नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २६५
हे सुन्दरि, तुम्हारे अधर दन्तक्षतों से युक्त, जागरण से अलसाई
कोने से युक्त आँखें तथा रति (संभोग) से थका हुआ तुम्हारा चेहरा और
भी सुन्दर हो गया है ॥ १३९ ॥
इत्येषा सर्वविषमा नामतोऽनुष्टुबुच्यते ।
तद्विदां¹ मतवैषम्यं त्रिकादक्षरदस्तथा ॥ १४० ॥
अनुष्टुप् जाति के सर्वविषम स्वरूप में ये भेद हो जाते हैं। इसमें
आचार्यों का मतैक्य नहीं है कि ये त्रिकों से या अक्षरों से लक्षित किये
जाएँ ॥ १४० ॥
वानवासिका
पादे षोडशमात्रास्तु गाथांशक-विकल्पिताः² ।
चतुर्भिरंशकैर्ज्ञेया वृत्तज्ञैर्वानवासिका ॥ १४१ ॥
यदि सोलह मात्राओं से बनने वाले पाद का गाथा छन्द में
(जो कि चार भागों में विभक्त हो) त्रिकों (गणों) के द्वारा या
त्रिकों के भागों द्वारा निरूपण किया जाए तो उसे वानवासिका वृत्त
कहते हैं* ॥ १४१ ॥
यथा—असंस्थितपदा सुविह्वलाङ्गी³ मदस्खलितचेष्टितैर्मनोज्ञा ।
क्व यास्यसि वरोरु सुरतकाले विषमा किं वानवासिका त्वम् ॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी चाल लड़खड़ाती हुई, शरीर आवेगपूर्ण है और
मधुपान के कारण तुम्हारी चेष्टाएँ बड़ी ही मधुर हैं। इस प्रणयानन्द के
अवसर पर तुम पीछे हटकर कहाँ जा रही हो ? क्या तुम विषमभावना
वाली (विरागयुक्त) वनवासिनी स्त्री तो नहीं ? ॥ १४२ ॥
केतुमती
स्र्जौ सगौ च प्रथमे पादे तथा चैव तृतीयके ।
केतुमत्यां गणाः प्रोक्ता भौ नगौ गश्च सदा बुधैः ॥ १४३ ॥
यदि प्रथम तथा तृतीय पाद में सगण, जगण, सगण तथा गुरु तथा
द्वितीय और चतुर्थपाद में भगण, रगण, नगण तथा गुरु हों तो केतुमती
वृत्त होता है ॥ १४३ ॥
- पिङ्गलाचार्य ने इसे मात्रासमक माना है जिसका प्रभेद वानवासिका
होता है ।
१. द्विधामतं हि वैषम्यं—ख०; ग० ।
२. यस्या नित्यं भवन्ति हि—क०; त्रिकांशक विकल्पिता—ग० ।
३. सविह्वलाङ्गी—क० ।