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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 668 में से

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पृष्ठ 344

षोडशोऽध्यायः २३३
तुम देखने में भद्दी, कठिनाई से प्रसन्न होने वाली, कष्ट से अनुकूलता को
ग्रहण करने वाली, कठोर भावों से व्याप्त तथा अनुराग की सभी अवस्थाओं
तथा भावनाओं से अनजान हो, थोड़े में बस इतना ही कहा जा सकता है
कि तुम सभी कामतन्त्र की बातों में अयोग्य और इन्द्र के वज्र जैसी कठोर
(कठिन, जड़) हो ॥ ३३ ॥
एभिरेव तु संयुक्ता लघुभिस्त्रैष्टुभी यदा ।
उपेन्द्रवज्रा विज्ञेया लघ्वादाविह¹ केवलम् ॥ ३४ ॥
उपेन्द्रवज्रा—ग्यारह अक्षरों के (त्रिष्टुप् जाति के) पाद में यदि,
प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम तथा नवम अक्षर लघु हो तो उपेन्द्रवज्रा वृत्त
जानों ॥ ३४ ॥
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यथा—प्रिये² श्रिया वर्णविशेषणेन
³स्मितेन कान्त्या सुकुमारभावात् ।
अमी गुणा रूपगुणानुरूपा
⁴भवन्ति ते किं त्वमुपेन्द्रवज्रा ॥ ३५ ॥
प्रिये, तुम अपनी शारीरिक शोभा, (वेष के विशिष्ट रंग, स्मित,
कान्ति तथा शरीर की सुकुमारता से युक्त हो) तुम्हारे ये गुण
तुम्हारे स्वरूप (रूप) तथा गुणों के अनुरूप ही है क्या तुम इन्द्र का
दूसरा वज्रमय शस्त्र तो नहीं हो ? ॥ ३५ ॥
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च सप्तमं नवमं तथा ।
⁵गुरूष्येकादशे पादे यत्र सा तु रथोद्धता ॥ ३६ ॥
रथोद्धता—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में पहिला, तीसरा, सातवां,
नवां तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो रथोद्धता वृत्त होता है ॥ ३६ ॥
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यथा—किं त्वया सुभट⁶ दूरवर्जितं⁷
नात्मनो न ⁸सुहृदां प्रियं कृतम् ।
१. दावथ—क०, लघ्वाद्यमिह—ख० ।
२. प्रेम्णा श्रिया—क०; ख०; श्रिया च वर्णेन विशेषणेन—ग० ।
३. यथा च कान्त्या सुकुमारयुक्त्या—क० । ४. स्मितेन—ख० ।
५. गुर्वेकादशके—क० । ६. सुभग—क० ।
७. वर्जितात्मना—क० । ८. सुहृदः—क० ।