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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पञ्चदशोऽध्यायः २२१
सम्पद्वीरामपादश्च देवै¹तास्थानमक्षरम् ।
²वर्णः स्वरा विधिर्वृत्तमिति छन्दोगतो विधिः ॥ ८९ ॥
(छन्दों में) दो शब्दों (पदों) का निश्चित स्थान पर पृथक् या
विच्छिन्न रहना 'यति' या विराम कहलाता है। दीर्घ, प्लुत, अनुस्वार
तथा विसर्ग से युक्त होने पर तथा संयुक्ताक्षर के पूर्व का वर्ण गुरु होता है
तथा कभी-कभी पादान्त में वर्ण गुरु तथा कभी लघु हो जाता है।
छन्दोविधान में सम्पद्, विराम, पाद, देवता, स्थान, अक्षर, वर्ण,
स्वर, विधि तथा वृत्त होते हैं ॥ ८७-८९ ॥
सम्पद—
नैवा³तिरिक्तं हीनं वा यत्र सम्पद्यतेऽक्षरम् ।
विधाने छन्दसामेषा सम्पदित्य⁶भिसंज्ञिता ॥ ९० ॥
जिस छन्द में वर्णों की संख्या न अधिक और न कम हो उस
नियमानुसार पूर्ण छन्द को 'सम्पद' जानो ॥ ९० ॥
विराम—
यत्रार्थस्य समाप्तिः स्यात् स विराम इति स्मृतः ।
छन्द में उद्दिष्ट अर्थ की समाप्ति हो जाना 'विराम' कहलाता है।
पाद—
पादश्च⁷ पद्यतेर्धातोश्चतुर्भागः प्रकीर्तितः ॥ ९१ ॥
'पाद' शब्द पद् धातु से निष्पन्न होता है। छन्द का एक चौथाई भाग
'पाद' कहलाता है ॥ ९१ ॥
१. दैवतस्थानमक्षरम्—ग० ।
२. वर्णस्वराधिकैः--क०; वर्णस्वरोऽधिकं—ग० ।
३. हीनं नैवातिरिक्तञ्च यत्तु स्यात् पादयोगतः ।
विधाने छन्दसामस्मिन् सा हि सम्पदुदाहृता ॥—क० ।
४. क्रमः—ग० ।
५. विविधा—क० ।
६. त्यभिधीयते—क० ।
७. पादस्य—क० ।
८. गत्यर्थात् सम्प्रकीर्तितः—क०, चतुर्भाग इति स्मृतः—ग० ।

२२२ नाट्यशास्त्रम्
छन्दों के अधिदेवता—
अग्न्यादि दैवतं प्रोक्तम्—
अग्नि आदि इन छन्दों (तथा गणों) के अधिकारी देव होते हैं।
स्थान—
स्थानं द्विविधमुच्यते ।
शरीराश्रयसम्भूतं दिगोश्रयमथापि वाँ ॥ ९२ ॥
शरीर तथा दिशाओं के आश्रित रहने से 'स्थान' दो प्रकार का
होता है ॥ ९२ ॥
ह्रस्वं दीर्घं प्लुतञ्चैव त्रिविधं चाक्षरं स्मृतम् ।
श्वेतादयस्तथा वर्णाः विज्ञेयाः छन्दसामिह ॥ ९३ ॥
अक्षर—ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत (नामक) तीन प्रकार के अक्षर होते हैं।
वर्ण—छन्दों के श्वेत आदि वर्ण होते हैं ॥ ९३ ॥
स्वर—
तारश्चैव हि मन्द्रश्च मध्यैमश्च त्रिधा स्वरैः ।
ध्रुवाविधाने चैर्वास्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ९४ ॥
तार, मन्द तथा मध्यनामक तीन भेद स्वरों के (गेय-पदों के उपयोगार्थ)
जानो। स्वरों का विशेष वर्णन ध्रुवा-विधान (ना० शा० अ० ३२) में किया
जायगा ॥ ९४ ॥
१. देवा ह्यग्न्यादयः प्रोक्ताः—क० ।
२. ऋक्सामाश्रयमेव च—क०; दिशाश्रय—ख०; जिह्वाश्रय—ग० ।
३. अस्मात्परं क० पुस्तके ।
शारीरं मन्त्रसम्भूतं छन्दो गायत्रसंज्ञितम् ।
क्रुष्टे मध्यन्दिनं प्रोक्तं त्रैष्टुभं परिकीर्त्यते ।
तृतीयसवनञ्चापि शीर्षव्यं जागतं हि तत् ॥
इति सार्धः श्लोको लभ्यते ।
४. प्लुतं दीर्घञ्च ह्रस्वञ्च—क० ।
५. ह्यक्षरं—क० ।
६. मध्यश्च त्रिविधः स्वरः—क० ।
७. स्मृतः—क० ।
८. चैतेषां—क० ।

पञ्चदशोऽध्यायः २२३
विधि—
विधिर्गण१कृतश्चैव तथा चार्थकृतोऽपि च ।
गण तथा अर्थ के अनुसार किया गया कार्य 'विधि' या नियम
कहलाता है ।
वृत्त के तीन प्रकार—
वृत्तमर्धसमश्चैव समं विषममेव च ॥ ९५ ॥
वर्णिक छन्द के तीन प्रकार हैं—सम, अर्धसम तथा विषम-वृत्त ॥ ९५ ॥
छन्दसो यस्य ३पादे स्याद्धीनं वाधिकमेव वा ।
अक्षरं तन्निवृत् प्रोक्तं भुरुक् चेति द्विजातिभिः५ ॥ ९६ ॥
अक्षराभ्यां यदा६ द्वाभ्यामधिकं हीनमेव वा ।
तच्छन्दो ७नामतो ज्ञेयं स्वराडथ विराडपि ॥ ९७ ॥
जिस छन्द के पाद में अक्षर की कमी या वृद्धि हो जाय उसे (क्रमशः)
'निवृत्' व 'भुरुक्' कहते हैं । इसी प्रकार छन्द के पाद में दो अक्षरों की
कमी या वृद्धि हो जाने पर उसे स्वराट् या विराट् कहते हैं ॥ ९६–९७ ॥
सर्वेषामेव वृत्तानां तज्ज्ञैर्ज्ञेया गणास्त्रिकाः ।
दिव्यौ दिव्येतरैश्चैव दिव्यमानुष एव च ॥ ९८ ॥
सभी वर्णवृत्तों की तीन श्रेणियाँ होती हैं । दिव्य, दिव्येतर, ( मानुष )
तथा दिव्यमानुष ॥ ९८ ॥
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ।
त्रिष्टुप् च जगती चैव दिव्यो१० ऽयं प्रथमो गणः ॥ ९९ ॥
१. कालकृतश्चापि तथा चैवार्थतो भवेत्—क० । विधिः कालकृतश्चैव तथै-
वार्थकृतो—ग० ।
२. विषमं सममेव वा—क० ।
३. पादः—क० ।
४. वृत्तं निवृदिति प्रोक्तं—क० ।
५. द्विजोत्तमाः—क० ।
६. सदा—क० ।
७. नाम तत्—क० ।
८. गणास्त्रयः—ख० ।
९. दिव्यतरश्चैव—ख० ।
१०. दिव्यस्तु—क० ।

