३. विकल्पं गणयित्वा तु संख्या पिण्डेन दर्शयेत्—ख० ।
४. निर्द्दिशेत्—ग० ।
५. गीतिरधायैव केवलं त्वष्टभि—ख०; ग० ।
६. इतरार्धेऽपि षष्ठः स्यात् स विकल्पो भवेद् मणः—ख०; इतरा चापि षष्ठा
स्यात् स विकल्पो भवेद्गणः—ग० ।
७. एवं चतुर्विधैर्वृत्तै—ख० ।

३७५

सप्तदशोऽध्यायः
( वाचिकाभिनये ) काव्यादिलक्षणाध्याय
( नाट्य-रचना के छत्तीस ) लक्षण—
भूषणाक्षरसङ्घातौ शोभोदाहरणे तथा ।
हेतुसंशयदृष्टान्ताः प्राप्त्यभिप्राय एव च ॥ १ ॥
निदर्शनं निरुक्तञ्च सिद्धिश्चाथ विशेषणम् ।
गुणातिपातातिशयौ तुल्यतर्कः पदोच्चयः ॥ २ ॥
^१दिष्टश्चैवोपदिष्टश्च विचारोऽथ विपर्ययः ।
भ्रंशश्चानुनयो माला दाक्षिण्यं गर्हणन्तथा ॥ ३ ॥
अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च पृच्छा सारूप्यमेव च ।
मनोरथश्च लेशश्च ^२सङ्क्षोभो गुणकीर्तनम् ॥ ४ ॥
^३ज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्च प्रियं वचनमेव च ।
षट्त्रिंशल्लक्षणान्येवं काव्यबन्धेषु निर्दिशेत् ॥ ५ ॥
(दृश्य) काव्य में छत्तीस लक्षण^१ समायोजित होते हैं। इनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) भूषण ( २ ) अक्षर-संघात ( ३ ) शोभा ( ४ ) उदाहरण
( ५ ) हेतु ( ६ ) संशय ( ७ ) दृष्टान्त ( ८ ) प्राप्ति ( ९ ) अभिप्राय
( १० ) निदर्शन ( ११ ) निरुक्त ( १२ ) सिद्धि ( १३ ) विशेषण ( १४ )
गुणातिपात ( १५ ) गुणातिशय ( १६ ) तुल्यतर्क ( १७ ) पदोच्चय
( १८ ) दिष्ट ( १९ ) उपदिष्ट ( २० ) विचार ( २१ ) विपर्यय ( २२ ) भ्रंश


१. 'लक्षणों' के विषय में नाट्यशास्त्र की टीकाओं में असमानता परिलक्षित
होती है। आचार्य अभिनवगुप्त ने दस विभिन्न मतों का इस सन्दर्भ में उल्लेख
किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि महापुरुष लक्षण शब्द से लक्षण शब्द इस
सन्दर्भ में तुलना योग्य है। अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह गुण, रीति,
अलंकार आदि सभी से पार्थक्य रखता है। कुछ टीकाकारों ने लक्षणों को
नाट्योपयोगी मानते हुए इसका व्यापक प्रसार भी बतलाया है। इसका विवेचन
परिशिष्ट में दिया गया है।


