नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः २३१
द्वितीयञ्च चतुर्थञ्च षष्ठमष्टममेव च।
ह्रस्वं दशाक्षरे पादे यत्र सा शिखिसारणी॥ २६॥
मयूर (शिखि) सारणी—यदि दस अक्षर के पाद में दूसरा, चौथा,
छठा तथा आठवां वर्ण लघु हो तो 'मयूरसारिणी' वृत्त होता है॥ २६॥
यथा—नैव तेऽस्ति सङ्गमो मनुष्यै
र्नापि कामभोगचिह्नमन्यत्।
गर्भिणीव² दृश्यसे ह्यनार्ये
किं मयूरसारिणी त्वमेवम्³॥ २७॥
अरी, अनार्ये, तेरा मनुष्यों से मिलाप नहीं, न तूने कोई और उपभोग
चिह्न धारण किया फिर भी तुम गर्भिणी के समान दिखाई दे रही हो और
मयूर के समान आचरण कर रही हो॥ २७॥
आद्यं चतुर्थमन्त्यञ्च सप्तमं दशमं तथा।
गुरूणि त्रैष्टुभे पादे यत्र स्युर्दोधकन्तु तत्⁴॥ २८॥
दोधक—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में प्रथम, चतुर्थ, सातवां दसवां
तथा अन्तिम वर्ण गुरू हो तो 'दोधक' वृत्त होता है॥ २८॥
यथा—⁵प्रस्खलिताग्रपदप्रविचारं
मत्तविघूर्णितगात्रविलासम्⁶।
पश्य विलासिनि कुञ्जरमेतं⁷
दोधकवृत्तमयं⁸ प्रकरोति॥ २९॥
१. मयूरसारिणी का पिंगल ने 'मयूरखारा' नाम दिया है तथा वृत्तरत्नाकर
में भी इसका यही नाम मिलता है।
१. क० ग० पुस्तकस्थं लक्षणं यथा—
जौ त्रिकौ तु पादगौ तु यस्या गौ च संश्रितौ तथा समस्तौ।
पङ्क्तियोगसुप्रतिष्ठिताङ्गी (ताङ्गा—ग०) सा मयूरसारिणीति नाम्ना॥
२. गर्भिणी च जायसे—क०। ३. त्वमेव—स्व०; ग०।
४. अस्य क० ग०—पुस्तकस्थं लक्षणं तु—भौ तु भगादिति (भगौ गिति—
ग०) यस्य गणाः स्युस्स्याच्च यतिस्त्रिचतुर्भिरथोक्ता (पाठवशाच्च गतिस्खलिता-
स्यात्—क०)। त्रैष्टुभमेव हि तत्खलु नाम्ना दोधकवृत्तमिति प्रवदन्ति॥
५. प्रस्खलमानगतिप्रविचारो—क०। ६. विलासः—क०।
७. कुञ्जर एषो—क०। ८ वृत्तगति प्रकरोति—क०, ख०।