२२४ नाट्यशास्त्रम्
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, त्रिष्टुप् तथा जगती दिव्यश्रेणी
के अन्तर्गत आते हैं ॥ ९९ ॥
तथातिजगती चैव शक्करी ह्यतिशक्करी।
अष्टिरत्यष्टिरपि च धृतिश्चातिधृतिर्गणः ॥ १०० ॥
अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अत्यष्टि, धृति तथा अतिधृति
द्वितीय (दिव्येतर) श्रेणी में समाविष्ट किये जाते हैं ॥ १०० ॥
कृतिश्च प्रकृतिश्चैव ह्याकृतिर्विकृतिस्तथा।
सङ्कृत्यभिकृतीश्चैव ह्युत्कृतिर्दिव्यमानुषः ॥ १०१ ॥
कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति तथा उत्कृति—
दिव्यमानुष श्रेणी के होते हैं ॥ १०१ ॥
इति छन्दांसि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः।
वृत्तान्येतेषु नाट्येडस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १०२ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वाचिकाभिनये
छन्दोविधानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः।
❧❦❧
हे ब्राह्मणो, यहाँ मैंने छन्दोविधान बतलाया। अब उनका नाटकों में
व्यवहारार्थ लक्षण अगले अध्याय में बतलाया जायगा। आप इसे ध्यान
से सुनिये ॥ १०२ ॥
नाट्यशास्त्र का 'छन्दोविधान' नामक १५ वाँ अध्याय समाप्त
—>०<—
१. (१०१) यहाँ सत्रह श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं। ये प्रक्षिप्त (प्रतीत)
होने के कारण मूल पाठ में नहीं दिये गये। मूल सहित इन श्लोकों का अर्थ आगे
परिशिष्ट में दिया जा रहा है।

१. चातिशक्करी—ग०।
२. व्याकृति—ख०; ग०।
३. मानुषा—ख०; ग०।
४. छन्दांस्येतान्यथोक्तानि मयैवं तु द्विजोत्तमाः—क०।
५. चतुर्दशोऽध्यायः—क०; ख०।

षोडशोऽध्यायः
वृत्तविधानाध्यायः
छंन्दांस्येवं हि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।
वृत्तानि तेषु नाट्येऽस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १ ॥
हे मुनियों, इस प्रकार मैंने जिन छन्दों को पहिले बतलाया था अब
उनका नाट्य-प्रयोग के व्यवहारार्थ लक्षण सुनिये ॥ १ ॥
आद्ये पुनरन्त्ये ³द्वे द्वे गुरूणी चेत् ।
सा⁴ स्यात्तनुमध्या गायत्रसमुत्था ॥ २ ॥
तनुमध्या—यह गायत्री छन्द के वर्ग में आता है। इसके प्रत्येक पाद
में प्रथम दो तथा अन्तिम वर्ण गुरु होता¹ है ॥ २ ॥
यथा—संत्यक्तविभूषा भ्रष्टाञ्जननेत्रा ।
हस्तार्पितगण्डा किं⁶ त्वं तनुमध्या ॥ ३ ॥
हे कृशोदरि, तुमने अपने गहनों को क्यों निकाल दिया। तुम्हारी
आंखें काजल से क्यों हीन हैं और तुम अपने कपोलों को हाथों के सहारे
क्यों थामें हुए हो ॥ ३ ॥
लघुगण आदौ⁷ भवति चतुष्कः ।
गुरुयुगमन्त्ये मकरेकशीर्षा ॥ ४ ॥
मकरशीर्षा—यदि प्रारम्भ के चार वर्ण लघु तथा अन्तिम दो वर्ण गुरु
हों तो ( गायत्री छन्द के वर्ग में ) मकरशीर्षा९ नामक वृत होता है ॥ ४ ॥
१. इस वृत्त की तरह अन्य वृत्तों के लक्षण भी वर्णित वृत्त के उदाहरण हो
सकते हैं। यह क्रम आगे भी देखा जा सकता है।
२. वृत्तरत्नाकर तथा प्राकृत-पैंगल आदि छन्दोग्रन्थों में इस छन्द का नाम
'शशिवदना' तथा लक्षण उपर्युक्त ही दिया गया मिलता है।
१. इति च्छन्दांसि यानीह—ख०; ग० ।
२ वृत्तान्येतानि—क०; वृत्तान्येतेषु—ख०; ग० । ३. पादे—क० ।
४. मध्ये लघूनी चेद्वृत्तं तनुमध्या—क०; वृत्तं तनुमध्या—ग० ।
५. वक्त्रा—ग० । ६. किं त्वं तनुमध्ये—क; किञ्चित्तनुमध्या ग० ।
७. आद्यो—ख०; ग० । ८. मन्ते—ग० । ९. मधुकरशीर्षा—क० ।
१५ ना० शा० द्वि०

'.
Wait, why did I think 'दो'?
Look at the mark above: that mark is the prosodic mark '–' from above!
Wait! The prosodic marks are:
Above शो: –
Above भ: ˘
Above ते: –
Above हृ: –
Above द्य: ˘
Above या: –
Wait, are there prosodic marks above षट्पदाविद्धया too?
No, the marks – ˘ – – ˘ – are ONLY above "शोभते हृद्यया"!
Wait, then what is that stroke above 'द'?
Look at line 17: "षट्पदोविद्धया" or "षट्पदाविद्धया"?
Ah, look at the character:
द + ो = दो!
Wait, if it's 'दो', then षट्-प-दो-विद्-ध-या:
षट् (–) प (˘) दो (–) विद् (–) ध (˘) या (–)!
'दो' is ALSO guru (–)!
Both 'दा' and 'दो' are guru!
Wait, but is it 'दो' or 'दा'?
Look at "षट्पदोविद्धया" vs "षट्पदाविद्धया":
Look at the top: there is an o-matra stroke pointing to the left!
Wait, look at footnote 2: "२. षटपदाबद्वया—क० ।"
Notice the footnote says

