नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 374, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २६३
तुमने अपने प्रिय पर रोष दिखला कर क्या कर लिया ? ऐसा लगता
है कि तुम मूर्ख हो और कुछ लोगों के द्वारा उभाड़ी जाने पर अन्यवस्थित
मति (मोहित) हो रही हो। अतएव तुम इस समय बड़ी विपरीत या
असहमत सी बन रही हो, जो ठीक नहीं है ॥ १३० ॥
(अनुष्टुप्) चपला—
चतुर्थादक्षराद्यत्र त्रिलघु स्यादयुक्ततः ।
अनुष्टुप्-चपला¹ सा तु विज्ञेया नामतो यथा ॥ १३१ ॥
यदि अनुष्टुप् वृत्त में चतुर्थ अक्षर से आगे पंचम, षष्ठ तथा सप्तम अक्षर
लघु हो तो उसे अनुष्टुप्-चपला नाम से अभिहित किया जाता है ॥ १३१ ॥
उदा०—न खल्वस्याः प्रियतमः श्रोतव्यं व्याहृतं सख्या ।
नारदस्य प्रतिकृतिः कथ्यते² चपला हीयम् ॥ १३२ ॥
यह उस (कन्या) का प्रियतम नहीं, यह बात मैंने अपनी सखी
की जोर से बातचीत करने से जान ली। यह चंचला स्त्री सचमुच नारद
की दूसरी प्रतिमा है (जो कलह-प्रिया है) ॥ १३२ ॥
विपुला—
विपुला तु युजि ज्ञेया लघुत्वात् सप्तमस्य तु ।
सर्वत्र सप्तमस्यैव केषाञ्चिद्विपुला³ यथा ॥ १३३ ॥
यदि अनुष्टुप् वृत्त के दूसरे तथा चौथे पाद में सातवाँ अक्षर लघु हो
तो (अनुष्टुप्) विपुला वृत्त होता है। कुछ विद्वानों के मत में सभी पादों
के सातवें वर्ण के लघु होने पर विपुला होती है ॥ १३३ ॥
यथा—संक्षिप्ता वज्रवन्मध्ये हेमकुम्भ-निभस्तनि ।
विपुलासि प्रिये⁴ कट्यां, शरच्चन्द्र-निभानने⁵ ॥ १३४ ॥
हे प्रिये ! तुम्हारा शरीर दुबला, तुम्हारा कटिभाग वज्र के समान
पतला, उरोज सुवर्ण-कलश के समान, नितम्ब गुरु तथा विस्तीर्ण एवं मुख
शारदीय चन्द्र के समान सुन्दर है ॥ १३४ ॥
१. विपुला—ग० । २. श्रूयते विपुला हीयम्—क० ।
३. विपुलेरनु—क० । ४. प्रिये श्रोण्यां—क० ।
५. पूर्णचन्द्रनिभानने—क० ।