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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 668 में से

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पृष्ठ 382

षोडशोऽध्यायः २७१
पथ्या आर्या—विपुला आर्या—
'गणेषु त्रिषु पादस्य यस्याः पथ्या तु सा भवेत् ।
अतश्च विपुलाऽन्या तु विज्ञेयाऽयतिलक्षणा ॥ १६४ ॥
जिसमें तीन गण के पश्चात् यति हो (अर्थात् जिसमें तीन गणों या
१२ मात्रा का पाद हो) उसमें पथ्या आर्या होती है पर विपुला आर्या इससे
भिन्न है क्योंकि उसमें किसी प्रकार की (पाद में) यति नहीं होती
(अयतिलक्षणा) है ॥ १६४ ॥
पथ्या यथा—
रक्तमृदुपद्मनेत्रा सितदीर्घबहुल-मृदुकेशी ।
कस्य तु पृथुमृदुजघना तनुबाह्वंसोदरी पथ्या ॥ १६५ ॥
ऐसी स्त्री किसे इष्ट नहीं जो रक्तवर्ण के कोमल कमल जैसे नेत्रों वाली
हो, जिसके काले, लम्बे, कोमल तथा घुँघराले बाल हों और मोटी तथा
कोमल जाँघें हों, पतली बाँहें, कंधे तथा उदर हों ॥ १६५ ॥
विपुला यथा—
विपुलजघनवदनस्तननयनैस्ताम्राधरोष्ठकरचरणैः ।
आयतनासागण्डैर्ललाटकर्णैः शुभा कन्या २ ॥ १६५ ॥
वह कन्या शुभ लक्षण वाली होती है जिसका नितम्ब, चेहरा, उरो-
१. प्रथमतृतीयो पादौ द्वादशमात्रौ भवेत्तु सा पथ्या ।
विपुलान्या खलु गदिता पूर्वोदितलक्षणोपेता ॥—क०
ख० पुस्तकेऽत्रैषाधिका सार्धपञ्चश्लोकी—
द्वितीयश्च चतुर्थश्च जकारौ गुरुमध्यगौ ।
यस्याः स्यात् पादयोगे तु विज्ञेया विपुला तु सा ॥
मुखेऽस्य मुखचपला स्यादन्यत्र जघने तथा ।
उभयोरर्धयोरेतल्लक्षणं दृश्यते यदि ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया सर्वतश्चपला तथा ।
त्रिंशन्मात्रास्तु पूर्वार्द्ध विंशति सप्त चापरे ।
उभयोरर्धयोर्ज्ञेयो मात्रापिण्डो विभागशः ।
अधिकानि यानि त्रिंशद्ध्यस्तानि द्विगुणितानि तु ।
अक्षरत्रययुक्तानि ज्ञेयान्यत्र लघूनि तु ।
एतानि लघुसंज्ञानि निर्द्दिष्टानि समासतः ।
सर्वासामेव चार्याणामक्षराणि यथाक्रमम् ॥