नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
षोडशोऽध्यायः २४१
आदौ षड्दशमश्चैव पादे यत्र लघून्यथ ।
शेषाणि तु गुरूणि स्युर्जगते 'पुटसंज्ञिता ॥ ६० ॥
पुटवृत्ता—यदि बारह अक्षरों के पाद में प्रथम छः तथा दसवां अक्षर
लघु तथा शेष गुरु हों तो 'पुटवृत्त' नामक वृत्त होता है ॥ ६० ॥
यथा—उपवनसलिलानां बालपद्मै-२
भ्रमरपरभृतानां कण्ठनादैः ३।
४मदनमदविलासैः कामिनीनां
५कथयति पुटवृत्तं पुष्पमासः ॥ ६१ ॥
यह चैत्रमास ( अपने ) कमल कोरकों के जो सरोवररूप वन में हैं—तथा
भौरों की गुंजार, कोयल की कूक और मदमत्त कामिनिजन के लीलापूर्ण
विलासों के द्वारा युगलभाव (पुटवृत्तं) की छवि की कहानी कह रहा है ॥६१॥
द्वितीयान्त्ये चतुर्थश्च नवमैकादशे गुरू ।
६विच्छेदोऽतिजगत्यान्तु चतुर्भिः सा प्रभावती ॥ ६२ ॥
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२४२ नाट्यशास्त्रम्
सुन्दरि, तुम कमल के समान विशाल नेत्रों वाली हो, तुम (इस)
चन्द्रमा के बादलों से ढक जाने पर, अन्धेरी हो जाने वाली इस रात में
प्रारंभ होने वाली (अभिनव) वर्षा और बिजली की परवाह किये बिना और
प्रभावती (सूर्यपत्नी) के समान मेरे घर कैसे चली आई ? ॥ ६३ ॥
त्रीण्यादावष्टमञ्चैव दशमं नैधनद्वयम् ।
१गुरुण्यतिजगत्यां तु त्रिभिश्चेदैः प्रहर्षिणी ॥ ६४ ॥
प्रहर्षिणी—यदि तेरह अक्षरों के पाद में पहिले तीन, आंठवां,
दसवां, बारहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरू हो तो प्रहर्षिणी वृत्त होता है। इसमें
तीन स्थान पर यति रहती है ॥ ६४ ॥
यथा—भावस्थैर्मधुरकथैः२ सुभाषितैस्त्वं
साटोपस्खलितविलम्बितैर्गतैश्च ।
३शोभाढ्यैर्हरसि मनांसि कामुकानां४
सुव्यक्तं हासि५ जगति प्रहर्षिणी६ च ॥ ६५ ॥
हे सुन्दरि, तुम प्रेमभाव से पूर्ण तथा मीठे शब्दों वाले सुभाषितों
के एवं लड़खड़ाने वाले मन्द मन्द पदसंचालन के द्वारा कामिजन के
चित्त हर लेती हो। इससे यही प्रकट होता है कि इस संसार में तुम
परम आह्लादक (प्रहर्षिणी) हो ॥ ६५ ॥
षष्ठञ्च सप्तमञ्चैव दशमैकादशे७ लघु ।
त्रयोदशाक्षरे पादे ज्ञेयं मत्तमयूरकम् ॥ ६६ ॥
मत्तमयूर—यदि तेरह अक्षरों के पाद में छठा, सातवां, दसवां तथा
ग्यारहवां अक्षर लघु हो तो 'मत्तमयूर' नामक वृत्त होता है ॥ ६६ ॥
यथा—विद्युन्नद्धाः ८सेन्द्रधनूरजितदेहा
वातोद्भूताः श्वेतबलाकाकृतशोभाः९ ।
१. गुरूणि पादे ह्यत्रैव यस्याः सा वै प्रहर्षिणी—क० ।
२. मधुरसकैः, मधुरतरैः—क० । ३. नानाङ्गै—ख०; ग० ।
४. मानवानां—क० । ५. ह्यतिजगती—क० ।
६. प्रहर्षिणीव—ख०; ग० ।
७. दशे तथा । लघूनि यस्य पादे तु गच्छेन्मत्तमयूरताम्—क० ।
८. सेन्द्रधनुद्योतितदेहा—ख०; ग० ।
९. कृतचिह्नाः—क० ।
गुरूण्यसम्बोध नाम्ना ज्ञेया तु सा बुधैः ॥—क० ।-> wait, we checkedगुरूण्यसम्बोधा`.
