नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः २२१
सम्पद्वीरामपादश्च देवै¹तास्थानमक्षरम् ।
²वर्णः स्वरा विधिर्वृत्तमिति छन्दोगतो विधिः ॥ ८९ ॥
(छन्दों में) दो शब्दों (पदों) का निश्चित स्थान पर पृथक् या
विच्छिन्न रहना 'यति' या विराम कहलाता है। दीर्घ, प्लुत, अनुस्वार
तथा विसर्ग से युक्त होने पर तथा संयुक्ताक्षर के पूर्व का वर्ण गुरु होता है
तथा कभी-कभी पादान्त में वर्ण गुरु तथा कभी लघु हो जाता है।
छन्दोविधान में सम्पद्, विराम, पाद, देवता, स्थान, अक्षर, वर्ण,
स्वर, विधि तथा वृत्त होते हैं ॥ ८७-८९ ॥
सम्पद—
नैवा³तिरिक्तं हीनं वा यत्र सम्पद्यतेऽक्षरम् ।
विधाने छन्दसामेषा सम्पदित्य⁶भिसंज्ञिता ॥ ९० ॥
जिस छन्द में वर्णों की संख्या न अधिक और न कम हो उस
नियमानुसार पूर्ण छन्द को 'सम्पद' जानो ॥ ९० ॥
विराम—
यत्रार्थस्य समाप्तिः स्यात् स विराम इति स्मृतः ।
छन्द में उद्दिष्ट अर्थ की समाप्ति हो जाना 'विराम' कहलाता है।
पाद—
पादश्च⁷ पद्यतेर्धातोश्चतुर्भागः प्रकीर्तितः ॥ ९१ ॥
'पाद' शब्द पद् धातु से निष्पन्न होता है। छन्द का एक चौथाई भाग
'पाद' कहलाता है ॥ ९१ ॥
१. दैवतस्थानमक्षरम्—ग० ।
२. वर्णस्वराधिकैः--क०; वर्णस्वरोऽधिकं—ग० ।
३. हीनं नैवातिरिक्तञ्च यत्तु स्यात् पादयोगतः ।
विधाने छन्दसामस्मिन् सा हि सम्पदुदाहृता ॥—क० ।
४. क्रमः—ग० ।
५. विविधा—क० ।
६. त्यभिधीयते—क० ।
७. पादस्य—क० ।
८. गत्यर्थात् सम्प्रकीर्तितः—क०, चतुर्भाग इति स्मृतः—ग० ।