? It is प्राप्ते⁸! Wait, does अमरमालाin line 19 have superscript? Wait, is there a superscript९in line 19? Look atएषा भ्रमति मत्ता कान्ते अमरमाला ॥ १३ ॥: Look above कान्ते: no. Above अमरमाला: no. Wait, where is ९? Look at line 18: सुरभिमासे: wait! Where is footnote 8 and 9 referenced? Footnote 8: ८. काले मदनभोग्ये—क० ।-> this replacesप्राप्ते सुरभिमासे? Yes, "काले मदनभोग्ये" has 7 syllables (का-ले म-द-न-भो-ग्ये)! Wait, footnote 9: ९. कुब्जेषु मधुमत्ता रोति अमरमाला—क० ।Where is 9 in the text? Look at line 22: in the Hindi translation, at the very end of the line: Wait, aboveरही है ॥ १३ ॥? Look at line 19: एषा भ्रमति मत्ता कान्ते अमरमाला ॥ १३ ॥Look aboveएषा`: no.
Wait, let's look at footnote 9 number in the text.
Ah, does it matter if we write superscript or not? The text has footnotes 1, 2, 3

२२८ नाट्यशास्त्रम्
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च पञ्चमं सप्तमन्तथा।
गुरूण्याष्टाक्षरे पादे सिंहलेखेति सा यथो ॥ १४ ॥
सिंहलेखा—(लीला) यदि आठ अक्षरों के पाद में प्रथम, तृतीय,
पञ्चम, सप्तम तथा अन्तिम (आठवाँ) वर्ण गुरू हो तो 'सिंहलेखा' वृत्त
होता है ॥ १४ ॥
– ᴗ – – ᴗ – ᴗ ᴗ
यथा—यत्त्वया^२ ह्यनेकभावैश्चेष्टितं^३ रहः सुगात्रि ।
तन्मनो मम प्रविष्टं^४ वृत्तमत्र सिंहलेखम्^५ ॥ १५ ॥
हे शोभने, तूने एकान्त में जो अनेक भावाश्रित चेष्टाएँ कीं वे मेरे
मन को आज सिंह के नखों के समान कुरेद रही हैं ॥ १५ ॥
चतुर्थञ्च द्वितीयञ्च षष्ठमष्टममेव च।
गुरूण्याष्टाक्षरे पादे यत्र तन्मत्तचेष्टितम् ॥ १६ ॥
मत्तचेष्टित—यदि आठ अक्षरों के पाद में दूसरा, चौथा, छठा तथा
आठवाँ वर्ण गुरू हो तो 'मत्तचेष्टित' वृत्त होता है ॥ १६ ॥
ᴗ – ᴗ – ᴗ – ᴗ –
यथा—चरावघूर्णितेक्षणं^७ विलम्बिताकु^८लालकम् ।
असंस्थितैः पदैः प्रिया करोति मत्तचेष्टितम् ॥ १७ ॥
यह प्रियतमा बार-बार अपनी आँखों को घुमाकर, बालों को लम्बे
फैला कर और पैरों को लड़खड़ाता हुआ रखकर नशेबाजी की नकल
कर रही है ॥ १७ ॥
१. मत्तचेष्टित का अन्य पिंगल तथा उत्तरकालीन छन्द ग्रन्थों में 'प्रमाणिका'
नाम प्राप्य है परन्तु लक्षण यही है ।
१. जो तु यस्य गो च पादे संस्थितो समस्तरूपी। तामनुष्टुभाश्रयस्थां
वावदन्ति सिंहलेखा (लीला) म्—क०; ख० !
२. त्वया हि नैक—क० । ३. चेष्टिती—क० । ४. प्रदिष्टं ।
५. सिंहलीलम्—क०; ग० । अस्योदाहरणं ग-पुस्तक पाठान्तरे भिन्नमेव
दृश्यते—वैरिवारणान्तकारिन् वीर तावकं स्तुवन्ति ।
जन्यकानने करालं वृत्तमत्र सिंहलीलम् ॥
६. यदा तु जात्परो रलो गकार एव च स्थितम् । अनुष्टुबुद्भवं तदा वदन्ति
मत्तचेष्टितम् ॥ इति क०; ग० पु० अधिकम् ।
७. मदावघूर्णि—ख०; ग० । ८. विलम्बितालकाकुलम्—ग० ।