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Total lines:
षोडशोऽध्यायः २४३
एते मेघा ¹गर्जितनादोज्ज्वलचिह्नाः
प्रावृट्कालं मत्तमयूरं² कथयन्ति ॥ ६७ ॥
ये बादल—जो कड़क और चमक के प्रकट चिन्हों से बिजली और इन्द्र
धनुष से युक्त होकर, वायु से संचालित और सफेद बगुलों की कतार से
शोभित होकर बरसात की सूचना मदमत्तमयूरों को दे रहे हैं ॥ ६७ ॥
आदौ द्वे च चतुर्थश्चाप्यष्टमैकादशे गुरु ।
अन्त्योपान्त्ये च शक्वर्य्यां वसन्ततिलका यथा³ ॥ ६८ ॥
वसन्ततिलका—यदि चौदह अक्षरों के पाद में पहिले दो, चौथा,
आठवां, ग्यारहवां, तेरहवां, ( उपान्त्य ) तथा अन्तिम अक्षर गुरु हो तो
'वसन्ततिलका' वृत्त होता है ॥ ६८ ॥
– – ᴗ – ᴗ
२४४ नाट्यशास्त्रम्
तीन अक्षर गुरू हों तथा पांच अक्षरों पर यति हो तो ‘असम्बाधा’ नामक
वृत्त होता है ॥ ७० ॥
यथा—मानी लोकज्ञः श्रुतबलकुलशीलाढ्यो
यस्मिन् १सम्मानं न सदृशमनु पश्येद्धि२ ।
गच्छेत्तं त्यक्त्वा तं ३द्रुतगतिरपरं देशं
कीर्णा नानार्थैरवनिरियमसम्बाधा ॥ ७१ ॥
वह आत्मसम्मान रखने वाला पुरुष—जो संसार को जानता हो
(लोकज्ञ), विद्वान्, बलवान्, कुलवान तथा चरित्रवान् हो। उसे जहां उचित
सम्मान प्राप्त न हो वहां नहीं रहना चाहिए। वह वहां से तुरन्त दूसरे
(उचित) प्रदेश के लिए प्रस्थान करे, क्योंकि अनेक अर्थों से पूर्ण पृथ्वी
उसके लिए कहीं भी बाधा न देगी ॥ ७१ ॥
४चत्वार्यादौ गुरूणि स्युर्दशमैकादशे तथा ।
अन्त्योपान्त्ये च शकर्याः पादे तु शरभा यथा ॥ ७२ ॥
शरभा—यदि चौदह अक्षरों के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां,
तेरहवाँ तथा चौदहवां वर्ण गुरू होतो ‘शरभा’ नामक वृत्त होता है ॥ ७२ ॥
यथा—एषा कान्ता व्रजति ललितं वेपमाना
५गुल्मैश्छन्नं वनमभिनवैः सम्प्रवृद्धम् ।
६हा हा कष्टं किमिदमिति नो वेद्मि मूढो
व्यक्तं ७कान्ते शरभललिता त्वं करोषि ॥ ७३ ॥
यह ललना ललितगति से झूमती हुई (वेपमाना) जा रही है उस
वन में जो विशाल पर्वतों तथा लतागुल्मों से आवेष्टित है । हाय, बड़े दुःख
की बात है कि मैं मूर्ख ही रहा और इतना भी न समझ पाया कि प्रिये तुम
क्रोध में आकर हाथी के बच्चे की चेष्टाएं (शरभललिता) करने पर उतारू
(हो गई) हो ॥ ७३ ॥
१. सामान्यं—क० ।
२ पश्येत—क० ।
३. द्रुतगति—ख०; ग० ।
४. आदौ चतुर्गुरूणि—क० ।
५. गुल्मच्छन्नं वनमुरुनगैः सम्प्रवृद्धम्—क० ।
६. आहो कष्टं किमिदमिति संविग्नचेष्टा—क० ।
७. क्रोधाच्छरभललितं कर्तुकामा, क्रोधाच्छरभललितं हर्तुकामा—क० ।
:
It has a curve on left, horizontal bar, vertical line, and mātrā on top:
Wait! It's औ!
Look at the letter: औ has अ on the left, ा on the right, and two mātrās ौ on top: औ.
Wait, why would it say औ यदि नौ च?
Wait, in meter definitions:
Could it be भौ यदि नौ च?
Wait, look at भौ in भौंहों:
In भौंहों, the letter भ has a loop at top left.
In , does the first letter have a loop at top left?
No, it looks like औ!
Wait, but could it be भौ?
Wait, if it's भौ यदि नौ च, what does that mean?
"भौ" = two Bha-ganas? No, Bha-gana is singular 'भः', dual 'भौ'.
Wait, two Bha-ganas: भौ!
Two Na-ganas: नौ!
Let's check the syllables:
Two Bha-ganas = 2 × 3 = 6 syllables (- u u, - u u).
Two Na-ganas = 2 × 3 = 6 syllables (u u u, u u u).
Total 12 syllables.
Then:
"गश्च तथा च वै भवति निधन
२४६ नाट्यशास्त्रम्
यथा—तोयधरैः सुधीरघनपटुपटहरवैः¹
सर्जकदम्बनीपकुटजकुसुमसुरभिः ।
कन्दलसेन्द्रगोपकरचितमवनितलं
वीक्ष्य करोत्यसौ वृषभगजविलसितकम्² ॥ ७७ ॥
पृथ्वी को भुईं-केलिया ( कन्दली ) तथा इन्द्रकीट ( इन्द्रगोप ) से
युक्त देखते हुए—जो कि सर्ज, कदम्ब, नीप एवं कुटज के सुमनों से सुवासित
है और जो घन की गंभीर ध्वनि से पटुता से बजाए गए गम्भीर मृदंग के
समान ( जो ) लगती है, प्रकट होने पर—क्रीडा करने वाले हाथी के समान
यह व्यक्ति ( भी ) चेष्टाएं ( विलास ) करने लगा है ॥ ७७ ॥
आद्यात् पराणि वै पञ्च द्वादशं सत्रयोदशम् ।
³अन्त्योपान्त्ये च दीर्घाणि ललितप्रवरं हि तत्⁴ ॥ ७८ ॥