१. दृष्टञ्चैवोपदिष्टञ्च—ख०; ग० । २. क्षोभोऽथ—ख०; ग० ।
३. ज्ञेयान्यक्त—ख०; ग० ।

(२३) अनुनय (२४) माला (२५) दाक्षिण्य (२६) गर्हण (२७)
अर्थापत्ति (२८) प्रसिद्धि (२९) पृच्छा (३०) सारूप्य (३१)
मनोरथ (३२) लेश (३३) संक्षेप (संक्षोभ) (३४) गुणकीर्तन (३५)
अनुक्त सिद्धि तथा (३६) प्रियवचन (प्रियोक्ति) ॥ १-५ ॥
भूषण१
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिः समलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव 'चित्रार्थैस्तद्भूषणमिति स्मृतम् ॥ ६ ॥
जो काव्य रचना अनेक अलङ्कारों तथा गुणों से अलङ्कारों से सजाए
व्यक्ति के शरीर के सदृश सुशोभित हो रही हो उस विभिन्न अर्थों के गुण-
सूचक लक्षण को 'भूषण' जानो२ ॥ ६ ॥
अक्षरसंघात—
यत्नाल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रमुपवर्ण्यते ।
तमप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ७ ॥
जहां थोड़े श्लिष्ट अक्षरों से विचित्र अर्थ की अभिव्यक्ति हो उसे 'अक्षर-
संघात' नामक लक्षण जानों३ ॥ ७ ॥
१. इस अध्याय में (३६ लक्षणों का निदर्शक) नाट्यशास्त्र का अंश दो
पाठान्तरों में उपलब्ध है। इनमें एक पाठ को प्राचीन टीकाकारों ने लिया
और उसी पाठ का विश्वनाथ तथा सिंहभूपाल प्रभृति ने अनुसरण किया ।
इस पाठ में सभी लक्षणों के अनुष्टुप् श्लोक हैं। हमने भी अपने अनुवाद में इसे
ही प्राथमिकता दी है। दूसरा पाठ—जो कि परवर्ती तथा परिष्कृत प्रतीत
होता है नाट्यशास्त्र के टीकाकारों द्वारा गृहीत है। विशेषतः आचार्य कीर्तिधर,
अभिनवगुप्तपाद तथा आचार्य धनञ्जय आदि के द्वारा । यह सत्रह लक्षणों में
उक्त पाठ से अभिन्नता रखता है जिनमें आठ लक्षण तो दोनों पाठों के समान
है। (द्वितीय पाठ को समग्र एवं सानुवाद अनुबन्ध में देने का उद्योग किया
गया है।) इस प्रकार दोनों ही पाठान्तरों का अर्थ उपलब्ध करवाने का उद्योग
हमने किया है। जिससे इस अध्याय के अध्ययन में बुद्धिभेद उत्पन्न न हो और
आवश्यकता के अनुसार दोनों ही पाठों का उपयोग हो सके।
२. दूसरे पाठ में इसे ही विभूषण माना गया है। लक्षण अनुबन्धाध्याय
में द्रष्टव्य ।
३. अक्षरसंघात का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. विन्यस्तै—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः २७७
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थः प्रयुज्यते ।
यत्र २श्लिष्टा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिधीयते ॥ ८ ॥
यदि नवीन तथा मनोहारि अर्थ की असिद्ध या अज्ञात विषय को सिद्ध
या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए श्लेष के द्वारा अभिव्यक्ति हो तो इसे
'शोभा' नामक लक्षण समझना चाहिए१ ॥ ८ ॥
उदाहरण—
यत्र १तुल्यार्थयुक्तेन वाक्येनाभिप्रदर्शनात् ।
२साध्यते निपुणैरर्थस्तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ९ ॥
जब समानार्थक वाक्यों द्वारा किसी अर्थ को प्रकट करते हुए निपुणजन
अपने प्रयोजन को साधें तो उसे 'उदाहरण' नामक लक्षण समझना
चाहिए२ ॥ ९ ॥
हेतु—
यत्प्रयोजनसामर्थ्याद्वाक्यमिष्टार्थसाधनम्३ ।
समासोक्तं मनोग्राहि स हेतुरिति संज्ञितः ॥ १० ॥
जब संक्षिप्त और हृदय ग्राही वाक्यावली द्वारा उसके दक्षतापूर्वक प्रयोग
किये जाने के कारण इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाए तो उसे 'हेतु' नामक
लक्षण जानों३ ॥ १० ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं वाक्यं यत्र समाप्यते ।
अनेकत्वाद्विचाराणां स संशय इति स्मृतः ॥ ११ ॥
जब विचारों की अधिकता रहने के कारण बिना (उसके) सम्पूर्ण
आशय का ज्ञान किये ही वाक्य समाप्त हो जाए तो उसे 'संशय' समझना
चाहिए४ ॥ ११ ॥
१. शोभा का लक्षण दोनों पाठों में समानता युक्त है।
२. तुलना, सा० दर्पण ६।१७७ । उदाहरण का लक्षण अन्य पाठ में मिलता है।
३. हेतु का लक्षण अन्य पाठ में दूसरा है। इस लक्षण का विस्पष्टरूप कदाचित्
अस्पष्ट सा है। अभिनवगुप्त की व्याख्या यहाँ विशद है।
४. संशय का लक्षण दोनों पाठों में समान है।
२. श्लक्ष्णविचित्रार्था—ख०; यत्र श्लिष्टं विचित्रार्थम्—ग०।
१. त्वल्पार्थ—ख०; ग० । २. साध्यन्ते निपुणैरर्था—ख०; ग० ।
३. साधकम्—ख०; ग० ।

