नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ नाट्यशास्त्रम्
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, त्रिष्टुप् तथा जगती दिव्यश्रेणी
के अन्तर्गत आते हैं ॥ ९९ ॥
तथातिजगती चैव शक्करी ह्यतिशक्करी।
अष्टिरत्यष्टिरपि च धृतिश्चातिधृतिर्गणः ॥ १०० ॥
अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अत्यष्टि, धृति तथा अतिधृति
द्वितीय (दिव्येतर) श्रेणी में समाविष्ट किये जाते हैं ॥ १०० ॥
कृतिश्च प्रकृतिश्चैव ह्याकृतिर्विकृतिस्तथा।
सङ्कृत्यभिकृतीश्चैव ह्युत्कृतिर्दिव्यमानुषः ॥ १०१ ॥
कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अभिकृति तथा उत्कृति—
दिव्यमानुष श्रेणी के होते हैं ॥ १०१ ॥
इति छन्दांसि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः।
वृत्तान्येतेषु नाट्येडस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १०२ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वाचिकाभिनये
छन्दोविधानं नाम पञ्चदशोऽध्यायः।
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हे ब्राह्मणो, यहाँ मैंने छन्दोविधान बतलाया। अब उनका नाटकों में
व्यवहारार्थ लक्षण अगले अध्याय में बतलाया जायगा। आप इसे ध्यान
से सुनिये ॥ १०२ ॥
नाट्यशास्त्र का 'छन्दोविधान' नामक १५ वाँ अध्याय समाप्त
—>०<—
१. (१०१) यहाँ सत्रह श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं। ये प्रक्षिप्त (प्रतीत)
होने के कारण मूल पाठ में नहीं दिये गये। मूल सहित इन श्लोकों का अर्थ आगे
परिशिष्ट में दिया जा रहा है।
१. चातिशक्करी—ग०।
२. व्याकृति—ख०; ग०।
३. मानुषा—ख०; ग०।
४. छन्दांस्येतान्यथोक्तानि मयैवं तु द्विजोत्तमाः—क०।
५. चतुर्दशोऽध्यायः—क०; ख०।