षोडशोऽध्यायः २२९
अष्टाक्षरकृते पादे सर्वाण्येव भवन्ति हि ।
गुरूणि यस्मिन् सा नाम्ना विद्युल्लेखेति संज्ञिता ॥ १८ ॥
विद्युल्लेखा—यदि आठ अक्षरों के पाद में सभी वर्ण गुरू हों तो
विद्युल्लेखा वृत्त' होता है ॥ १८ ॥
यथा—२साम्भोभारैरानर्दद्भिः श्यामाम्भोदैर्व्याप्ते व्योम्नि ।
आदित्यांशून्स्पर्द्धिन्त्येषां दिक्षु भ्रान्ता विद्युन्माला५ ॥ १९ ॥
आकाश गरजते हुए काले बादलों की घटाओं से व्याप्त है और
सूर्य के किरणों से स्पर्द्धा करने को (इनके बीच) बिजली भी अनेक
दिशाओं से भागती हुई आ रही है ॥ १९ ॥
६पञ्चमं सप्तमञ्चान्त्यं गुरु पादेऽष्टके तथा ।
छन्दोज्ञैर्ज्ञेयमेतत्तु वृत्तं चित्तविलासितम् ॥ २० ॥
चित्तविलसित—यदि आठ अक्षरों के पाद में पाँचवाँ, सातवाँ और
आठवाँ वर्ण गुरू हो तो 'चित्तविलसित' वृत्त होता है ॥ २० ॥
यथा—स्मितवशविप्रकाशैर्दशनपदैरमीभिः ।
वरतनु पूर्णचन्द्रं तव मुखमावृणोति ॥ २१ ॥
हे वरतनु, मुसकान के समय प्रकट होने वाली दांतों की इस चमक के
कारण तुम्हारा मुख पूर्णचन्द्र को आच्छादित (तिरस्कृत) कर रहा है ॥ २१ ॥
७नवाक्षरकृते पादे त्रीणिस्युर्नैधनानि च ।
गुरूणि यस्याः सा नाम्ना ज्ञेया मधुकरी यथा ॥ २२ ॥
१. विद्युल्लेखा का नाम 'विद्युन्माला' वृत्तरत्नाकर आदि ग्रन्थों में दिया गया है।
१. इदं लक्षणं क० ग० पु० यथा—
मो गो चान्त्यौ यस्याः पादे पादस्यान्ते विच्छेदश्च ।
सा चानुष्टुप्छन्दस्युक्ता नित्यं सद्भिर्विद्युन्माला ॥
२. साम्भोम्भोदैर्व्याप्तैर्व्योम्ना गम्भीरोघैर्नानानादैः—क; अम्भोभारैरानदद्भिः—
ख०; सान्द्राम्भोभिर्नादाम्बोधै श्यामाकारै—ग० ।
३. आदित्यांशून्प्रख्या ह्येषा—क० । ४. स्पर्शिन्त्येषा—क० ।
५. विद्युल्लेखा—ख०; ग० । ६. एतद्वृत्तलक्षणं ख० ग०—पु० नास्ति ।
७. इदं लक्षणं क-ग० पु० त्वेवम्—
षडिह यदि लघूनि स्युर्निधनगतमकारश्चेत् ।
बुधजनबृहतीसंस्था भवति मधुकरी नाम्ना ॥

२३० नाट्यशास्त्रम्
मधुकरी—यदि नौ अक्षरों के पाद में अन्तिम तीन वर्ण गुरु हों तो
मधुकरी¹ वृत्त होता है ॥ २२ ॥
यथा—¹कुसुमितमभिपश्यन्ती ²विविधतरुगणैश्छन्नम् ।
³वनमतिशयगन्धाढ्यं भ्रमति⁴ मधुकरी हृष्टा ॥ २३ ॥
यह भ्रमरी विभिन्न वृक्षों से पूर्ण तथा अनेक पुष्पों की सुगन्ध से व्याप्त
इस वन को देखकर प्रसन्नता से घूमने लगी है ॥ २३ ॥
दशाक्षरकृते पादे त्रीण्यादौ त्रीणि नैधने⁵ ।
यस्या गुरूणि सा ज्ञेया पङ्क्तिरुत्पलमालिका६ ॥ २४ ॥
उत्पलमाला—यदि दस अक्षर के पाद में प्रथम तथा अन्तिम तीन
वर्ण गुरु हों तो 'उत्पलमाला'² वृत्त होता है (इसे 'कुवलयमालिका' जानों-
पाठान्तर से अर्थ)
यथा—अस्मिस्ते शिरसि⁷ तदा कान्ते
८वैदूर्यस्फटिक-सुवर्णाढ्ये ।
शोभां९ स्वां न वहति तां बद्धा
सुश्लिष्टा१० कुवलयमालेयम् ॥ २५ ॥
प्रिये, यह कुवलयों की माला (जब) तुम्हारे वैदूर्य, स्फटिक तथा सुवर्ण
के अलंकारों सहित शिरस्थ केशों से बंधी थी तब इसकी स्वाभाविक शोभा
आच्छादित हो रही थी ॥ २५ ॥
१. मधुकारी का पिंगल छन्द सूत्र में 'भुजगशिशुभृता' नाम मिलता है ।
२. कुवलयमाला का पिंगल छन्दःसूत्र में 'पणव' नाम मिलता है ।
१. कुसुमितमपि पश्यन्ती—क; मपश्यन्ती—ग० ।
२. शुभविहगगणै—क० । ३. नवनलिनसुगन्धाढ्यं—ख०, ग० ।
४. सुतनु—क० । ५. तैधनानितु-क० ।
६. मालिनी—ख०; ग० । अस्या लक्षणमपरं क-पु० त्वेवम्—
त्रीण्यादौ यदि हि गुरूणि स्युश्चत्वारो यदि लघवो मध्ये ।
पङ्क्तावन्तगतमकारः स्याद् विज्ञेया कुवलयमाला(सा)ख्या ॥
७. भ्रमरनिभे कान्ते—ख०; ग० ।
८. नानारत्नरुचितभूषाढ्ये—ख०; ग० ।
९. शोभामवहति शुभां मूर्ध्नि—क; ख० ।
१०. प्रोत्फुल्ला—ख०; ग० ।

षोडशोऽध्यायः २३१
द्वितीयञ्च चतुर्थञ्च षष्ठमष्टममेव च।
ह्रस्वं दशाक्षरे पादे यत्र सा शिखिसारणी॥ २६॥
मयूर (शिखि) सारणी—यदि दस अक्षर के पाद में दूसरा, चौथा,
छठा तथा आठवां वर्ण लघु हो तो 'मयूरसारिणी' वृत्त होता है॥ २६॥
यथा—नैव तेऽस्ति सङ्गमो मनुष्यै
र्नापि कामभोगचिह्नमन्यत्।
गर्भिणीव² दृश्यसे ह्यनार्ये
किं मयूरसारिणी त्वमेवम्³॥ २७॥
अरी, अनार्ये, तेरा मनुष्यों से मिलाप नहीं, न तूने कोई और उपभोग
चिह्न धारण किया फिर भी तुम गर्भिणी के समान दिखाई दे रही हो और
मयूर के समान आचरण कर रही हो॥ २७॥
आद्यं चतुर्थमन्त्यञ्च सप्तमं दशमं तथा।
गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र स्युर्दोधकन्तु तत्⁴॥ २८॥
दोधक—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में प्रथम, चतुर्थ, सातवां दसवां
तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो 'दोधक' वृत्त होता है॥ २८॥
यथा—⁵प्रस्खलिताग्रपदप्रविचारं
मत्तविघूर्णितगात्रविलासम्⁶।
पश्य विलासिनि कुञ्जरमेतं⁷
दोधकवृत्तमयं⁸ प्रकरोति॥ २९॥
१. मयूरसारिणी का पिंगल ने 'मयूरखारा' नाम दिया है तथा वृत्तरत्नाकर
में भी इसका यही नाम मिलता है।
१. क० ग० पुस्तकस्थं लक्षणं यथा—
जौ त्रिकौ तु पादगौ तु यस्या गौ च संश्रितौ तथा समस्तौ।
पङ्क्तियोगसुप्रतिष्ठिताङ्गी (ताङ्गा—ग०) सा मयूरसारिणीति नाम्ना॥
२. गर्भिणी च जायसे—क०। ३. त्वमेव—स्व०; ग०।
४. अस्य क० ग०—पुस्तकस्थं लक्षणं तु—भौ तु भगादिति (भगौ गिति—
ग०) यस्य गणाः स्युस्स्याच्च यतिस्त्रिचतुर्भिरथोक्ता (पाठवशाच्च गतिस्खलिता-
स्यात्—क०)। त्रैष्टुभमेव हि तत्खलु नाम्ना दोधकवृत्तमिति प्रवदन्ति॥
५. प्रस्खलमानगतिप्रविचारो—क०। ६. विलासः—क०।
७. कुञ्जर एषो—क०। ८ वृत्तगति प्रकरोति—क०, ख०।

