नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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जिसके प्रथमपाद में सगण, जगण, सगण तथा लघु; द्वितीय
पाद में नगण, सगण, जगण और गुरु, (अर्थात् प्रथम दो पाद उद्गता के
समान हों) तृतीय पाद में दो नगण और दो सगण तथा चतुर्थ पाद में
सगण, जगण, सगण, जगण और एक गुरु हो तो ललिता नामक वृत्त
होता है ॥ १५१ ॥
यथा—१ललिता-कुलअमित२-चारुवसनकरचारुपल्लवा ।
प्रविकसित-कमलकान्तिमुखी³ प्रभासि देहि सुरतश्रमातुरा ॥
हे सुन्दरि, तुम अपने विकसित कमल के समान शोभा वाले मुँह से
अतिशय सुशोभित हो रही हो (और सम्प्रति) शीघ्र सुकुमारता पूर्वक
चलने पर सुन्दर लगने वाले तुम्हारे वस्त्र तथा हाथ भी बड़े अच्छे लग
रहे हैं ॥ १५२ ॥
एवमेतानि वृत्तानि समानि विषमाणि च ।
नाटकाद्येषु४ काव्येषु प्रयोक्तव्यानि सूरिभिः ॥ १५३ ॥
ये सम तथा विषम प्रकार के वृत्त हैं जिनका नाटक तथा काव्य में
सुधिजन प्रयोग करें ॥ १५३ ॥
सन्त्यन्यान्यपि वृत्तानि यान्युक्तानीह पिण्डशः५ ।
न च तानि प्रयोज्यानि ६हतशोभानि तानि हि ॥ १५४ ॥
इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के अन्य मात्रिक वृत्त भी होते हैं, जिन्हें
सामूहिक रूप में बतलाया गया पर उनका (अप्रचलित स्वरूप हो तो)
प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे किसी प्रकार रचनासौन्दर्य को नहीं
बढ़ाते हैं ॥ १५४ ॥
यान्यत्र७ प्रतिषिद्धानि गीतके तानि योजयेत् ।
८ध्रुवायोगे तु वक्ष्यामि तेषामेव९ विकल्पनम् ॥ १५५ ॥
१. ललितावलि भ्रमरजासु वदनकरचारुपल्लवा ।
ललितासुतासुतनु वदतेऽद्य लोचने वलिता लतेव चलबालपल्लवा ॥-क० ।
२. भ्रमिवाहवसनकरपल्लवा हि मे—ख०; ग० ।
३. कमलकान्तमुखि प्रतिभासि—ख०; ग० ।
४. नाटकादिषु—ग० । ५. पण्डितैः—ख०; ग० ।
६. न शोभां जनयन्ति हि—ख० ।
७. यान्यतः परमत्र स्यु—ख०; ग० ।
८. ध्रुवाविधाने व्याख्यास्ये—ख०; ग० । ९. तेषाञ्चैव—ख०; ग० ।