२७८ नाट्यशास्त्रम्
दृष्टान्त—
सर्वलोकमनोग्राही यस्तु¹ पक्षार्थसाधकः ।
हेतुर्निदर्शनकृतः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ १२ ॥
हेतु तथा उदाहरण को देते हुए जिसमें किसी विषय या वस्तु का
मनोरंजक रूप में पक्ष-समर्थन किया जाए तो उस वचनावली को 'दृष्टान्त'
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवान्² कांश्चिद्भावो यत्रानुमीयते³ ।
⁴प्राप्तिं तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ १३ ॥
जब कुछ ( सूचनाओं के द्वारा या ) चेष्टाओं को देखकर किसी भाव को
ताड़ लिया जाए तो उसे 'प्राप्ति' नामक ( श्रेष्ठ ) नाटकों में प्राप्त होने वाला
लक्षण समझना चाहिए² ॥ १३ ॥
अभिप्राय—
अभूतपूर्वो यो ⁵ह्यर्थः सादृश्यात् परिकल्पितः ।
लोकस्य हृदयग्राही सोऽभिप्राय इति स्मृतः ॥ १४ ॥
जो विचार मनोग्राही स्वरुप वाला हो तथा जिसकी किसी ने कभी
कल्पना भी न की हो—जब ( दो विषयों की ) समानता के आधार पर उसे
प्रस्तुत या निर्माण किया जाए तो उसे 'अभिप्राय' समझना चाहिए³ ॥ १४ ॥
निदर्शन—( या विपरीत दृष्टि )
यत्रार्थानां प्रसिद्धानां क्रियते परिकीर्तनम् ।
⁶परापेक्षाभ्युदासार्थं तन्निदर्शनमुच्यते ॥ १५ ॥
१. 'दृष्टान्त' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं। इसकी दृष्टान्तालङ्कार से भी
तुलना की जा सकती है।
२. 'प्राप्ति' के लक्षण दोनों पाठों में प्रायः समान हैं।
३. 'अभिप्राय' के स्थान पर अन्य पाठ में 'युक्ति' प्राप्त होता है।
१. यश्च—क०; पक्षपक्षार्थ—ख०; ग० ।
२. वावयवं किञ्चिद्—क० । ३. यत्रोपमीयते—क० ।
४. अत्रापि ह्यथैतां प्राप्तिं जानीयाल्लक्षणं बुधः—क; प्राप्तुं तमपि
जानीय—ख० ।
५. योऽप्यथोः—ख०; ग० ।
६. परोपेक्ष—क०; परापक्षोभ्युदासार्थ—ख० ।