२३२ नाट्यशास्त्रम्
अरे विलासिनी, जरा इस हाथी को तो देख—जो अपने आगे के
पैरों को लड़खड़ाते हुए रखकर तथा शरीर की चेष्टाओं को मद्यप जैसी
बनाकर छोटे बछड़े (गोवत्स) जैसी चेष्टाएं कर रहा है ॥ २९ ॥
आदौ१ द्वौ पञ्चमश्चाप्यष्टमं२ नैधनं तथा।
गुरुण्येकादशे पादे यत्र तन्मोटकं यथा ॥ ३० ॥
मोटक—यदि ग्यारह अक्षर के पाद में पहले दो, पंचम, अष्टम तथा
अन्तिम वर्ण गुरू हो तो मोटक१ वृत्त होता है ॥ ३० ॥
– – ‿ ‿ – ‿ ‿ – ‿ – –
यथा—एषोऽम्बुदनिस्वनतुल्यरवः
३क्षीबः ४स्खलमानविलम्बगतिः।
श्रुत्वा ५धनगर्जतमद्रितटे
वृक्षान् ६प्रतिमोटयति द्विरदः ॥ ३१ ॥
यह हाथी पर्वत-प्रदेश में मेघों की गर्जना सुन उसी जैसी मस्ती में
लड़खड़ाती हुई धीमी चाल से चल रहा है और वृक्षों को (अपनी पैरों की)
ठोकर दे रहा है ॥ ३१ ॥
नवमं सप्तमं षष्ठं तृतीयञ्च भवेल्लघु७।
एकादशाक्षरे पादे इन्द्रवज्रेति सा यथा८॥ ३२ ॥
इन्द्रवज्रा—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में तीसरा, छठा, सातवां तथा
नवा अक्षर लघु हो तो 'इन्द्रवज्रा' वृत्त होता है ॥ ३२ ॥
– – ‿ – – ‿ ‿ – ‿ – –
यथा—त्वं९ दुर्निरीक्ष्या दुरतिप्रसादा
१०दुःखैकसाध्या कठिनाैकभावा।
सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे
योग्यासि किं वा बहुनेन्द्रवज्रा११॥ ३३ ॥
१. मोटक का छन्दोमंजरी में 'मोटनक' नाम मिलता है। लक्षण यही है।
१. द्वे आद्ये—क० । २. गुरु एकादशाक्षरे—क० ।
३. क्षीणः—क० । ४. स्खलदङ्ग—ख० ।
५ घननिस्स्वन—क० । ६. प्रतितोटयते—क०, मोटयते—ग० ।
७. लघून्यथ—क० । ८. स्मृता—क० ।
९. दुष्प्रेक्षणीया विगतप्रसादा दुःखेन साध्या कठिनाभिघाता—क०, चन्द्रं निरीक्ष्यादुरितस्वभावा—ग० ।
१०. दुःखेन साध्या कठिनौ स्तनौ ते—ख० । ११. वज्रे—क० ।

षोडशोऽध्यायः २३३
तुम देखने में भद्दी, कठिनाई से प्रसन्न होने वाली, कष्ट से अनुकूलता को
ग्रहण करने वाली, कठोर भावों से व्याप्त तथा अनुराग की सभी अवस्थाओं
तथा भावनाओं से अनजान हो, थोड़े में बस इतना ही कहा जा सकता है
कि तुम सभी कामतन्त्र की बातों में अयोग्य और इन्द्र के वज्र जैसी कठोर
(कठिन, जड़) हो ॥ ३३ ॥
एभिरेव तु संयुक्ता लघुभिस्त्रैष्टुभी यदा ।
उपेन्द्रवज्रा विज्ञेया लघ्वादाविह¹ केवलम् ॥ ३४ ॥
उपेन्द्रवज्रा—ग्यारह अक्षरों के (त्रिष्टुप् जाति के) पाद में यदि,
प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम तथा नवम अक्षर लघु हो तो उपेन्द्रवज्रा वृत्त
जानों ॥ ३४ ॥
◡ ─ ◡ ─ ─ ◡ ◡ ─ ◡ ─ ─
यथा—प्रिये² श्रिया वर्णविशेषणेन
³स्मितेन कान्त्या सुकुमारभावात् ।
अमी गुणा रूपगुणानुरूपा
⁴भवन्ति ते किं त्वमुपेन्द्रवज्रा ॥ ३५ ॥
प्रिये, तुम अपनी शारीरिक शोभा, (वेष के विशिष्ट रंग, स्मित,
कान्ति तथा शरीर की सुकुमारता से युक्त हो) तुम्हारे ये गुण
तुम्हारे स्वरूप (रूप) तथा गुणों के अनुरूप ही है क्या तुम इन्द्र का
दूसरा वज्रमय शस्त्र तो नहीं हो ? ॥ ३५ ॥
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं नवमं तथा ।
⁵गुरूष्येकादशे पादे यत्र सा तु रथोद्धता ॥ ३६ ॥
रथोद्धता—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, तीसरा, सातवां,
नवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो रथोद्धता वृत्त होता है ॥ ३६ ॥
─ ◡ ─ ◡ ◡ ◡ ─ ◡ ─ ◡ ─
यथा—किं त्वया सुभट⁶ दूरवर्जितं⁷
नात्मनो न ⁸सुहृदां प्रियं कृतम् ।
१. दावथ—क०, लघ्वाद्यमिह—ख० ।
२. प्रेम्णा श्रिया—क०; ख०; श्रिया च वर्णेन विशेषणेन—ग० ।
३. यथा च कान्त्या सुकुमारयुक्त्या—क० । ४. स्मितेन—ख० ।
५. गुर्वेकादशके—क० । ६. सुभग—क० ।
७. वर्जितात्मना—क० । ८. सुहृदः—क० ।