प्रवरललिता—यदि सोलह अक्षरों के पाद में प्रारम्भ के ( दो से ) पांच,
बारहवां, तथा तेरहवां, प
लग रहा है। ओह ! हो आश्चर्य—प्रेम की यह कैसी महान् महिमा है कि
जिसने इस प्रशंसनीय प्रकार द्वारा अपना विशिष्ट स्थान बना रखा है ॥७९॥
आद्यात् पराणि पञ्चाथ द्वादशं सत्रयोदशम् ।
अन्त्यं सप्तदशे पादे शिखरिण्यां गुरूणि¹ च ॥ ८० ॥
शिखरिणी—यदि सत्रह अक्षरों के पाद में दूसरा, तीसरा, चौथा,
पांचवा, बारहवां, तेरहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू होता है तो 'शिखरिणी'
वृत्त होता है ॥ ८० ॥
⏑ – – – – ⏑ ⏑ ⏑ ⏑ ⏑ – – ⏑ ⏑ ⏑ ⏑ –
यथा—महानद्या भोगं² पुलिनमिव ते भाति जघनं
तथास्यं नेत्राभ्यां³ भ्रमरसहितं पङ्कजमिव ।
⁴तनुस्पर्शच्छाद्यं सुतनु सुकुमारो न परुषः
स्तनाभ्यां तुङ्गाभ्यां⁵ शिखरिणि-निभाभासि⁶ वनिते⁷ ॥८१॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी जंघाएं महानदी के पुलिन के समान (दीर्घ, शुभ्र )
हैं तथा नेत्रों सहित तुम्हारा मुंह भ्रमर युक्त कमल जैसा है, तुम्हारे शरीर
का स्पर्श कोमल है, कठोर नहीं और हे प्रिये, तुम अपने उन्नत उरोजों से
एक पहाड़ी (शिखरिणी) जैसी शोभित हो रही हो ॥ ८१ ॥
यत्र पञ्च लघुन्यादौ त्रयोदशचतुर्दशे ।
षोडशैकादशे चैव तत् स्याद् वृषभचेष्टितम् ॥ ८२ ॥
१. लक्षणमिदं क-पु० त्वेवं पठ्यते—
चतुर्भिस्तस्यैव प्रवरललितस्य त्रिकगणै-
र्यदा लो गश्चान्ते भवति चरणेऽत्यष्टिगदिते ।
यदा षड्भिश्छेदो भवति यतिमार्गे विरचित—(यदि मार्गैविहित—क०)
स्तदा वृत्तेष्वेषा खलु शिखरिणी नाम गदिता ॥
२. भोगे—ख०, ग० । ३. नेत्राख्यं—ख० ।
४. गतिमंन्दा चेयं सुतनु तव चेष्टा सुललिता—क० ।
५. पीनाभ्यां—क० । ६. ममाभासि—क० ।
७. दयिते—ख०; ग० ।
८. लक्षणमिदं क—पुस्तकस्थमेवं लभ्यते—
यदि हि चरणे न्सौ म्रौ स्लो गः क्रमाद्विनिवेशिताः
यदि खलु यतिः षड्भिर्वणैस्तथा दशभिः पुनः ।
यदि च विहितं स्यादत्यष्टिप्रयोगसुखाश्रयं
वृषभललितं वृत्तं ज्ञेयं तथा हरिणीति वा ॥—क० ।
२४८ नाट्यशास्त्रम्
वृषभचेष्टित—यदि सत्रह अक्षरों के पाद में आदि के पांच, ग्यारहवां,
तेरहवां, चौदहवां, तथा सत्रहवां अक्षर लघु हो तो उसे 'वृषभचेष्टित' वृत्त
कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—जलधररवं¹ श्रुत्वा श्रुत्वा² मदोच्छ्रयदर्पितो
विलिखति महीं ³शृङ्गाक्षेपैर्वृषः प्रतिनर्च च ।
स्वयुवतिवृत्तो गोष्ठाद् गोष्ठं प्रयाति च निर्भयो
वृषभललितं चित्रं वृत्तं करोति च शाद्वले ॥ ८३ ॥
( यह ) वृषभ मेघों की गर्जना को सुनकर एवं अहंकार से पूर्ण होकर
मदमत्त हो गया है और अपने सींगों से पृथ्वी को खोदकर गर्जन के उत्तर में
डकारता है। अपनी सजातीय ( अनुगामिनी ) गौओं के साथ एक गोष्ठ से
दूसरे गोष्ठ में निर्भय होकर विचरता है तथा हरे घास पर विभिन्न अचरज
भरी क्रीडाओं को कर रहा है ॥ ८३ ॥
चत्वार्यादौ च दशमं गुरुं⁴ यत्र त्रयोदशम् ।
चतुर्दशं तथान्त्ये⁵ द्वे चैकादशमथापि च ॥ ८४ ॥
यदा सप्तदशे पादे शेषाणि च लघून्यथ ।
भवन्ति यस्मिन्⁶ सा ज्ञेया श्रीधरा नामतो यथा⁷ ॥ ८५ ॥
श्रीधरा—यदि सत्रह अक्षर के पाद में आदि के चार, दसवां, ग्यारहवां,
तेरहवां, चौदहवां तथा अन्तिमवर्ण गुरु हो तो 'श्रीधरा'² नामक वृत्त
होता है ॥ ८४-८५ ॥
१. वृषभचेष्टित को पिंगलाचार्य ने 'हरिणी' माना है।
२. 'श्रीधरा' का ही पिङ्गलादिसम्मत नाम 'मन्दाक्रान्ता' है ।
१. जलदनिनदं—ग० ।
२. गर्जन्मदोच्चयदर्पितो—ग० ।
३. दर्पाच्छृङ्गैर्मृगंः प्रतिनन्द्य च—क० ।
४. गुरूण्यथ—ख० ।
५. तथा पञ्च एकादश—ख० । ६. यत्र—क० ।
७. लक्षणमिदं—क—ग—पुस्तकस्थमेवम्—
मो श्रौ च स्युश्चरणरचितास्तो गरू च प्रविष्टा—( गश्च गोन्त्यप्रतिष्ठ—ग० )
श्छेदः श्लिष्टो (इचेष्टो—ग०) यदि च दशभिः स्यात्तथान्यै (द्यै—ग०) श्चतुर्भिः ।
अत्यष्टौ च प्रतिनियमिता वर्णतः स्पष्टरूपा
सा विज्ञेया द्विजमुनिगणैः श्रीधरा नामतस्तु ॥—( क०; ग० )
षोडशोऽध्यायः २४९
यथा— स्नानैश्चूर्णैः सुखसुरभिभिर्गन्धवासैश्च धूपैः¹
पुष्पैश्चान्यैः² शिरसि रचितैर्वस्त्रयोगैश्च तैस्तैः ।
नाना रत्नैः³ कनकखचितैरङ्गसम्भोगसंस्थै-
र्व्यक्तं कान्ते कमलनिलया ⁴श्रीधरेवातिभासि ॥८६॥
