नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २३९
वरतनुः प्रततप्लुतसर्पणै-
१रनुकरोति गतैर्हरिणप्लुतम् ॥ ५३ ॥
वह सुन्दरी (वरतनु), कठोरवचनरूपी कशा से पिट कर, भय से
दोनों बगलों को देखते हुए तथा सतत चौकड़ी मार चाल से भागने के
कारण हरिण की गति का अनुकरण कर रही है ॥ ५३ ॥
सप्तमं नवमं २चान्त्यमुपान्त्यञ्च यदा गुरु ।
द्वादशाक्षरके पादे कामदत्तेति३ सा यथा४ ॥ ५४ ॥
कामदत्ता—यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां, नवाँ, ग्यारहवां तथा
अन्तिम वर्ण गुरु हो तो कामदत्ता वृत्त होता है ॥ ५४ ॥
यथा—करजपदविभूषिता यथा त्वं
सुदति५ दशनविक्षताधरा च।
गतिरपि ६चरणावलग्नमन्दा
त्वमसि७ मृगनिभाक्षि८ कामदत्ता९ ॥ ५५ ॥
सुन्दरि, तुम जिस प्रकार इन नखक्षतों से अलंकृत हो तथा तुम्हारा
अधर दन्तक्षत से युक्त एवं तुम्हारी लड़खड़ाती और मन्द गति है । इसे
देखकर ऐसा लगता है कि हे प्रिये, तुम प्रेम (काम) के लिये ही प्रदान की
गई हो ॥ ५५ ॥
आद्यं चतुर्थं दशमं सप्तमञ्च यदा१० लघु ।
पादे११ तु जागते यस्या अप्रमेया तु१२ सा स्मृता ॥ ५६ ॥
अप्रमेया—यदि बारह अक्षरों के पाद में पहिला, चौथा, सातवां, तथा
दसवां वर्ण लघु हो तो अप्रमेया१ वृत्त होता है ॥ ५६ ॥
१. अप्रमेया को पिंगल तथा अन्य ग्रन्थों ने 'भुजङ्गप्रयात' माना है ।
१. प्रकुरुते प्रगतं हरिणप्लुता—क० ।
२. चैव ह्यान्त्योपान्त्ये गुरूण्यथ । यत्र स्युर्जगते पादे—क० ।
३. काममत्तेति—ख०, ग० । ४. मता—क० । ५. सुतनु—क० ।
६ चरणारविन्दमन्दा—ख०; सन्नमन्दा—ग० । ७. तदसि—क० ।
८. समाक्षि—क० । ९. काममत्ता—ख०; ग० ।
१०. लघून्यथ—क० । ११. द्वादशाक्षरके पादे—ख० ।
१२. तथाहि सा—ग० ।