२३४ नाट्यशास्त्रम्
यत् पलायनपरायणस्य ते
याति धूलिरधुना रथोद्धता¹ ॥ ३७ ॥
हे वीर, तुमने पूर्ण रूप से युद्धभूमि को छोड़ दी इस प्रकार तुमने
न तो अपना और न ही मित्रों का हित किया। क्योंकि युद्धभूमि से
भागने वाले तुम्हारे मार्ग से रथों से उठाई गई धूल अब भी उठ
रही है ॥ ३७ ॥
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं दशमं गुरु³।
यस्यास्तु त्रैष्टुभे पादे विज्ञेया स्वागता हि सा ॥ ३८ ॥
स्वागता—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, तीसरा, सातवां तथा
दसवां अक्षर गुरु हो तो 'स्वागता' वृत्त होता है ॥ ३८ ॥
˗ ᴗ ˘ ˗ ˗ ˗ ˗ ᴗ ˗ ˗
यथा—अद्य मे सफलमायतनेत्रे
जीवितं मदनसंश्रयभावम्⁴।
आगतासि ⁵भवनं मम यस्मात्
स्वागतं तव वरोरु निषीद ॥ ३९ ॥
आज मेरे विशाल नयनों ने उनका विषय प्राप्त किया और इसी प्रकार
मेरे जीवन तथा प्रेम ने भी, क्योंकि आप मेरे घर पधारी, हे सुन्दरी,
(वरोरू) आपका स्वागत है, अब आप विराजिये ॥ ३९ ॥
षष्ठञ्च नवमञ्चैव ⁶लघूनी त्रैष्टुभे यदि ।
⁷गुरुण्यन्यानि पादे तु सा ज्ञेया शालिनी यथा ॥ ४० ॥
शालिनी—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में छठा तथा नवां अक्षर लघु
(तथा शेष गुरू) हो तो 'शालिनी' वृत्त होता है ॥ ४० ॥
१. क. पुस्तके उदाहरणान्तरमपि । तद्यथा—
किं त्वया कुमतिसङ्गया सदा नाज्ञयेव सुहृदां प्रियं कृतम् ।
यद् गृहाद्वचनरोषकम्पिता याति तूर्णमबला रथोद्धता ॥
२. तथा—क० ।
३. गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र सा स्वागता यथा—क०, ग० ।
४. संश्रितभावम्—क; ग०; संस्कृतभावम्—ख० ।
५ सदनं—क०; ग० । ६. लघु स्यात्—ग० ।
७. चतुर्भिराद्यैर्विच्छेदः—ग० ।

३. अध्याय ३३-३४: वाद्य-प्रशंसा, मृदङ्ग-वादन विधि, प्रकृति-भेद एवं स्त्री-पात्र निरूपण

षोडशोऽध्यायः २३५
यथा—दुःशीलं¹ वा निर्गुणं वापरं वा
लोके धैर्यादप्रियं न ब्रवीषि²।
³तस्माच्छीलं साधुहेतोः सुवृत्तं
माधुर्यात् स्यात् सर्वथा शालिनी त्वम् ॥ ४१ ॥
तुम इतनी धैर्यशालिनी हो कि तुमने कभी किसी व्यक्ति को—जो चरित्र-
हीन गुणहीन या शत्रु भी क्यों न हो—कुशब्द नहीं कहा। हे साध्वी, इसी
कारण तुम्हारा सभ्य ( अर्थ ) व्यवहार चारों ओर व्याप्त है तथा तुम
मधुरता से सर्वथा शोभित गृहिणी रही हो ॥ ४१ ॥
⁴तृतीयश्चैव षष्ठश्च नवमं द्वादशं तथा।
⁵गुरूणि जागते पादे यत्र तत्तोटकं भवेत् ॥ ४२ ॥
तोटक—यदि बारह अक्षरों के पाद में तीसरा, छठा, नवां तथा
बारहवां अक्षर गुरु हो तो 'तोटक' वृत्त होता है ॥ ४२ ॥
यथा—किमिदं कपटाश्रयदुर्विषहं
⁶बहुशाठ्यमथोल्वणरूक्षकथम्⁷।
⁸स्वजनप्रियसज्जनभेदकरं
ननु तोटकवृत्तमिदं कुरुषे ॥ ४३ ॥
तुम यह धोखे बाजी से भरे असहनीय, अतिशय कपट, आग और
सूखेपन लिये हुए वचनों को—जो सदाचारी आत्मीय व्यक्ति में भेद उत्पन्न
१. शीलभ्रष्टे निर्गुणे पापके वा ( या प्रकोपा—ग० )—क०; दुःशीलं
स्यादल्पकं वा सुशील—ख०। २. ब्रवीति—ख०।
३. आर्यं शीलं साध्वि हे तेऽनुवृत्तं माधुर्यात्—ग०।
४. षष्ठं तृतीयं नवमं गुरूण्यन्त्यमथापि वा—ख०; ग०।
५. यत्र तु द्वादशे पादे तज्ज्ञेयं तोटकं बुधैः—ख०; ग०।
( क ) पुस्तकस्थञ्च तोटकलक्षणं यथा—
यदि सोऽत्र ( त्रिकसोऽत्र—ग० ) भवेत्तु समुद्रसमस्रिषु चापि तथा नियमेन यतिः ।
सततं जगतीविहितं हि ततो गदितं खलु तोटकवृत्तमिदम् ॥
६. बहुगण्डमिके—क०; ख०; बहुगर्जमिवोद्रण—ग०।
७. कृतम्, पथम्—क०।
८. सुजन ( स्वजन—ग० ) प्रियदुर्जनभेदकरं—ग०।