जिसमें पहिले कही गई किसी भूल या विपरीत दृष्टि को दूर करने के
लिए ( कुछ ) प्रसिद्ध बातों का समर्थन स्वरूप प्रयोग किया जाए तो उसे
'निदर्शन' समझना चाहिए¹ ॥ १५ ॥
निरुक्त—
निरवद्यस्य वाक्यस्य पूर्वोक्तार्थप्रसिद्धये¹।
यदुच्यते तु वचनं निरुक्तं तदुदाहृतम् ॥ १६ ॥
पिछली अदुष्ट ( निरवद्य ) बात को पुष्ट करने के लिए उसके समर्थन
में प्रयुक्त की जाने वाली वाक्यावली को 'निरूक्त' समझना चाहिए² ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनान्तु³ प्रधानानां नाम ⁴यत्राभिकीर्त्यते।
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं सा सिद्धिरभिधीयते ॥ १७ ॥
जिसमें अपने इष्ट विषय को पूर्ण बतलाने के ( या प्राप्त करने के ) लिए
अनेक प्रसिद्ध बड़े व्यक्तियों के नाम लिए जाए तो उसे 'सिद्धि' समझना
चाहिए³ ॥ १७ ॥
विशेषण—
सिद्धान् बहून् प्रधानार्थानुक्त्वा यत्र प्रयुज्यते ।
विशेषयुक्तं वचनं विज्ञेयं तद्विशेषणम् ॥ १८ ॥
जब अनेक प्रसिद्ध तथा बड़े विषयों को कहने के बाद उनकी विशेषता
बतलाते हुए किसी बात को कहा जाए तो उसे 'विशेषण' समझना
चाहिए⁴ ॥ १८ ॥
१. 'निदर्शन' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आशीः' प्राप्त होता है। निदर्शन
के लक्षण का आचार्य अभिनवगुप्त ने विवेचन नहीं किया केवल एक
उदाहरण मात्र दे दिया है जिससे यह अधिक स्पष्ट नहीं हो पाया।
२. 'निरुक्त' का लक्षण दोनों पाठों में समानता लिये हुए मिलता है। दूसरे
पाठ में इसके दो भेद भी निदर्शित किये गये हैं।
३. 'सिद्धि' के लक्षण में दोनों पाठों में थोड़ी भिन्नता है।
४. 'विशेषण' के स्थान पर अन्य पाठ में 'क्रम' मिलता है। लक्षण वहीं
दृष्टव्य।
१. क्तार्थः प्रसिद्धयति—क०।
२. तदप्यागमसम्भूतं निरुक्तमभिनिर्दिशेत्—क०।
३. बहूनाञ्च प्रयुक्तानां—क०। ४. यत्राभिधीयते—क०।

२८० नाट्यशास्त्रम्
गुणातिपात
गुणाभिधानैर्विविधैर्विपरीतार्थयोजितैः ।
गुणातिपातो १मधुरैर्निष्ठुरार्थैर्भवेद्यथा२ ॥ १९ ॥
जब किसी के गुण मधुर पदावली में वर्णन करने पर कठोर अर्थ को
लाते हुए (प्रकट करते हुए) विपरीत आशय में (या योजना में) लग
जाए तो उसे 'गुणातिपात' समझना चाहिए१ ॥ १९ ॥
अतिशय
बहून् गुणान् कीर्तयित्वा सामान्यजनसम्भवान् ।
विशेषः कीर्त्यते यस्तु ज्ञेयः सोऽतिशयो बुधैः ॥ २० ॥
जब सामान्य मनुष्यों में दिखने वाले अनेक गुणों का बखान करने के
बाद कुछ गुणगत विशेषताओं को (भी) बतलाया जाए तो उसे 'अतिशय'२
समझना चाहिए ॥ २० ॥
तुल्यतर्क
रूपकैरुपमाभिर्वा३ तुल्यार्थाभिः प्रयोजितः४ ।
५अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शस्तुल्यतर्कः६ प्रकीर्तितः७ ॥ २१ ॥
किसी परोक्ष अर्थ को उपमा या रूपक के द्वारा अर्थगत समानता
बतलाते हुए प्रत्यक्षतः अभिहित किया जाए तो उसे 'तुल्यतर्क'३ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ २१ ॥
पदोच्चय—
बहूनान्तु८ प्रयुक्तानां पदानां९ बहुभिः पदैः ।
उच्चयः सदृशार्थो यः स विज्ञेयः पदोच्चयः ॥ २२ ॥
जब अनेक शब्दों का प्रयोग उन्हीं के समान दूसरे शब्दों को मिलाते
१. अन्य पाठ में 'गुणानुवाद' इसी का अभिधान किया गया है। लक्षण भी
भिन्न है।
२. 'अतिशय' का लक्षण दोनों पाठों में भिन्न है।
३. 'तुल्यतर्क' के स्थान पर अन्य पाठ में 'आक्रन्द' है।

