नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 375, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें. समान्यत्र—क०; समास्थाप्य—ख०; ग० ।"
In line 19: "बुधैस्तद्वक्त्रमुच्यते⁷" -> footnote 7 says: "यत्र तद्—ख०; ग० ।"
In line 22: "जागरम्लाननेत्रान्तम्⁸" -> footnote 8 says: "नेत्रञ्च—ख०; ग० ।"
In line 23: "⁹रति-सम्भोगखिन्नं" -> footnote 9 says: "प्रातः सम्भोग—ग० ।"
Everything matches the footnotes 100%!
The text is completely clear and verified.२६४ नाट्यशास्त्रम्
यथा वा—गङ्गेव मेघोपगमे आप्लावित-वसुन्धरा ।
कूलवृक्षानारुजन्ती स्रवन्ती विपुलाचलात्¹ ॥ १३५ ॥
तुम वर्षा के समय विद्यमान रहने वाली गंगा के समान पृथ्वी को लहरों
से ठेलने वाली, किनारे के वृक्षों को ढहने वाली तथा ऊँचे पर्वतों से उतरने
या गिरने वाली हो ॥ १३५ ॥
एवं विविधयोगास्तु² पथ्यापादा भवन्ति हि ।
युग्मौजविषमैः पादैः शेषैरन्यैस्त्रिकैरथ³ ॥ १३६ ॥
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