नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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विषम पाद में रहे तो त्रिकों द्वारा जाना जानो वाला यह वृत्त पथ्या
कहलाता है ॥ १२५ ॥
यथा—प्रिय-दैवतमित्रासि, प्रिय सम्बन्धि-बान्धवा।
प्रियदानरता पथ्या दयिते त्वं प्रियासि मे ॥ १२६ ॥
तुम देवता तथा मित्रों का आदर करती हो, सम्बन्धी तथा बान्धवों
पर तुम्हारा स्नेह है, तुम सदा प्रेमपूर्वक इष्ट वस्तु को प्रस्तुत करती हो
तथा हितबुद्धिवाली हो इसलिए हे प्रिये, मुझे तुम अत्यन्त प्रिय हो ॥ १२६ ॥
सर्वविषमपथ्या—
म्रौ गौ तु¹ प्रथमे पादे यू सौ ग्लौ च द्वितीयके ।
पादे र्भौ ग्लौ तृतीये च चतुर्थे तु तसौ लगौ² ॥ १२७ ॥
यदि (अनुष्टुप जाति के वृत्त मे) प्रथम पाद में म, र, ग, ग; दूसरे
पाद में य, स, ल, ग; तीसरे पाद में रगण, भगण, लघु तथा गुरु तथा
चौथे पाद में जगण, सगण लघु तथा गुरु हों तो सर्वविषमा पथ्या वृत्त
कहलाता है ॥ १२७ ॥
यथा—नैवाचारो न ते मित्रं न सम्बन्धिगुण-प्रिया ।
सर्वथा सर्वविषमा पथ्या न भवसि प्रिये ॥ १२८ ॥
हे प्रिये, तुम्हारा व्यवहार अच्छा नहीं, तुम्हारा कोई मित्र नहीं, और न
तुमने अपने सम्बन्धीजन के लिए अच्छे कार्य किये, तुम प्रत्येक बात में बड़ी
स्थूल हो। इसी कारण तुम सभी को बड़ी असहमत बन रही हो ॥ १२८ ॥
विपरीत पथ्या—
अयुजोर्लक्षणं³ ह्येतद्विपरीतन्तु यत्र च।
पथ्या हि विपरीता सा विज्ञेया नामतो यथा⁴ ॥ १२९ ॥
जिसमें प्रथम तथा तीसरे पाद के उपर्युक्त पथ्या के लक्षण विपरीत हो
जाएँ तो उसे विपरीतपथ्या वृत्त जानो ॥ १२९ ॥
यथा—कृतेन⁵ रमणस्य किं सखि रोषेण तेऽप्यर्थम् ।
विपरीता न पथ्यासि, त्वं जड़े केन मोहिता ॥ १३० ॥
१. खलु भवेत् पूर्व—क० । २. पथ्या स्तो ग्लौ चतुर्थके—क० ।
३. एतदुदाहरणं ख —ग० पुस्तकयो र्न विद्यते । ४. युग्मयो—ग० ।
५. बुधैः—ख०; ग० ।
६. त्वं जडे केन मोहिता विपरीता न पथ्यासि—क० ।