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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 668 में से

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पृष्ठ 380

षोडशोऽध्यायः २६९
जो मात्रिक वृत्त यहाँ छोड़ दिये गए हैं उनकी गीत में योजना की
जाए। इनका विशेष वर्णन ध्रुवाओं के वर्णन के अवसर पर किया
जाएगा ॥ १५५ ॥
आर्या वृत्त—
वृत्तलक्षणमेवन्तु¹ समासेन मयोदितम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ह्यार्याणामपि² लक्षणम् ॥ १५६ ॥
यहाँ मैंने संक्षेप में वृत्तों का लक्षण और स्वरूप बतलाया। अब मैं
आर्या के लक्षण बतलाता हूँ ॥ १५६ ॥
पथ्या च विपुला चैव चपला मुखतोऽपरा ।
जघने चपला चैव आर्याः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥ १५७ ॥
आर्या के पाँच प्रकार होते हैं—(१) पथ्या, (२) विपुला, (३) चपला,
(४) मुखचपला तथा (५) जघनचपला ॥ १५७ ॥
आसान्तु³ सम्प्रवक्ष्यामि यतिमात्राविकल्पनम् ।
⁴लक्षणं नियमञ्चैव विकल्पगुणसंश्रयम् ॥ १५८ ॥
अब मैं इन आर्याओं के लक्षण एवं उनमें होनेवाली यति तथा मात्राएँ,
उनके भेद तथा विकल्प के (गुरु, लघु के विकल्प के) नियम आदि
बतलाता हूँ ॥ १५८ ॥
यतिश्छेदस्तु विज्ञेयश्चतुर्मात्रो गणः स्मृतः ।
द्वितीयान्त्यौ युजौ पादावयुजौ⁵ त्वपरौ स्मृतौ ॥ १५९ ॥
यति कहते हैं पाद के विभाग (छेद) को और (इन आर्या आदि
मात्रिक वृत्तों में) गण चार मात्रा का होता है। द्वितीय तथा चतुर्थ पाद
(युग्) या सम तथा प्रथम और तृतीय पाद को असम या अयुग् पाद
कहते हैं ॥ १५९ ॥
गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गणसमन्वितः ।
अयुग्गणो विधातव्यो युग्गणस्तु⁶ यथेप्सितः ॥ १६० ॥
(आर्या में) मध्य-गुरु-गण (अर्थात् जगण) को छोड़कर शेष सभी
१. मेतत्तु—ख०; ग० । २. आर्याणा—ख०; ग० ।
३. आसाञ्चैव प्रवक्ष्यामि—ख०; ग० ।
४. लक्षणैनियतांशैश्च विकल्पान् गणसंश्रितान्—ख०; ग० ।
५. शेषौ चैवायुजौ स्मृतौ—ख०; ग० ।
६. युग्गणः पञ्च चैव तु—ख०; ग० ।