नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः
वृत्तविधानाध्यायः
छंन्दांस्येवं हि यानीह मयोक्तानि द्विजोत्तमाः ।
वृत्तानि तेषु नाट्येऽस्मिन् प्रयोज्यानि निबोधत ॥ १ ॥
हे मुनियों, इस प्रकार मैंने जिन छन्दों को पहिले बतलाया था अब
उनका नाट्य-प्रयोग के व्यवहारार्थ लक्षण सुनिये ॥ १ ॥
आद्ये पुनरन्त्ये ³द्वे द्वे गुरूणी चेत् ।
सा⁴ स्यात्तनुमध्या गायत्रसमुत्था ॥ २ ॥
तनुमध्या—यह गायत्री छन्द के वर्ग में आता है। इसके प्रत्येक पाद
में प्रथम दो तथा अन्तिम वर्ण गुरु होता¹ है ॥ २ ॥
यथा—संत्यक्तविभूषा भ्रष्टाञ्जननेत्रा ।
हस्तार्पितगण्डा किं⁶ त्वं तनुमध्या ॥ ३ ॥
हे कृशोदरि, तुमने अपने गहनों को क्यों निकाल दिया। तुम्हारी
आंखें काजल से क्यों हीन हैं और तुम अपने कपोलों को हाथों के सहारे
क्यों थामें हुए हो ॥ ३ ॥
लघुगण आदौ⁷ भवति चतुष्कः ।
गुरुयुगमन्त्ये मकरेकशीर्षा ॥ ४ ॥
मकरशीर्षा—यदि प्रारम्भ के चार वर्ण लघु तथा अन्तिम दो वर्ण गुरु
हों तो ( गायत्री छन्द के वर्ग में ) मकरशीर्षा९ नामक वृत होता है ॥ ४ ॥
१. इस वृत्त की तरह अन्य वृत्तों के लक्षण भी वर्णित वृत्त के उदाहरण हो
सकते हैं। यह क्रम आगे भी देखा जा सकता है।
२. वृत्तरत्नाकर तथा प्राकृत-पैंगल आदि छन्दोग्रन्थों में इस छन्द का नाम
'शशिवदना' तथा लक्षण उपर्युक्त ही दिया गया मिलता है।
१. इति च्छन्दांसि यानीह—ख०; ग० ।
२ वृत्तान्येतानि—क०; वृत्तान्येतेषु—ख०; ग० । ३. पादे—क० ।
४. मध्ये लघूनी चेद्वृत्तं तनुमध्या—क०; वृत्तं तनुमध्या—ग० ।
५. वक्त्रा—ग० । ६. किं त्वं तनुमध्ये—क; किञ्चित्तनुमध्या ग० ।
७. आद्यो—ख०; ग० । ८. मन्ते—ग० । ९. मधुकरशीर्षा—क० ।
१५ ना० शा० द्वि०