हे प्रिये, (कान्ते) तुम अपने स्नान, चूर्ण, लेपन, आनन्ददायी सुवास
के द्वारा (जो शरीर (कपोल से आशय है) पर लगाई गई है) (इसी प्रकार
तुम्हारे) केशों में स्थित सुगन्धित पुष्पों तथा विविध धूप गन्धों के द्वारा
और अपने शरीर पर धारण किये हुए अनेक रत्नजटित सुवर्णालंकारों के द्वारा
तुम सचमुच कमल में निवास करने वाली सुन्दरता की देवी श्री (लक्ष्मी)
सी लग रहो ॥ ८६ ॥
आद्यं चतुर्थं षष्ठञ्च दशमं नैधनं गुरु ।
⁵तद्वंशपत्रपतितं दशभिः सप्तभिर्यतिः ॥ ८७ ॥
यदि प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, दशम तथा अन्तिम वर्ण गुरु हो तथा दस
और सात अक्षरों पर क्रमशः यति हो तो उसे 'वंशपत्रपतित' वृत्त समझना
चाहिये ॥ ८७ ॥
यथा—एष गजोऽद्रिमस्तकतटे ⁶कलभपरिवृतः
क्रीडति वृक्षगुल्मगहने कुसुमभरनते ।
मेघरवं निशम्य मुदितः ⁷पवनजवसमः
सुन्दरि वंशपत्रपतितं पुनरपि कुरुते ॥ ८८ ॥
हे सुन्दरि, यह हाथी कुछ छोटे-छोटे हस्तिशावकों से घिरकर वृक्ष तथा
लताओं से घने और पुष्पों के भार से नमने वाले पर्वत के शिखर पर क्रीड़ा
कर रहा है। अब यह मेघ के गर्जन को सुन हर्षविभोर हो यह फिर वायु
के वेग से बाँस के वृक्षों के पत्तों को पृथ्वी पर गिराने लगा है ॥ ८८ ॥
द्वितीयमन्त्यं षष्ठं चाप्यष्टमं द्वादशं तथा।
चतुर्दशं पञ्चदशं पादे सप्तदशाक्षरे ॥ ८९ ॥
१. गन्धवाहैः सधूपैः—क.; गन्धसारैश्च धूपैः—ख.; गण्डलेपैः सुधूपैः—ग०।
२. पुष्पैर्माल्यै—ख०।
३. कनकरचितै—ग०।
४. श्रीधरेवावभासि—क०, श्रीधरा त्वं विभासि—ख०।
५. यत्र सप्तदशे पादे वंशपत्राह्वयं तु तत्—क०।
६. युवति-परिवृतः—क०। ७. पवनजववशात्—ग०।
२५० नाट्यशास्त्रम्
भवन्ति यत्र दीर्घाणि शेषाणि च लघून्यथ ।
विलम्बितगतिः सा१ तु विज्ञेया नामतो यथा२ ॥ ९० ॥
विलम्बितगति—यदि सत्रह अक्षरों के पाद में दूसरा, छठा, आठवां,
बारहवां, चौदहवां तथा पन्द्रहवां अक्षर गुरु हो तो उसे "विलम्बितगति"
नामक वृत्त कहते हैं ॥ ८९-९० ॥
यथा—विघूर्णितविलोचना ३पृथुविकीर्णहारा पुनः
प्रलम्बरशना४ चलत्स्खलितपादमन्दक्रमा५ ।
६न मे प्रियमिदं जनस्य बहुमानरागेण य-७
न्मदेन८ विवशा विलम्बितगतिः कृता त्वं प्रिये ॥ ९१ ॥
हे प्रिये, तुम्हारी आँखें खुमारी के कारण घूम रही है, (स्वर्ण का)
बड़ा हार अपने स्थान से खिसक गया है। तुम्हारी करधनी शिथिल हो
जाने के कारण लटकने लगी है और तुम्हारे धीरे-धीरे रखे जाने वाले पग
लड़खड़ा रहे हैं। मैं इस तुम्हारी मन्दगति को खूब पसन्द कर रहा हूँ। जो
तुमने इस जन के प्रेम में मदहोश होकर (विवशा) आदर करने के लिये
धारण की है ॥ ९१ ॥
पञ्चादौ पञ्चदशकं ९द्वादशैकादशे गुरु१० ।
चतुर्दशं ११तथान्त्ये द्वे चित्रलेखा१२ धृतौ स्मृता ॥ ९२ ॥
१. विलम्बित गति का पिंगलोक्त नाम 'पृथ्वी' है।
१. तत्र—क० ।
२. लक्षणमिदं क—ग पुस्तकस्थं स्वेवम्—
यदा द्विरुदितौ हि पादमभिसंश्रितौ ज्भौ त्रिकौ
तथैव च पुनस्तयोर्निधनमाश्रितो यो लगौ । (य्लो सगौ—ग०)
तदाष्टिरिति पूर्विका यतिरपि स्वभावाद् यथा ।
विलम्बितगतिस्तथा निगदिता द्विजैर्नामतः ॥
३. प्रस्रुतहारमालाधरा—क०; पृथुविघूर्णहारा—ग० ।
४. वसना—क० ।
५. चलत्स्खलितगात्रपादक्रमा—क० । स्खलल्ललितपाद-मन्दक्रमा—ख० ।
६. न मे प्रियमसज्जनेति—क० । ७. ते—क० ।
८. मदेन तु विलम्बितागतिकृता कदाचित् प्रिये—क० ।
९. द्वादशं सानुगं गुरु—ख० । १०. धृतो—क० ।
११. तथा पञ्च—ख० । १२. चित्रमाला गुरूणि तु—क० ।
? Look at the letter: मwith halanta, thenसो? Wait, look at: मसौ जसौ तौ`?
Pingala / traditional:
"सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्"
Here the verse says:
"म... जसौ तौ गुरु च प्रयोगनियता यस्मिन्प्रविष्टास्त्रिका"
If it has 6 trikas (18 syllables) + 1 guru = 19 syllables!
The trikas are:
- म
- स
- ज
- स
- त
- त
Then गुरु च = 19!
Wait, in dvandva compound:
म and स -> मसौ (dual)!
ज and स -> जसौ (dual)!
त and त -> तौ (dual)!
"गुरु च" -> 1 guru!
So:
"मसौ जसौ तौ गुरु च"!!
Wait, look at the first word:
Is it "मसौ" or "म्सौ" or "म्सो"?
Wait, look at the letter:
It'sमthenसौ? Wait, why does the first word look likeम्सोorमसौ?
