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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 668 में से

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पृष्ठ 340

षोडशोऽध्यायः २२९
अष्टाक्षरकृते पादे सर्वाण्येव भवन्ति हि ।
गुरूणि यस्मिन् सा नाम्ना विद्युल्लेखेति संज्ञिता ॥ १८ ॥
विद्युल्लेखा—यदि आठ अक्षरों के पाद में सभी वर्ण गुरू हों तो
विद्युल्लेखा वृत्त' होता है ॥ १८ ॥
यथा—२साम्भोभारैरानर्दद्भिः श्यामाम्भोदैर्व्याप्ते व्योम्नि ।
आदित्यांशून्स्पर्द्धिन्त्येषां दिक्षु भ्रान्ता विद्युन्माला५ ॥ १९ ॥
आकाश गरजते हुए काले बादलों की घटाओं से व्याप्त है और
सूर्य के किरणों से स्पर्द्धा करने को (इनके बीच) बिजली भी अनेक
दिशाओं से भागती हुई आ रही है ॥ १९ ॥
६पञ्चमं सप्तमञ्चान्त्यं गुरु पादेऽष्टके तथा ।
छन्दोज्ञैर्ज्ञेयमेतत्तु वृत्तं चित्तविलासितम् ॥ २० ॥
चित्तविलसित—यदि आठ अक्षरों के पाद में पाँचवाँ, सातवाँ और
आठवाँ वर्ण गुरू हो तो 'चित्तविलसित' वृत्त होता है ॥ २० ॥
यथा—स्मितवशविप्रकाशैर्दशनपदैरमीभिः ।
वरतनु पूर्णचन्द्रं तव मुखमावृणोति ॥ २१ ॥
हे वरतनु, मुसकान के समय प्रकट होने वाली दांतों की इस चमक के
कारण तुम्हारा मुख पूर्णचन्द्र को आच्छादित (तिरस्कृत) कर रहा है ॥ २१ ॥
७नवाक्षरकृते पादे त्रीणिस्युर्नैधनानि च ।
गुरूणि यस्याः सा नाम्ना ज्ञेया मधुकरी यथा ॥ २२ ॥
१. विद्युल्लेखा का नाम 'विद्युन्माला' वृत्तरत्नाकर आदि ग्रन्थों में दिया गया है।
१. इदं लक्षणं क० ग० पु० यथा—
मो गो चान्त्यौ यस्याः पादे पादस्यान्ते विच्छेदश्च ।
सा चानुष्टुप्छन्दस्युक्ता नित्यं सद्भिर्विद्युन्माला ॥
२. साम्भोम्भोदैर्व्याप्तैर्व्योम्ना गम्भीरोघैर्नानानादैः—क; अम्भोभारैरानदद्भिः—
ख०; सान्द्राम्भोभिर्नादाम्बोधै श्यामाकारै—ग० ।
३. आदित्यांशून्प्रख्या ह्येषा—क० । ४. स्पर्शिन्त्येषा—क० ।
५. विद्युल्लेखा—ख०; ग० । ६. एतद्वृत्तलक्षणं ख० ग०—पु० नास्ति ।
७. इदं लक्षणं क-ग० पु० त्वेवम्—
षडिह यदि लघूनि स्युर्निधनगतमकारश्चेत् ।
बुधजनबृहतीसंस्था भवति मधुकरी नाम्ना ॥