१. निष्ठुरार्थों—क० । २. भवेदथ—ख०; ग० ।
३. रुपमानैर्वा—ख०; ग० । ४. प्रयोक्तृभिः—ख०; ग० ।
५. अप्रत्ययार्थ—ख०; ग० । ६. संस्पृष्टः—क० ।
७. इति स्मृतः—क० । ८. सम्प्रयुक्तानां—क० ।
९. पादानां—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः २८१
हुए—उसी अर्थ को बतलाने के लिए ( या उसी कार्य को बनाने के लिए )
किया जाए तो उसे 'पदोच्चय' समझना चाहिए¹ ॥ २२ ॥
दिष्ट ( दृष्ट )—
यथादेशं यथाकालं १यथारूपञ्च वर्ण्यते ।
यत् प्रत्यक्षं परोक्षं वा दिष्टं² तद्वर्णतोऽपि³ वा ॥ २३ ॥
जब किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विषय का देश, काल तथा स्वरूप के
अनुसार ठीक वैसा ही वर्णन कर दिया जाए तो उसे 'दिष्ट'² समझना
चाहिए ॥ २३ ॥
उपदिष्ट—
परिगृह्य तु शास्त्रार्थं यद्वाक्यमभिधीयते ।
४विद्वन्मनोहरं स्वन्तमुपदिष्टं तदुच्यते ॥ २४ ॥
जब किसी ( इष्ट ) विषय को शास्त्र का आधार लेकर कहा जाए
तथा जिससे विद्वान् सन्तुष्ट हों जाए तो उसे 'उपदिष्ट'३ समझना
चाहिए ॥ २४ ॥
विचार—
५पूर्वाशयसमानार्थैरप्रत्यक्षार्थसाधनैः ।
६अनेकोपाधिसंयुक्तो विचारः परिकीर्तितः ॥ २५ ॥
जिसमें पिछली कही गई बातों के समान आशय वाले परोक्षार्थ के
साधक अनेक प्रकार के उपायों को दोष-पूर्ण ( या त्रुटिपूर्ण ) रूप से प्रकट
किया जाए उसे 'विचार'४ समझना चाहिए ॥ २५ ॥
१. 'पदोच्चय' के लक्षण दोनों पाठों में भिन्न हैं ।
२. 'दिष्ट' के स्थान पर अन्यत्र 'दृष्ट' पाठ मिलता है । इसके स्थान पर अन्य
पाठ में 'सारूप्य' रखा गया है ।
३. 'उपदिष्ट' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपपत्ति' प्राप्त होता है ।
४. 'विचार' का के स्थान पर अन्य पाठ में पश्चात्ताप है ।
१. पात्रञ्च—क० । २. दृष्टं—क० ।
३. वर्णकोऽपि—क० । ४. विदुर्मनोहरं—क० ।
५. पूर्वं शेष—क०; पूर्वंदेश—ख०; ग० ।
६. तिरस्कृताथंविषयो—क०; अनेकोपोहसंयुक्तो—ख०; ग० ।