Wait, look at the top:
There is aम, thenसwithौ:
Wait, theमhas no right stem? It's half-ma
२५२ नाट्यशास्त्रम्
आठवां, बारहवां, तेरहवां, चौदहवां, सोलहवां, सत्रहवां तथा अन्तिमवर्ण
गुरू हो तो 'शार्दूलविक्रीडित' वृत्त होता है ॥ ९४-९५ ॥
यथा—नानाशस्त्रशताग्नितोमरहताः प्रभ्रष्टसर्वायुधाः
निर्भिन्नोदरपादबाहुवदना¹ निर्णाशिताः² शत्रवः ।
धैर्योत्साहपराक्रमप्रभृतिभिस्तैस्तैर्विचित्रैर्गुणै
वृत्तं ते रिपुघाति भाति³ समरे शार्दूलविक्रीडितम्⁴ ॥ ९६॥
तुम्हारे शत्रुगणों में अनेक शस्त्र, तोप, तोमर आदि से आहत हों अपने
सारे शस्त्रों को छोड़ते हुए समाप्त हो गए और इनमें से कुछ शत्रुओं के पेट,
पैर, भुजा तथा मस्तक फट जाने से वे भी नष्ट हो गए हैं और उनने अपने
शस्त्रों को फेंक दिये हैं इस प्रकार हे राजन् धैर्य, पराक्रम, उत्साह आदि
तुम्हारे आश्चर्यकारी गुणों के कारण युद्ध में शत्रुओं को नाश करने का
आपका यह कार्य सिंह की क्रीड़ा के समान शोभित होने लगा है ॥ ९६ ॥
चत्वार्यादौ च षष्ठञ्च सप्तमं स चतुर्दशम् ।
तथा पञ्चदशञ्चैव षोडशं नैधनं तथा ॥ ९७ ॥
एतानि च गुरूणि स्युः शेषाणि तु लघून्यथ ।
पादे यत्र⁵ कृतौ ज्ञेया नाम्ना सुवदना तु⁶ सा ॥ ९८ ॥
सुवदना—यदि बीस अक्षरों के पाद में पहिले चार, छठा, सातवां,
१. वक्त्रवदना—क; हस्तवदनाः—ख; वक्त्रनयनाः—ग० ।
२. निर्वासिता—ख; निर्भर्त्सिता—ग० । ३. लाति—ख० ।
४. क—पुस्तके शार्दूलविक्रीडितस्योदाहरणान्तरमपि लभ्यते । तद्यथा—
तावत्त्वं विजितेन्द्रियः शुभमते सर्वात्मना प्रत्यहं
दाने शीलविधौ च योजय मनः स्वर्गापवर्गप्रदम् ।
यावद्व्याधिजराप्रचण्डनखरो व्यायत्सटाभिर्भृशं
मृत्युस्ते न करोति जीवितमृगैः शार्दूलविक्रीडितम् ॥
५. यत्र तु सा ज्ञेया—क० ।
६. यथा—क० । क—पुस्तके सुवदनाया लक्षणान्तरं त्वेवं पठद्यते—
म्नौ भ्नौ ग्यो ल्गौ च सम्यग्यदि च विरचिता पादे क्रमवशात्
विच्छेदः सप्तभिः स्यात् पुनरपि च यतिः सप्ताक्षरकृता ।
यद्येषा संश्रिता स्यात् कृतिमपि च पुनः श्लिष्टाक्षरपदा
विद्वद्भिर्वृत्तजातौ तत इह गदिता नाम्ना सुवदना ॥
षोडशोऽध्यायः २५३
चौदहवां, पन्द्रहवां, सोलहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो 'सुवदना'
नामक वृत्त होता है ॥ ९७-९८ ॥
– – – – – – – – ˘ ˘ ˘ ˘ ˘ – – – ˘ ˘ –
यथा—नेत्रे लीलालालसान्ते कमलदलनिभे भ्रूचाप१ रुचिरे
गण्डोष्ठं पीनमध्यं समसहितघनाः२ स्निग्धाश्च दशनाः ।
३कर्णावंसप्रलम्बौ चिबुकमपि ४नतं घोणा सुरुचिरा
५व्यक्तं त्वं मर्त्यलोके वरतनु ६विहितास्येका सुवदना ॥९९॥
हे सुन्दरि, तुम्हारी आंखें कमल दल के समान हैं जिसके साथ भौंहें
धनुष के समान सुन्दर दिखाई दे रही हैं, आंखों की नोकें लीलापूर्ण और
अलस दिखाई दे रही हैं, तुम्हारे ओठ और कपोल अपने मध्य भाग में भरे
हुए, दांतों की पांत चमकीली समान और घनी है, कान तथा कन्धे झुके
हुए (झूलते हुए) हैं, ठुड्डी झुकी हुई और नासिका अत्यन्त सुन्दर दिखाई
दे रही है । हे सुगात्रि, इस मनुष्यलोक में तुम ही एक ऐसी सुन्दरी हो जिसे
इतने शोभन स्वरूप में बनाया गया है ॥ ९९ ॥
चत्वार्यादौ तथा षष्ठं सप्तमञ्च चतुर्दशम् ।
अष्टादशं सप्तदशं तथा पञ्चदशं पुनः ॥ १०० ॥
७अन्त्योपान्त्ये गुरुण्यत्र लघून्यन्यानि सर्वदा ।
एकविंशतिके पादे स्रग्धरा नाम सा यथा ॥ १०१ ॥
स्रग्धरा—यदि इक्कीस अक्षरों के पाद में आदि के चार, छठा, सातवां,
चौदहवां, पन्द्रहवां, सत्रहवां, अठारहवां, बीसवां तथा अन्तिम वर्ण गुरु हों
तो 'स्रग्धरा' नामक वृत्त होता है ॥ १००-१०१ ॥
१. विनते—क०; निहिते—ख०; ग० । २. घनं—ख०; ग० ।
३. कर्णौ ह्रस्वप्रलम्बौ—क०; कर्णौ पार्श्वविलम्बौ—ख०; ग० ।
४. तटन्नता—क०; मपि नतो—ग० ।
५. सर्वस्वं—क०; सर्वस्मिन्—ख०; ग० ।
६. विदितास्येका—ख०; ग० ।
७. अन्त्यञ्च विंशकञ्चैव गुरुसंज्ञानि यत्र तु—क० ।
८. क—पुस्तके स्रग्धराया लक्षणन्त्वेवं पठ्यते—
म्रौ भ्नौ यौ यश्च सम्यग्यदि हि विरचिताः स्युस्त्रिकाः पादयोगे
