नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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यथा—न ते काचिदन्या समा दृश्यते स्त्री
१नृलोके विशिष्टा गुणैरद्वितीयैः ।
त्रिलोक्यां गुणाग्र्यान् समाहृत्य सर्वान्
जगत्यप्रमेयासि दृष्टा२ विधात्रा ॥ ५७ ॥
इस मर्त्य लोक में तुम्हारे जैसी दूसरी स्त्री नहीं दिखाई देती। अपने
असामान्य गुणों से तुम अप्रतिम हो अतएव विधाता ने तीनों भुवनो के सभी
श्रेष्ठ गुणों को एकत्र कर तुम्हें बनाया है ऐसा दिखाई देता है ॥ ५७ ॥
द्वितीयं पञ्चमञ्चैव ३ह्यष्टमैकादशे तथा।
पादे यत्र लघूनि स्युः पद्मिनी नाम सा यथा४ ॥ ५८ ॥
पद्मिनी—यदि बारह अक्षर के पाद में द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एका-
दशवां वर्ण लघु हो तो पद्मिनी१ वृत्त होता है ॥ ५८ ॥
यथा—देहत्तोयाशया वक्त्रपद्मोज्वला
नेत्रभृङ्गाकुला दन्तहंसस्मिता५।
केशपाशच्छदा चक्रवाकस्तनी
पद्मिनीव प्रिये भासि मे सर्वदा६ ॥ ५९ ॥
हे प्रिये, तुम मुझे सदा पद्मसर जैसी दिखाई देती हो। क्योंकि तुम्हारा
शरीर जलाशय, तुम्हारा मुख कमल, तुम्हारे नेत्र आकुल भंवरे, तुम्हारी
सस्मित दन्तपंक्ति हंस, तुम्हारे केश कमल पत्र तथा तुम्हारे उरोज
चक्रवाक हैं ॥ ५९ ॥
१. पद्मिनी को पिंगल ने 'स्रग्विणी' कहा है ।
१. गुणैर्य्याद्वितीया तृतीयापि चास्मिन् । ममेयं मतिर्लोकमालोक्य सर्वं—
ख०; ग० । २. सृष्टा—ख०; ग० । ३. अष्टमैकादशं तथा —ख० ।
४. क-पुस्तकस्थमस्यैव लक्षणान्तरमेवम्—
रास्त्रिकाः सागराख्या निविष्टा यदा ( यदि—ख० )
स्यात् त्रिके च त्रिके युक्तरूपा यतिः ।
सन्निविष्टा जगत्या ( जगत्यां—ग० ) स्ततः सा बुधै
र्नामतश्चापि सङ्गीत्यंते पद्मिनी ॥
५. हंसैः सिता—क० । ६. उदाहरणान्तरमपि क—पुस्तके लभ्यते ।
तद्यथा--फुल्लपद्मानना त्वं द्विरेफेक्षणा केशपत्रच्छदा चक्रवाकस्तनी ।
पीततोयावली बद्धकाञ्चीगुणा पद्मिनीव प्रिये भासि नीरे स्थिता ॥ इति ।