नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ नाट्यशास्त्रम्
आद्यं तृतीयमन्त्यञ्च पञ्चमं सप्तमन्तथा।
गुरूण्याष्टाक्षरे पादे सिंहलेखेति सा यथो ॥ १४ ॥
सिंहलेखा—(लीला) यदि आठ अक्षरों के पाद में प्रथम, तृतीय,
पञ्चम, सप्तम तथा अन्तिम (आठवाँ) वर्ण गुरू हो तो 'सिंहलेखा' वृत्त
होता है ॥ १४ ॥
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यथा—यत्त्वया^२ ह्यनेकभावैश्चेष्टितं^३ रहः सुगात्रि ।
तन्मनो मम प्रविष्टं^४ वृत्तमत्र सिंहलेखम्^५ ॥ १५ ॥
हे शोभने, तूने एकान्त में जो अनेक भावाश्रित चेष्टाएँ कीं वे मेरे
मन को आज सिंह के नखों के समान कुरेद रही हैं ॥ १५ ॥
चतुर्थञ्च द्वितीयञ्च षष्ठमष्टममेव च।
गुरूण्याष्टाक्षरे पादे यत्र तन्मत्तचेष्टितम् ॥ १६ ॥
मत्तचेष्टित—यदि आठ अक्षरों के पाद में दूसरा, चौथा, छठा तथा
आठवाँ वर्ण गुरू हो तो 'मत्तचेष्टित' वृत्त होता है ॥ १६ ॥
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यथा—चरावघूर्णितेक्षणं^७ विलम्बिताकु^८लालकम् ।
असंस्थितैः पदैः प्रिया करोति मत्तचेष्टितम् ॥ १७ ॥
यह प्रियतमा बार-बार अपनी आँखों को घुमाकर, बालों को लम्बे
फैला कर और पैरों को लड़खड़ाता हुआ रखकर नशेबाजी की नकल
कर रही है ॥ १७ ॥
१. मत्तचेष्टित का अन्य पिंगल तथा उत्तरकालीन छन्द ग्रन्थों में 'प्रमाणिका'
नाम प्राप्य है परन्तु लक्षण यही है ।
१. जो तु यस्य गो च पादे संस्थितो समस्तरूपी। तामनुष्टुभाश्रयस्थां
वावदन्ति सिंहलेखा (लीला) म्—क०; ख० !
२. त्वया हि नैक—क० । ३. चेष्टिती—क० । ४. प्रदिष्टं ।
५. सिंहलीलम्—क०; ग० । अस्योदाहरणं ग-पुस्तक पाठान्तरे भिन्नमेव
दृश्यते—वैरिवारणान्तकारिन् वीर तावकं स्तुवन्ति ।
जन्यकानने करालं वृत्तमत्र सिंहलीलम् ॥
६. यदा तु जात्परो रलो गकार एव च स्थितम् । अनुष्टुबुद्भवं तदा वदन्ति
मत्तचेष्टितम् ॥ इति क०; ग० पु० अधिकम् ।
७. मदावघूर्णि—ख०; ग० । ८. विलम्बितालकाकुलम्—ग० ।