२३६ नाट्यशास्त्रम्
करते हों, कहते हुए, सचमुच किसी छेदक ( काटने वाले—तोटक ) का
आचरण कर रहे हो । ( इसमें सन्देह नहीं । ) ॥ ४३ ॥
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च पञ्चमं षष्ठमेव च ।
तथोपान्त्यं जगत्याञ्च गुरु चेत् कुमुदप्रभा ॥ ४४ ॥
कुमुदप्रभा—( कुमुदनिभा )—यदि बारह अक्षरों के पाद में पहला,
तीसरा, पांचवां, छठा, सातवां, नवाँ, ग्यारहवां ( उपान्त्य ) तथा बारहवां
अक्षर गुरु रहे तो 'कुमुदप्रभा ( निभा )¹' वृत्त होता है ॥ ४४ ॥
यथा—कुमुदनिभा त्वं कामबाणविद्धा
किमसि नतभ्रूः शीतवातदग्धा ।
²मृदुनलिनीवापाण्डुवक्त्रशोभा
कथमपि³ जाता ह्यग्रतः सखीनाम् ॥ ४५ ॥
हे नतभ्रू सुन्दरी, तुम कुमुद के पुष्प के समान कोमल होकर ( भी )
काम के बाण से कैसे बिध गई और तुम आज अपनी सखियों के सामने
पाले से जली नलिनी के समान अपने पीले मुंह से युक्त होकर क्यों आ
रही हो ॥ ४५ ॥
द्वादशाक्षरके पादे सप्तमं दशमं लघु ।
आदौ⁴ पञ्चाक्षरच्छेदश्चन्द्रलेखा तु सा यथा ॥ ४६ ॥
१. क—ग० पुस्तके कुमुदनिभाया लक्षणान्तरं सोदाहरणं यथा—
यदि खलु पादे यौ त्रिकौ तथान्त्यो षड्भिरेव वर्णैर्यदि च यतिः स्यात् ।
नित्य सन्निविष्टा जगति विधाने कुमुदनिभा सा नामतः प्रसिद्धा ॥
यथा—मन्मथेन विद्धा सललितभावा नृत्तगीतयोगा प्रविकसिताक्षी ।
निन्द्यमद्य किं त्वं विगलितशोभा चन्द्रपाद्युक्ता कुमुदवती च ॥
मतान्तरे तु—
यदि खलु पादे न्यो त्रिकौ तथा यौ
यतिरपि वर्णैः षड्भिरेव चेत् स्यात् ।
जगति विधाने नित्यसन्निविष्टा
कुमुदनिभा सा नामतः प्रसिद्धा ॥ इति लक्षणं लक्ष्यञ्च ।
२. नलिनीव पाण्डु—ग० । ३. कथमसि—ग० ।
४. यत्रान्यानि च दीर्घाणि—क० ।

॥(Wait, verse number is ४८:॥ ४८ ॥`)

  • प्रमिताक्षरा—बारह अक्षरों के पाद में यदि तृतीय, पंचम, नवम तथा
  • अन्तिम अक्षर गुरु हो तो प्रमिताक्षरा वृत्त होता है ॥ ४८ ॥
  • Laghu/guru line: - - - ◡ ◡ - - - - - - ◡
  • यथा—स्मितभाषिणी⁵ ह्यचपला परुषा
  • ⁶निभृतापवादविमुखी सततम् ।
  • ⁷अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति सुखा
  • प्रमिताक्षरा स हि पुमान् जयति⁸ ॥ ४९ ॥
  • यदि किसी की युवती भार्या स्मितपूर्वक भाषण करने वाली हो,
  • अचंचला तथा मृदुहृदया हो, एकान्त में भी कठोर शब्दों या निन्दाव्यंजक
  • शब्दों से विलग रहती हो तो हे मित्र, वही पुरुष भाग्यशाली या विजयी
  • है । उस पुरुष की ही जय हो ॥ ४९ ॥
  • Separator line
  • Footnotes 1 to 8.

Everything is completely accurate and faithful to the printed page.षोडशोऽध्यायः २३७
चन्द्रलेखा—यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां तथा दसवां वर्ण
लघु ( तथा शेष गुरु हो ) तथा पांच अक्षरों

२३८ नाट्यशास्त्रम्
द्वितीयमन्त्यं दशमं चतुर्थं पञ्चमाष्टमे।
गुरूणि द्वादशे पादे वंशस्था जगती¹ तु सा ॥ ५० ॥
वंशस्थ—यदि द्वादशाक्षर पाद में दूसरा, चौथा, पांचवां, आठवां, दसवां
तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तो 'वंशस्थ' वृत्त होता है ॥ ५० ॥
⏑ – ⏑ – – ⏑ ⏑ – ⏑ – ⏑ –
यथा—न मे प्रिया² त्वं बहुमानवर्जिता
कृता³ प्रिये ते परुषातिभाषणैः।
तथा च पश्याम्यहमद्य विग्रहं⁴
⁶ध्रुवं हि वंशस्थगतिं⁵ करिष्यति ॥ ५१ ॥
तुम मुझे (अब) अतिशय प्रिय नहीं हो, तुम्हारे कठोर वचनों ने मुझे
अप्रसन्न कर दिया। इस प्रकार मैं देखता हूं कि तुम्हारी स्वाभाविक या
वंशानुकूल (वंशस्थ) वृत्ति निश्चय ही आज युद्ध को खड़ा कर देगी ॥ ५१ ॥
चतुर्थमन्त्यं दशमं सप्तमञ्च यदा गुरु।
भवेद्धि⁸ जगते पादे ⁷तदा स्याद्धरिणप्लुता ॥ ५२ ॥
हरिणप्लुता—यदि द्वादशाक्षर पाद में चतुर्थ, सप्तम, दशम तथा अन्तिम
अक्षर गुरु हो तो हरिणप्लुता वृत्त होता है ॥ ५२ ॥
⏑ ⏑ ⏑ – ⏑ ⏑ – ⏑ ⏑ – ⏑ –
यथा—परुषवाक्यकशाभिहता⁹ त्वया
¹⁰भयविलोकनपार्श्वनिरीक्षणैः।
१. पिंगल० तथा वृत्तरत्ना० में भरतोक्त हरिणप्लुता को 'द्रुत-विलम्बित'
कहा गया है ।
१. गदिता तु सा—क० । जगतीलक्षणं क—पुस्तके त्वेवं पठ्यते—
यदि त्रिकौ ज्तौ भवतस्तु पादत-
स्तथैव च ज्नाववसानसंस्थितौ (संज्ञितो—ग०) ।
तदा हि वृत्तं जगतीप्रतिष्ठितं
वदन्ति वंशस्थमितीह नामतः ॥ इति ।
२. प्रियं यद्बहुमान—क० । ३. प्रियं प्रिया ते परुषाभिभाषिणी—क० ।
४. विक्रमं—ग० । ५. क्षणेन—क० ।
६. इदं करिष्यति—क० । ७. यस्यास्तु—क० ।
८. सा ज्ञेया हरिण—क० । ९. कथा—क० ।
१०. भयनिरीक्षणपार्श्वंविलोकनैः—क०; भयविलोकनपार्श्वनिरीक्षणा—ख० ।

