नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ नाट्यशास्त्रम्
अरे विलासिनी, जरा इस हाथी को तो देख—जो अपने आगे के
पैरों को लड़खड़ाते हुए रखकर तथा शरीर की चेष्टाओं को मद्यप जैसी
बनाकर छोटे बछड़े (गोवत्स) जैसी चेष्टाएं कर रहा है ॥ २९ ॥
आदौ१ द्वौ पञ्चमश्चाप्यष्टमं२ नैधनं तथा।
गुरुण्येकादशे पादे यत्र तन्मोटकं यथा ॥ ३० ॥
मोटक—यदि ग्यारह अक्षर के पाद में पहले दो, पंचम, अष्टम तथा
अन्तिम वर्ण गुरू हो तो मोटक१ वृत्त होता है ॥ ३० ॥
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यथा—एषोऽम्बुदनिस्वनतुल्यरवः
३क्षीबः ४स्खलमानविलम्बगतिः।
श्रुत्वा ५धनगर्जतमद्रितटे
वृक्षान् ६प्रतिमोटयति द्विरदः ॥ ३१ ॥
यह हाथी पर्वत-प्रदेश में मेघों की गर्जना सुन उसी जैसी मस्ती में
लड़खड़ाती हुई धीमी चाल से चल रहा है और वृक्षों को (अपनी पैरों की)
ठोकर दे रहा है ॥ ३१ ॥
नवमं सप्तमं षष्ठं तृतीयञ्च भवेल्लघु७।
एकादशाक्षरे पादे इन्द्रवज्रेति सा यथा८॥ ३२ ॥
इन्द्रवज्रा—यदि ग्यारह अक्षरों के पाद में तीसरा, छठा, सातवां तथा
नवा अक्षर लघु हो तो 'इन्द्रवज्रा' वृत्त होता है ॥ ३२ ॥
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यथा—त्वं९ दुर्निरीक्ष्या दुरतिप्रसादा
१०दुःखैकसाध्या कठिनाैकभावा।
सर्वास्ववस्थासु च कामतन्त्रे
योग्यासि किं वा बहुनेन्द्रवज्रा११॥ ३३ ॥
१. मोटक का छन्दोमंजरी में 'मोटनक' नाम मिलता है। लक्षण यही है।
१. द्वे आद्ये—क० । २. गुरु एकादशाक्षरे—क० ।
३. क्षीणः—क० । ४. स्खलदङ्ग—ख० ।
५ घननिस्स्वन—क० । ६. प्रतितोटयते—क०, मोटयते—ग० ।
७. लघून्यथ—क० । ८. स्मृता—क० ।
९. दुष्प्रेक्षणीया विगतप्रसादा दुःखेन साध्या कठिनाभिघाता—क०, चन्द्रं निरीक्ष्यादुरितस्वभावा—ग० ।
१०. दुःखेन साध्या कठिनौ स्तनौ ते—ख० । ११. वज्रे—क० ।