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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 668 में से

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पृष्ठ 378

षोडशोऽध्यायः २६७
दूसरे तथा चौथे पाद में नगण, जगण, जगण, रगण तथा गुरु हों तो
पुष्पिताग्रा वृत्त होता है ॥ १४७ ॥
यथा—पवनरय¹ विधूतचारुशाखं प्रमुदितकोकिलकण्ठनादरम्यम् ।
मधुकर ²परिगीयमान-शब्दं वरतनु पश्य वनं सुपुष्पिताग्रम्॥१४८॥
सुन्दरि, पुष्पों से अलंकृत इस वन को (सिरे तक) देख जाओ ।
इसमें पवन के वेग से टहनियाँ हिल रही हैं, कोकिल आनन्द में आलाप
कर रहे हैं और भौंरे चारों ओर गूँज रहे हैं ॥ १४८ ॥
उद्गता
स्जौ³ स्लौ चादौ यथा नसौ जगौ भौ ज्लौ गश्च तथा पुनः ।
स्जौ स्जौ गश्च त्रिका ह्येते उद्गतायाः प्रकीर्तिताः ॥१४९॥
जिसके प्रथम पाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु हो, द्वितीय पाद
में नगण, सगण, जगण तथा गुरु, तृतीय पाद में भगण, जगण, लघु
तथा गुरु और चतुर्थ पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु हो तो
उद्गता वृत्त होता है ॥ १४९ ॥
यथा—तव रोमराजिरतिभाति, सुतनु मदनस्य मञ्जरी ।
नाभिकमलविवरोत्पतिता⁴, भ्रमरावलीव कुसुमात्समुद्गता⁵ ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी यह रोमावाली—जो नाभिकमल के मध्य से
ऊपर की ओर उठ रही है, पुष्पों पर से जा उड़ने वाली भौरों की कतार—
जो कामदेव की कुसुममंजरी पर बैठी हो—के समान अतिशय शोभित हो
रही है ॥ १५० ॥
ललिता
स्जौ⁶ स्लौ च ततो नसौ जगौ नौ सौ चेति तृतीयके ।
स्जौ स्जौ गश्च चतुर्थे तु ललिताया गणाः स्मृताः ॥ १५१ ॥
१. पवनबल—क० । २. रवगीयमानवृक्षं—ख० ; ग० ।
३. भजो ज्लो गश्च तृतीये स्युः स्जी स्जौ गश्च तुरीयके ।
एते त्रिकाः क्रमप्राप्ता उद्गतायां प्रकीर्तिताः ॥—ख० ; ग० ।
४. कमले—ख० ; ग० । ५. कुसुमे समुद्गता—ख० ; ग० ।
६. स्जो जश्च ललितापादे नसौ जो गश्च द्वितीsurface... wait!
६. स्जो जश्च ललितापादे नसौ जो गश्च द्वितीयके ।
नो सौ चैव तृतीये तु द्विः स्जो गश्च चतुर्थके ॥—ख० ; ग० ।