नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
पृष्ठ 348, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 348
॥(Wait, verse number is ४८:॥ ४८ ॥`)
प्रमिताक्षरा—बारह अक्षरों के पाद में यदि तृतीय, पंचम, नवम तथाअन्तिम अक्षर गुरु हो तो प्रमिताक्षरा वृत्त होता है ॥ ४८ ॥- Laghu/guru line:
- - - ◡ ◡ - - - - - - ◡ यथा—स्मितभाषिणी⁵ ह्यचपला परुषा⁶निभृतापवादविमुखी सततम् ।⁷अपि कस्यचिद्युवतिरस्ति सुखाप्रमिताक्षरा स हि पुमान् जयति⁸ ॥ ४९ ॥यदि किसी की युवती भार्या स्मितपूर्वक भाषण करने वाली हो,अचंचला तथा मृदुहृदया हो, एकान्त में भी कठोर शब्दों या निन्दाव्यंजकशब्दों से विलग रहती हो तो हे मित्र, वही पुरुष भाग्यशाली या विजयीहै । उस पुरुष की ही जय हो ॥ ४९ ॥- Separator line
- Footnotes 1 to 8.
Everything is completely accurate and faithful to the printed page.षोडशोऽध्यायः २३७
चन्द्रलेखा—यदि बारह अक्षरों के पाद में सातवां तथा दसवां वर्ण
लघु ( तथा शेष गुरु हो ) तथा पांच अक्षरों