वर्णैः पूर्वापदिष्टैर्यतिरपि च पुनः सप्तभिः सप्तभिः स्यात् ।
वृत्तं सम्यग्यदि स्यात् प्रकृतिमनुगतं तत्त्वविद्भिः प्रदिष्टं
विज्ञेयं वृत्तजातौ कविजनदयिता स्रग्धरा नामतस्तु ॥
२५४ नाट्यशास्त्रम्
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यथा—चूताशोकारविन्दैः कुरवकतिलकैः कर्णिकारैः शिरीषैः
पुन्नागैः पारिजातैर्बकुलकुवलयैः किंशुकैः सातिमुक्तैः।
एतैर्नानाप्रकारैः कुसुमसुरभिभिर्विप्रकीर्णैश्च तैस्तै-
र्वासन्तः पुष्पवृन्दैर्नरवर वसुधा स्रग्धरेवाद्य१ भाति ॥१०३॥
हे राजन्, इन वसन्त ऋतु में अनेक पुष्पों की मीठी तथा मोहक सुगन्ध
से—जो आम्र, अशोक, अरविन्द, कुरवक, तिलक, कर्णिकार, शिरीष, पुन्नाग,
पारिजात, वकुल, कुवलय, किंशुक तथा अतिमुक्त पुष्पों की है। यह पृथ्वी
ऐसी दिखाई देती है जैसे किसी अङ्गना ने पुष्पों की अनेक मालाएं पहिन
रखी हों ॥ १०३ ॥
चतुर्थमाद्यं षष्ठञ्च दशमं द्वादशन्तथा ।
षोडशाष्टादशे चैव नैधनञ्च गुरुण्यथ ॥ १०४ ॥
द्वाविंशत्यक्षरे पादे शेषाणि च लघून्यथ ।
भवन्ति यत्र तज्ज्ञेयं मद्रकं नामतो यथा२ ॥ १०५ ॥
मद्रक—यदि बाईस अक्षरों के पाद में पहिला, चौथा, छठा, दसवां,
बारहवां, सोलहवां, अठारहवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो ( और बाकी लघु
वर्ण हों ) तो 'मद्रक'-वृत्त कहलाता है ॥ १०४-१०५ ॥
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यथा—उत्प्लुतमेकहस्तचरणं३ द्वितीयकररचितं४ सुविनतं
वंशमृदङ्गवाद्यमधुरं विचित्रकरणानुगं५ बहुविधम्।
१. रेवावभाति—क० । २. मद्रकवृत्तस्य लक्षणान्तरमेवं क-पुस्तके—
.. ओ चरणे यदा विनियतौ त्रिकौ क्रमवशादथाकृतिविधौ
त्रौ च ततःपरञ्च रुचिरावनन्तरकृतौ नगावपि पुनः।
तच्च दशाष्टवर्णरचिता चतुष्वंपि तथा यतिश्च सततं
मद्रकवृत्तमेव खलु नाटययोगकुशलैर्बुधैर्निगदितम् ॥ तथा
काशी पुस्तकेऽस्य लक्षणस्य पाठस्त्वेवम्—
श्रौ चरणे यदा विनियतौ त्रिकौ क्रमवशादथाकृतिविधौ
नौ च ततः परश्च नियतौ तथा तदनु चार्पिता नरनगाः ।
स्याच्च दशाष्टवर्णरचिता यतिः पुनरिह प्रिया च विदुषां
श्रुतिसुखसमर्थसुभगं मद्रकवृत्तमेतदुदितं खलु ॥
३. उन्नतमेक—ख०, उद्यतमेक—ग० ।
४. कररेचकं सललितं—ख०; ग० । ५. करणान्वितं—ख०; गं० ।
लक्षणं क—पुस्तके यथा —
यदि च नकार आदि-रचितः पदे विरचितोऽन्त एव च लगौ
यदि च जभौ त्रिधा च निहितौ क्रमेण खलु मध्यमावपि तथा ।
यदि च समाश्रितं हि विकृति यतिश्च दशभिस्तथैकसहितै-
स्तत इह कीर्तितं मुनिगणैर्विशुद्धचरितैस्तदश्वललितम् ॥
९. रथहयनागयौधपुरुषैः सुसंकुलमलं समुदितशरा-
सनशरशक्तिकुन्तपरिघासियष्टिविवृतंबहुप्रकरणम् । क० ।
Wait, in L18: "यथा—'विविधतुरङ्गनागरथयौधसङ्कुलमलं बलं समुदितं" - is there a single quote before विविध?
Yes: "यथा—'विविध...".
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शरशतशक्तिकुन्तपरिघासियष्टिविततं बहुप्रहरणम् ।
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२५६ नाट्यशास्त्रम्
१रिपुशतमु कशस्त्ररवभीतशङ्कितभटं२ भयाकुलदिशं
कृतमभिवीक्ष्य संयुगमुखे ३समर्पितगुणं त्वयाश्वललितम्४ ॥१०९॥
इस पूर्णरूप से सुसज्जित अपनी सेना को देखते हुए जो अनेक घोड़े,
हाथी, रथ तथा पैदलों से भरी हुई है, इसमें अनगिनत बाण, शक्ति, भाले,
परिघा तथा तलवारे फैली हुई हैं, शत्रुओं के द्वारा चलाये गये शस्त्रों के
भयंकर शब्दों से (कुछ) पैदल सैनिक सबके भय के कारण सहम रहे हैं
और दिशाएं भी भय से व्याप्त हो रही हैं। ऐसे समय आपने अपने घोड़े
को युद्ध में आगे डाल कर जो एक क्रीडा मात्र प्रदर्शित की (अश्वललितं)
प्रजाजन के द्वारा आज भी आपका वह गुण बड़ा लोकप्रिय हो रहा है ॥१०९॥
षडादावष्टमञ्चैव ह्येकादशचतुर्दशे ।
विंशं सप्तदशञ्चैव त्रयोविंशं तथैव च ॥ ११० ॥
एतानि च लघूनि स्युः शेषाण्यथ गुरुणि च ।
चतुर्विंशतिके५ पादे मेघमालेति सा यथा ॥ १११ ॥
मेघमाला—यदि चौबीस अक्षरों के पाद में आदि के छः वर्ण, आठवां,
