नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० नाट्यशास्त्रम्
चार मात्रा के अयुग् गण काव्य रचना में कवि द्वारा रखे जा सकते हैं
पर युग् गण में ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है ॥ १६० ॥
१षष्ठस्य द्विविकल्पस्य नैधने ह्येकसंश्रितः२ ।
३पश्चार्धे तु षष्ठः स्यादेकमात्रस्तु केवलः ॥ १६१ ॥
षष्ठ गण के दो (वैकल्पिक) स्वरूप हैं और आठवाँ गण केवल एक
वर्ण होता है। उत्तरार्ध में छठा गण केवल एक मात्रा से ही निर्मित
होता है ॥ १६१ ॥
द्विविकल्पस्तु षष्ठो४ यो गुरुमध्यो भवेत्तु सः ।
तथा५ सर्वलघुश्चैव६ यतिसंज्ञासमाश्रितः ॥ १६२ ॥
छः गण के दो वैकल्पिक स्वरूपों में एक है 'ज' जिसमें गुरु मध्य में
होता है और दूसरा इसका रूप चार लघु वर्ण (मात्रा) वाला है। ये यति
से सम्बद्ध या उस पर आश्रित रहते हैं ॥ १६२ ॥
७द्वितीयादिलघुर्ज्ञेयः सप्तमे९ पञ्चमे यतिः ।
८प्रथमादिरथान्त्ये च पञ्चमे वा विधीयते ॥ १६३ ॥
जब दूसरा गण आदि लघु हो तथा पंचम-गण के बाद हो तो यति
होती है, जबकि वह पूर्ण होता हो या षष्ठ गण के प्रथम अक्षर से या पाँचवें
गण के बाद पूर्ण होता हो ॥ १६३ ॥
[ १०गुरुमध्यविहीनस्तु चतुर्गुणसमन्वितः ।
अयुग्गणो विधातव्यः युग्गणस्तु स एव च ॥
प्रक्षिप्तः—मध्य गुरु अर्थात् जगण को छोड़ कर चार गण से युक्त विषम
गण वाले तथा शेष उसी प्रकार सम गण वाले पाद रखे जाते हैं।]
१. षष्ठोऽस्य द्विविकल्पः स्यात्—क०; षष्ठो वै द्विविकल्पस्तु—ख० ।
२. संस्थितः—क०; ख० ।
३. पश्चार्धे यो गणः षष्ठ एकमात्रः स इष्यते ।—क०; स उच्यते—ख०; ग० ।
४. षष्ठोऽत्र—ग० । ५. यथा—ख० ।
६. सर्वयतिश्चैव यदि संज्ञां—क० यतिः संज्ञाः समाश्रितः—ग० ।
७. सद्वितीयाद्विलघुनी सप्तमे सप्तमाद्यदि—क०, सा द्वितीया द्विलघुका
सप्तमे प्रथमे यतिः—ख; साद्वितीयाद् द्विलघुनि सप्तमे प्रथमाद्यति—ग० ।
८. प्रथमादि तथान्ते च—क; ग० ।
९. पञ्चमे तु—ग० ।
१०. प्रमाणश्चैव पञ्चमः—ख० ।