नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवक्त्रस्यापरपूर्वस्य⁴ चादौ नौ रो लगौ त्रिकाः ।
न जौ जरौ द्वितीये च शेषाग्रं पुनरेव तु ॥ १४५ ॥
यदि प्रथम और तृतीय पाद में नगण, नगण, रगण, लघु तथा गुरु और
द्वितीय तथा चतुर्थ पाद में नगण जगण तथा रगण हों तो उसे अपरवक्त्र
वृत्त कहते हैं ॥ १४५ ॥
यथा—सुतनु जलपरीतलोचनं⁵ जलदनिरुद्धमिवेन्दुमण्डलम् ।
किमिदमपर-वक्त्रमेव ते शशिवदनेऽद्य मुखं पराङ्मुखम् ॥
अरी चन्द्रमुखी, तुम्हारी आँखें आँसुओं से लबालब क्यों भरी हैं ?
तुम्हारा मुँह ऐसा लग रहा है जैसे मेघों से ढ़का हुआ चाँद हो और
तुम्हारा यह दूसरी ओर मोड़ा हुआ मुँह तो किसी दूसरे जैसा ही दिखने
लगा है। यह सब क्या है ॥ १४६ ॥
पुष्पिताग्रा
नौ र्यौ तु प्रथमे पादे न्जौ⁷ ज्ञौ गश्च तथापरे ।
यत्र⁸ तत् पुष्पिताग्रा स्याद्यदि शेषन्तु पूर्ववत् ॥ १४७ ॥
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