ग्यारहवां, चौदहवां, सत्रहवां, बीसवां और तेईसवां अक्षर लघु हो तथा शेष
वर्ण गुरु हों तो 'मेघमाला' वृत्त होता है ॥ ११०-१११ ॥
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यथा—पवनजवसमाइता६ तीव्रगम्भीरनादा७ बलाकावलीमेखला
क्षितिधरसदृशोच्चरूपा८ महानीलधूमाञ्जनाभाम्बुगर्भोद्भवा ।
१. वसुगणमस्य भिन्नहतशत्रुनाशितशिरः प्रमथ्य तरसा-क० ।
२. शस्त्ररवभिन्नशङ्कितभटं भयाकुलमिद- ख०; शङ्कित भटं भिन्नहतशत्रुनाशि
भयाकुलमिदं—ग० ।
३. समीप्सितगुणं- ख०; ग० ।
४. तदश्वललितम्-ग० । ५. चतुर्विंशाक्षरे-क० ।
६. मेघमाला लक्षणं क-पुस्तके यथा-
यदि खल चरणस्थितौ नो त्रिकौ कृत्तिकाख्यास्तथा राःपरं स्युः क्रमाद्
भवति यदि यतिस्तथा सप्तभिः सप्तभिश्चिष्वतोऽन्या यतिः पञ्च विद्यात्तथा ।
सततमभिनिविष्टदेहा तथा सङ्कृतौ सूरिभिः सर्वदा दृश्यते
तत इह परिभाषिता शास्त्रविद्भिस्त्वियं मेघमाला यथा दण्डकः ॥
६. पवनबल-क; ख० । ७. तीव्रनादा बलाकावलीमेखलाशोभिता-ग० ।
८. सदृशोध्वंरूपा-क; ख० ।
९. महाधूमपुञ्जायमानाम्बुगर्भोद्भवा-ख० ।
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सुरपतिधनुरुज्ज्वलाबद्धकक्ष्या¹ तडिद्द्योतसन्नाहपट्टोज्ज्वला²
गगनतलविसारिणी³ प्रावृषेण्या दृढं मेघमालाधिकं⁴ शोभते ॥११२॥
आकाश में व्याप्त होने वाली वर्षा के बादलों की यह पाँत जो हवा
के झोकों से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है और इसी कारण तीव्र और
गम्भीर ध्वनि कर रही है, इसने हंसों की पाँत की मेखला धारण की है।
पर्वत के समान इसका अत्यन्त विशाल स्वरूप है। यह अत्यन्त नीले पानी
को अपने अन्दर धारण किये है जो धुएँ या काजल के समान (लग रहा)
है। इसने इन्द्रधनुष-सा उज्ज्वल या चमकीला कमर-पट्टा धारण किया है
तथा बिजली की दीप्ति-के कवच-सी भास्वत्प्रभा वाली यह मेघमाला इस
समय सचमुच बड़ी सुहावनी दिखाई दे रही है ॥११२॥
आद्यञ्चैव⁵ चतुर्थञ्च पञ्चमं षष्ठमेव च।
नवमं दशमञ्चैव नैधनञ्च⁶ भवेद्गुरु ॥११३॥
पञ्चविंशतिके पादे शेषाणि च लघून्यथ।
वृत्तज्ञैः सा तु विज्ञेया क्रौञ्चपादीति नामतः⁷ ॥११४॥
क्रौञ्चपदी—यदि पचीस अक्षरों के पाद में पहला, चौथा, पाँचवाँ, छठा,
नवाँ, दसवाँ, तथा अन्तिम अक्षर गुरू हो (तथा शेष लघु हों) तो
क्रौंचपदी नामक वृत्त होता ॥११३-११४॥
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यथा—यः किल दाक्ष्यं विद्रुतसोमं⁸ क्रतुवरमचमसमपगतकलशं⁹
पातितयूपं क्षितचषालं¹⁰ विचयनमसमिधमपशुकचरुकम्¹¹।
१. बद्धशोभा—ख०। २. बन्धोज्ज्वला—ख०।
३. विचारिणी प्रावृषि प्रोन्नता—ख०। ४. मेघमालावली—क०।
५. आद्यं चतुर्थञ्च तथा—ख०; ग०।
६. अन्त्यञ्चैव गुरुण्यथ—ख०; ग०।
७. क्रौञ्चपदालक्षणं क—पुस्तके यथा—
म्भौ यदि पादे स्मावपि चेष्टावभिकृतिरपि च हि यदि खलु विहिता
नाश्च समुद्राः स्युर्विनिविष्टा यदि च खलु गुरु भवति निधनगतम्।
पञ्चभिरादौ छेदमुपेता पुनरपि यतिरिह यदि खलु दशभिः
क्रौञ्चपदेयं वृत्तविधाने सुरगणपितृगणमुनिगणविहिता ॥
८. विद्रुमसोमं—क०। ९. मनुपममपगतकलुषं—ख०।
१०. कपालं—ख०। ११. विवसनसममिव सपशुकसहितम्—ख०।
१७ ना० शा० द्वि०
२५८ नाट्यशास्त्रम्
कार्मुकमुक्तेनाशु चकार व्यपगतसुरगणपितृगणमिषुणा¹
नित्यमसौ² ते दैत्यगणारिः प्रदहतु³ मखमिव रिपुगणमखिलम्⁴ ॥११५॥
जिन भगवान् शिव ने अपने बाण से सोमपात्र को शीघ्र लुढ़का दिया,
कलश को फोड़ दिया और चमस को फेंक दिया, यूप को गिरा दिया,
चषाल को फेंक डाला, ( आग में जलती हुई ) समिधाओं को विच्छिन्न कर
दिया, यज्ञीय पशुओं को दूर कर चरु को लुढ़का दिया, देवता और पितरों
को भगा दिया और इस प्रकार दक्ष के महायज्ञ का विध्वंस कर दिया वे ही
भगवान इस यज्ञ के समान तुम्हारे शत्रुओं का सदा विनाश करें ॥ ११५ ॥
अष्टावादौ गुरूणि स्युस्तथा चैकोनविंशकम् ।
एकविंशञ्च⁵ विज्ञेयं चतुर्विंशं सनैधनम् ॥ ११६ ॥
एतानि गुरुसंख्यानि शेषाणि⁶ च लघून्यथ ।
