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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 668 में से

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पृष्ठ 341

२३० नाट्यशास्त्रम्
मधुकरी—यदि नौ अक्षरों के पाद में अन्तिम तीन वर्ण गुरु हों तो
मधुकरी¹ वृत्त होता है ॥ २२ ॥
यथा—¹कुसुमितमभिपश्यन्ती ²विविधतरुगणैश्छन्नम् ।
³वनमतिशयगन्धाढ्यं भ्रमति⁴ मधुकरी हृष्टा ॥ २३ ॥
यह भ्रमरी विभिन्न वृक्षों से पूर्ण तथा अनेक पुष्पों की सुगन्ध से व्याप्त
इस वन को देखकर प्रसन्नता से घूमने लगी है ॥ २३ ॥
दशाक्षरकृते पादे त्रीण्यादौ त्रीणि नैधने⁵ ।
यस्या गुरूणि सा ज्ञेया पङ्क्तिरुत्पलमालिका६ ॥ २४ ॥
उत्पलमाला—यदि दस अक्षर के पाद में प्रथम तथा अन्तिम तीन
वर्ण गुरु हों तो 'उत्पलमाला'² वृत्त होता है (इसे 'कुवलयमालिका' जानों-
पाठान्तर से अर्थ)
यथा—अस्मिस्ते शिरसि⁷ तदा कान्ते
८वैदूर्यस्फटिक-सुवर्णाढ्ये ।
शोभां९ स्वां न वहति तां बद्धा
सुश्लिष्टा१० कुवलयमालेयम् ॥ २५ ॥
प्रिये, यह कुवलयों की माला (जब) तुम्हारे वैदूर्य, स्फटिक तथा सुवर्ण
के अलंकारों सहित शिरस्थ केशों से बंधी थी तब इसकी स्वाभाविक शोभा
आच्छादित हो रही थी ॥ २५ ॥
१. मधुकारी का पिंगल छन्द सूत्र में 'भुजगशिशुभृता' नाम मिलता है ।
२. कुवलयमाला का पिंगल छन्दःसूत्र में 'पणव' नाम मिलता है ।
१. कुसुमितमपि पश्यन्ती—क; मपश्यन्ती—ग० ।
२. शुभविहगगणै—क० । ३. नवनलिनसुगन्धाढ्यं—ख०, ग० ।
४. सुतनु—क० । ५. तैधनानितु-क० ।
६. मालिनी—ख०; ग० । अस्या लक्षणमपरं क-पु० त्वेवम्—
त्रीण्यादौ यदि हि गुरूणि स्युश्चत्वारो यदि लघवो मध्ये ।
पङ्क्तावन्तगतमकारः स्याद् विज्ञेया कुवलयमाला(सा)ख्या ॥
७. भ्रमरनिभे कान्ते—ख०; ग० ।
८. नानारत्नरुचितभूषाढ्ये—ख०; ग० ।
९. शोभामवहति शुभां मूर्ध्नि—क; ख० ।
१०. प्रोत्फुल्ला—ख०; ग० ।