षोडशोऽध्यायः २३९
वरतनुः प्रततप्लुतसर्पणै-
१रनुकरोति गतैर्हरिणप्लुतम् ॥ ५३ ॥
वह सुन्दरी (वरतनु), कठोरवचनरूपी कशा से पिट कर, भय से
दोनों बगलों को देखते हुए तथा सतत चौकड़ी मार चाल से भागने के
कारण हरिण की गति का अनुकरण कर रही है ॥ ५३ ॥
सप्तमं नवमं २चान्त्यमुपान्त्यञ्च यदा गुरु ।
द्वादशाक्षरके पादे कामदत्तेति३ सा यथा४ ॥ ५४ ॥
कामदत्ता—यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां, नवाँ, ग्यारहवां तथा
अन्तिम वर्ण गुरु हो तो कामदत्ता वृत्त होता है ॥ ५४ ॥
यथा—करजपदविभूषिता यथा त्वं
सुदति५ दशनविक्षताधरा च।
गतिरपि ६चरणावलग्नमन्दा
त्वमसि७ मृगनिभाक्षि८ कामदत्ता९ ॥ ५५ ॥
सुन्दरि, तुम जिस प्रकार इन नखक्षतों से अलंकृत हो तथा तुम्हारा
अधर दन्तक्षत से युक्त एवं तुम्हारी लड़खड़ाती और मन्द गति है । इसे
देखकर ऐसा लगता है कि हे प्रिये, तुम प्रेम (काम) के लिये ही प्रदान की
गई हो ॥ ५५ ॥
आद्यं चतुर्थं दशमं सप्तमञ्च यदा१० लघु ।
पादे११ तु जागते यस्या अप्रमेया तु१२ सा स्मृता ॥ ५६ ॥
अप्रमेया—यदि बारह अक्षरों के पाद में पहिला, चौथा, सातवां, तथा
दसवां वर्ण लघु हो तो अप्रमेया१ वृत्त होता है ॥ ५६ ॥
१. अप्रमेया को पिंगल तथा अन्य ग्रन्थों ने 'भुजङ्गप्रयात' माना है ।
१. प्रकुरुते प्रगतं हरिणप्लुता—क० ।
२. चैव ह्यान्त्योपान्त्ये गुरूण्यथ । यत्र स्युर्जगते पादे—क० ।
३. काममत्तेति—ख०, ग० । ४. मता—क० । ५. सुतनु—क० ।
६ चरणारविन्दमन्दा—ख०; सन्नमन्दा—ग० । ७. तदसि—क० ।
८. समाक्षि—क० । ९. काममत्ता—ख०; ग० ।
१०. लघून्यथ—क० । ११. द्वादशाक्षरके पादे—ख० ।
१२. तथाहि सा—ग० ।

२४० नाट्यशास्त्रम्
यथा—न ते काचिदन्या समा दृश्यते स्त्री
१नृलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीयैः ।
त्रिलोक्यां गुणाग्र्यान् समाहृत्य सर्वान्
जगत्यप्रमेयासि दृष्टा२ विधात्रा ॥ ५७ ॥
इस मर्त्य लोक में तुम्हारे जैसी दूसरी स्त्री नहीं दिखाई देती। अपने
असामान्य गुणों से तुम अप्रतिम हो अतएव विधाता ने तीनों भुवनो के सभी
श्रेष्ठ गुणों को एकत्र कर तुम्हें बनाया है ऐसा दिखाई देता है ॥ ५७ ॥
द्वितीयं पञ्चमञ्चैव ३ह्यष्टमैकादशे तथा।
पादे यत्र लघूनि स्युः पद्मिनी नाम सा यथा४ ॥ ५८ ॥
पद्मिनी—यदि बारह अक्षर के पाद में द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एका-
दशवां वर्ण लघु हो तो पद्मिनी१ वृत्त होता है ॥ ५८ ॥
यथा—देहत्तोयाशया वक्त्रपद्मोज्वला
नेत्रभृङ्गाकुला दन्तहंसस्मिता५।
केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी
पद्मिनीव प्रिये भासि मे सर्वदा६ ॥ ५९ ॥
हे प्रिये, तुम मुझे सदा पद्मसर जैसी दिखाई देती हो। क्योंकि तुम्हारा
शरीर जलाशय, तुम्हारा मुख कमल, तुम्हारे नेत्र आकुल भंवरे, तुम्हारी
सस्मित दन्तपंक्ति हंस, तुम्हारे केश कमल पत्र तथा तुम्हारे उरोज
चक्रवाक हैं ॥ ५९ ॥
१. पद्मिनी को पिंगल ने 'स्रग्विणी' कहा है ।
१. गुणैर्य्याद्वितीया तृतीयापि चास्मिन् । ममेयं मतिर्लोकमालोक्य सर्वं—
ख०; ग० । २. सृष्टा—ख०; ग० । ३. अष्टमैकादशं तथा —ख० ।
४. क-पुस्तकस्थमस्यैव लक्षणान्तरमेवम्—
रास्त्रिकाः सागराख्या निविष्टा यदा ( यदि—ख० )
स्यात् त्रिके च त्रिके युक्तरूपा यतिः ।
सन्निविष्टा जगत्या ( जगत्यां—ग० ) स्ततः सा बुधै
र्नामतश्चापि सङ्गीत्यंते पद्मिनी ॥
५. हंसैः सिता—क० । ६. उदाहरणान्तरमपि क—पुस्तके लभ्यते ।
तद्यथा--फुल्लपद्मानना त्वं द्विरेफेक्षणा केशपत्रच्छदा चक्रवाकस्तनी ।
पीततोयावली बद्धकाञ्चीगुणा पद्मिनीव प्रिये भासि नीरे स्थिता ॥ इति ।