षड्विंशत्यक्षरं⁷ पादे तद्भुजङ्गविजृम्भितम् ॥ ११७ ॥
[L
षोडशोऽध्यायः २५९
इक्कीसवाँ, चौबीसवाँ तथा अन्तिमवर्ण गुरू हो तो भुजंगविजृम्भित वृत्त
होता है ॥ ११६-११७ ॥
यथा—
रूपोपेतां$^१$ दैवैः$^२$ सृष्टां समदगजविलसितगतिं निरीक्ष्य तिलोत्तमां
प्रादक्षिण्यात्प्राप्तां$^३$ द्रष्टुं बहुवदनमचलनयनं$^४$ शिरः कृतवान् हरः$^५$ ।
दीर्घं$^६$ निश्वस्यान्तर्गूढं स्तनवदनजघनरुचिरां$^७$ निरीक्ष्य तथा पुनः
पृष्ठे$^८$ न्यस्तं देवेन्द्रेण प्रवरमणिकनकवलयं भुजङ्गविजृम्भितम् ॥ ११८॥
देवगण द्वारा निर्मित मत्तगजगामिनी उस परमसुन्दरी तिलोत्तमा
को देखते हुए—जो प्रदक्षिणा करने आई हुई थी—भगवान् शंकर ने अपने
सभी नेत्रों को उसी ओर लगा दिया और अपने सिरों को निश्चल कर दिया ।
पुनः भगवान् शिव ने अन्तकरण में अत्यन्त गूढ़ भाव से दीर्घ निश्वास
लेकर उसे फिर देखा—जिसका उरोज, मुँह तथा जघन भाग का सौन्दर्य
अवर्णनीय था । फिर उसे आशीष देने के लिए भगवान् शिव ने उसकी पीठ
पर श्रेष्ठ मणिखचित कनकवलयों वाला तथा सर्पों से अधिष्ठित अपना हाथ
रख दिया ॥ ११८ ॥
[ दण्डकं$^९$ नाम विज्ञेयमुत्कृतेरधिकाक्षरम् ।
वृत्तं मालादिकं तस्मान्नोक्तं चादौ गुहादिना ॥
उत्कृति के पाद से अधिक अक्षरों वाले पाद होने पर 'दण्डक' समझना
चाहिए । इसके माला आदि छन्द प्रभेद होते हैं जिन्हें आरंभ में ही गुह
आदि ने बतलाया । ]
[ यथा—मुदितजनपदाकुला स्फीतसस्याकरा
भूतधात्री भवन्तं समभ्यर्चति$^{१०}$
द्विरदकरविलुप्तहिन्तालतालीवनान्तां
नमस्यन्ति विन्ध्यादयः पर्वताः ।
१. रूपेणिन्द्यां—क० । २. देवैः स्पृष्टां—ख०; ग० ।
३. प्रादक्षिण्यं प्राप्तां—ख०; ग० ।
४. वदननयनसहितं तिरस्कृतवान् हरः—क०, शिरःशतवान् हरिः—ख० ।
५. मुदा—क० । ६. ब्रह्मा दीर्घं निःश्वस्यान्तः स्तनवदन—क० ।
७. कलितां—ख०; ग० । ८. कण्ठे न्यस्तं—क०; पृष्ठन्यस्तां—ग० ।
९. श्लोकावेतौ प्रक्षिप्तौ—दण्डकं नाम विज्ञेयं षड्विंशादधिकाक्षरम्—ख०, ग० ।
१०. समभ्यर्च्यते—क० ।
स्फुटितकलशशुक्तिनिगीर्णमुक्ता-१
फलैरूर्मिहस्तैर्नमस्यन्ति वः सागराः
मुदितजलचराकुलाः सम्प्रकीर्णामलाः
कीर्तयन्तीव२ कीर्तिं महानिम्नगाः३ ॥ ]
प्रसन्न जनपद से व्याप्त, समृद्ध धान्य की खानि होकर यह पृथिवी
आपकी अर्चना कर रही है, मद मत्त हाथियों की सूंडों से विध्वस्त तालवनों
के समूहवाले विन्ध्य आदि पर्वत भी आपके प्रति आनत हैं, विदीर्ण होने
वाली शुक्तियों के कलशों से बाहर निकलते मौक्तिक वाले तरंग हस्तों द्वारा
सागर भी आपके प्रति प्रणत है तथा ये महानदियाँ भी अपने सानन्द जल-
चरों से व्याप्त हो निर्मलता को विस्तीर्ण करती हुई आपकी शुभ्र कीर्ति का
मानों आख्यान गा रही हैं । ]
विषम तथा अर्धसमवृत्त—
एतानि समवृत्तानि मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।
विषमार्द्धसमानान्तु४ पुनर्वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ ११९ ॥
हे मुनिजन, मैंने अभी समवृत्त बतलाये हैं। अब मैं अर्धसमवृत्त तथा
विषमवृत्तों के लक्षण बतलाता हूँ ॥ ११९ ॥
यत्र पादास्तु विषमा नानावृत्तसमुद्भवाः ।
ग्रथिताः पादयोगेन तद्वृत्तं विषमं स्मृतम् ॥ १२० ॥
जिसमें अनेक वृत्तों के असमान पाद हों तथा उनसे एक पूर्ण छन्द
का निर्माण किया गया हो तो विषमवृत्त होता है ॥ १२० ॥
द्वौ५ समौ द्वौ च विषमौ वृत्तेऽर्धविषमे तथा ।
सर्वपादैश्च विषमैर्वृत्तं विषममुच्यते ॥ १२१ ॥
जिस छन्द में दो पाद (पहले व तीसरे) सम और दो (दूसरे व चौथे)
पाद विषम हों तो उसे अर्धविषम (अर्धसमवृत्त) वृत्त, तथा दो पादों के
१. विमब—क० ।
२. कीर्तयिष्यन्ति वर्णं—क० ।
३. उदाहरणमेतत् जनाश्रयां विद्यते । तद् ग्रन्थकारेण रुद्रस्वामिना कुतः
उद्धृतमिति निर्णैतुं न शक्यते । अयं दण्डकश्चण्डवृष्टिप्रयोग इति नाम्ना
भासते । इति क० पु० टिप्पणां रामकृष्णकविमहाभागः ।
४. युग्मोजविषमाणाञ्च सम्प्रवक्ष्यामि—क० ।
५. समावेकान्तरी पादौ द्वौ द्वावर्द्धसमौ स्मृतौ —क० ।